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Saturday, 17 January 2026
(2.3.12) ईश्वर किसकी सहायता करते हैं? प्रेरक कहानी Inspirational Story/ Motivational Story
ईश्वर किसकी सहायता करते हैं?
एक व्यक्ति हनुमानजी का भक्त था। एक बार वह अपनी बैलगाड़ी से कहीं जा रहा
था। उसकी गाड़ी एक दलदल में फंस गई। वह हनुमान-चालीसा का पाठ करने लगा और यह
अपेक्षा करने लगा कि हनुमानजी की कृपा से उसकी बैलगाड़ी दलदल से बाहर निकल आएगी।
संयोग से उसी समय एक पंडित जी वहाँ से गुजर रहे थे। जब उन्होनें यह सब
देखा, तो वे वास्तविकता को समझ गए और उन्होंने उस व्यक्ति को याद दिलाया, "मित्र, हनुमानजी को भी
संजीवनी बूटी का सही स्थान पता नहीं था, इसलिए वे पूरा पहाड़ ही उठा लाए थे। तुम्हें कम से
कम अपनी गाड़ी को धक्का देने का प्रयास तो करना चाहिए।"
उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और उसकी इस छोटी सी सहायता से बैलों ने भी जोर
लगाया और गाड़ी को बाहर खींच लिया।
शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर उनकी सहायता करते
हैं, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि ईश्वर उनके लिए सब
कुछ कर देंगे, तो उन्हें जाग जाना चाहिए और कड़ी मेहनत शुरू कर देनी चाहिए। उन्हें जान
लेना चाहिए कि ईश्वर की शक्ति, स्वयं की शक्ति की ही पूरक है।
Friday, 16 January 2026
(2.3.11) ईश्वर की सहायता / Ishwar ki Sahayata / Inspirational Story/ motional Story
ईश्वर किस प्रकार सहायता करते हैं An inspirational story /
Motivational Story
ईश्वर किस प्रकार सहायता करते हैं?
किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वह भक्त था और ईश्वर पर बहुत आस्था और
विश्वास रखता था। उसका मानना था कि ईश्वर सब की सहायता करते हैं।
एक बार तेज बरसात हो गई जिसके कारण उसके गाँव के पास से बहने वाली नदी का
पानी उसके गाँव में घुस गया। जिला प्रशासन की ओर से सहायता करने वाले कर्मचारी आए
और गाँव के लोगों को अपने घर खाली करके सुरक्षित स्थान पर चलने के लिए कहा। गाँव
के लोग अपने घरों को खाली करने लगे और आवश्यकता का सामान अपने साथ लेकर किसी
सुरक्षित स्थान की ओर जाने लगे। लेकिन वह भक्त अपने घर के सामने ही खड़ा रहा। उसने
अपना घर खाली नहीं किया। तब प्रशासन के लोगों ने उस व्यक्ति से कहा कि नदी का पानी
घरों में घुस सकता है। तुम हमारे साथ सुरक्षित स्थान पर चलो। लेकिन उसने यह कह कर
उनके साथ जाने से मना कर दिया कि मुझे विश्वास है, ईश्वर मेरी सहायता करने
अवश्य आयेंगे और मुझे बचा लेंगे।
नदी का पानी तेजी से बढ़ता हुआ उस भक्त के घर के पास तक पहुंच गया। कुछ
समय बाद एक नाव वहाँ पहुँची और उसमें बैठे हुए लोगों ने उस व्यक्ति से कहा,”पानी का बहाव तेज
है, तुम हमारे साथ आओ, हम तुम्हें सुरक्षित स्थान पर ले चलेंगे।” उसने इस बार भी
उनके साथ जाने से इंकार कर दिया और कहा कि ईश्वर मुझे बचाने जरुर आयेंगे। जब पानी
उस व्यक्ति के घर में चला गया, तो वह घर की छत पर चढ़ गया और प्रतीक्षा करने लगा
कि भगवान उसे बचाने आएंगे।
थोड़ी देर बाद एक बचाव दल हेलीकॉप्टर से आया और नीचे रस्सी डाल कर उस
व्यक्ति से कहा कि तुम यह रस्सी पकड़ लो और ऊपर आ जाओ। इस बार भी उस व्यक्ति ने
दोहराया कि तुम लोग जाओ, मुझे तो ईश्वर बचाने आएंगे। आखिरकार पानी इतना बढ़
गया कि वह व्यक्ति पानी में डूब गया और मर गया।
मरने के बाद वह ईश्वर के पास पहुंचा और ईश्वर पर चिल्लाते हुए कहा कि मैं
आपका बहुत बड़ा भक्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास था कि आप मुझे बचाने अवश्य आएंगे। मैं
प्रतीक्षा करता रहा और आप नहीं आए। अब आप पर कौन
विश्वास करेगा और क्यों कोई आपकी भक्ति करेगा? इस पर ईश्वर ने कहा कि मैंने
तुम्हें बचाने के लिए तीन बार प्रयास किया, लेकिन तुम स्वयं ही बचना
नहीं चाहते थे। पहली बार मैंने तुम्हें बचाने के लिए प्रशासन के लोग भेजे। दूसरी
बार मैंने तुम्हारी रक्षा के लिए एक नाव भेजी। तीसरी बार मैंने तुम्हारे लिए
हेलीकॉप्टर भेजा। फिर भी तुम मेरी सहायता को समझ नहीं सके। याद रखो, मैं किसी माध्यम
से सहायता करता हूँ।
शिक्षा - इस कहानी से हमें शिक्षा
मिलती है कि ईश्वर जिसकी सहायता करना चाहते हैं, वे उस व्यक्ति के लिए सहायता
