Saturday, 18 April 2026

(9.3.2/2) श्री मद्भागवत पुराण से क्या शिक्षा मिलती है? Bhagwat Kya Sikhati hai? भागवत की शिक्षा

श्री मद्भागवत पुराण से क्या शिक्षा मिलती है? Bhagwat Kya Sikhati hai? भागवत की शिक्षा

श्री मद्भागवत पुराण केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं है, बल्कि यह एक पूर्ण अध्यात्मिक दर्शन है। जो यह बताता है कि हम कौन हैं? हमारे दुखों का कारण क्या है? ईश्वर कौन है और भक्ति क्या है?

यह समस्त प्राणियों के लिए सांसारिक जीवन जीते हुए ज्ञान तथा मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

यह सिखाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत है। भौतिक दुनियाँ में सुख-दुख अस्थाई हैं। इसलिए आध्यात्मिक ज्ञान को प्रधानता देनी चाहिए।

श्रीमद् भागवत ईश्वर के प्रति निश्छल भक्ति, निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण की शिक्षा देता है। यह ग्रंथ सिखाता है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य संसार में रहते हुए ईश्वर से जुड़ना, मन की शुद्धि, विकारों का त्याग और अंततः भगवत प्राप्ति है।

श्रीमद् भागवत कथा से मिलने वाली कुछ और शिक्षा इस प्रकार है -

(एक) भगवत प्राप्ति के लिए ज्ञान और कर्म से ज्यादा भाव और प्रेम की आवश्यकता है।

(दो) यह मृत्यु के भय को दूर करती है। यह सिखाती है कि यदि व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