का कोई न कोई माध्यम बना देते हैं। बस आवश्यकता है, उन दिव्य संकेतों को समझने
की।
Wednesday, 14 January 2026
(2.3.10) जीवन का आनंद और दृष्टिकोण (प्रेरक कहानी) Jivan Ka Anand Aur Drishtikon (Motivational Story / Inspirational Story)
जीवन का आनन्द दृष्टिकोण में है – प्रेरक कहानी Motivational Story / Inspirational Story
जीवन का आनंद और दृष्टिकोण
किसी स्थान पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा था। वहाँ से
गुजर रहे एक संत ने देखा कि निर्माण कार्य के लिए तीन मजदूर धूप में बैठे हुए
पत्थर तोड़ रहे हैं। संत ने उनसे पूछा “तुम क्या कर रहे
हो?” एक मजदूर ने दुःखी मन से उत्तर दिया, “आप देख नहीं रहे हो? मैं पत्थर तोड़
रहा हूं।” वह उत्तर देकर फिर से बुझे मन से पत्थर तोड़ने
लगा।
तभी उस संत की ओर देखते हुए दूसरे मजदूर ने कहा, “बाबा, यह तो रोजी-रोटी है। मैं तो यह काम करके बस अपनी
आजीविका कमा रहा हूं।” उत्तर देकर वह भी अपने काम
में लग गया। लेकिन उत्तर देते समय उस मजदूर के चेहरे पर न तो दुख का भाव था और न
आनंद का।
तभी संत ने अपने प्रश्न का उत्तर पाने की इच्छा से तीसरे मजदूर की तरफ
देखा। तीसरे मजदूर के चेहरे पर आनंद का भाव था और आंखों में चमक थी। उसने उत्तर
दिया “बाबा जी, यहाँ देवी मां का
मंदिर बन रहा है। मंदिर में लोग देवी के दर्शन करके आनंदित होंगे। मैं यही सोच कर
इस मंदिर के निर्माण कार्य में सहयोग कर रहा हूं।”
इन तीनों मजदूरों की बात सुनकर संत भाव - समाधि में डूब गए। सचमुच जीवन तो
वही है, पर दृष्टिकोण भिन्न होने से सब कुछ बदल जाता है।
दृष्टिकोण के भेद से फूल काँटे हो जाते हैं और कांटे फूल हो जाते हैं। आनंद अनुभव
करने का दृष्टिकोण जिसने पा लिया, उसके जीवन में
आनंद के सिवा और कुछ नहीं रहता है।
शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन का आनंद किसी वस्तु या परिस्थिति में नहीं है, बल्कि जीने वाले के दृष्टिकोण में है। स्वयं अपने आप में है। हमको क्या मिला है उसमें नहीं, बल्कि हम उसे पाकर कैसा अनुभव करते हैं? उसे किस तरह से लेते हैं? उसमें है। यही वजह है कि एक ही वस्तु या स्थिति दो भिन्न दृष्टिकोण वाले व्यक्तियों के लिए अलग-अलग अर्थ रखती है। एक को उसमें आनंद की अनुभूति होती है और दूसरे को विषाद की।
Sunday, 11 January 2026
(2.3.9) कर्तव्य और भावना Kartvya Aur Bhawana An Inspirational Story/ Motivational Story
कर्तव्य और भावना Kartvya Aur Bhawana An Inspirational Story/ Motivational Story
कर्तव्य और भावना
प्राचीन समय की बात है। चीन में एक धनवान व्यक्ति रहता था। उसका व्यवसाय
था, भेड़ पालन करना। एक बार उसने भेड़ों को चराने और
उनकी देखभाल करने के लिए दो लड़के रख लिए और दोनों लड़कों को आधी आधी भेड़ें बाँट
दी। कुछ समय तक तो सब ठीक चलता रहा परंतु धीरे-धीरे भेड़ें दुबली होती गई और उनमें
से कुछ तो मर भी गई। उसने जाँच की कि यह सब कैसे और क्यों हुआ?
उसे ज्ञात हुआ कि दोनों लड़के भेड़ों की देखभाल करने के बजाय अपने-अपने
व्यसनों में लगे हुए हैं। उनमें से एक लड़के को जुआ खेलने की आदत थी, उसे जब भी मौका मिलता, वह भेड़ों को छोड़कर जुआ खेलने के लिए जा बैठता था। भेड़ें कहीं से कहीं
पहुँच जाती थी और भूखी प्यासी कष्ट पाती थी। यही बात दूसरे लड़के के साथ भी थी, वह पूजा पाठ करने का आदी था। वह पूजा पाठ करता था और भेड़ों
पर ध्यान नहीं देता था।
दोनों लड़के कर्तव्य पालन की उपेक्षा करते हुए पकड़े गए। उन्हें न्यायाधीश
के सामने प्रस्तुत किया गया। दोनों के कार्य और कारणों में अन्तर था, परंतु कर्तव्य पालन की उपेक्षा करने के लिए दोनों समान रूप से
दोषी थे। न्यायाधीश ने दोनों को समान रूप से दंडित किया और कहा कि कर्तव्य की
उपेक्षा करके, जो भी कुछ किया जाता है वह व्यसन ही है, व्यसन में चाहे जुआ खेला हो चाहे पूजा पाठ किया हो। कर्तव्य
की अपेक्षा तो दोनों में ही है। इसलिए वे दोनों ही समान रूप से दंड के भागी हैं।
शिक्षा - इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि कर्तव्य भावना से बड़ा होता
है। कर्तव्य की उपेक्षा करके दूसरा कोई भी कार्य किया जाए, चाहे वह कितना भी अच्छा क्यों न हो, व्यसन ही माना जाएगा।
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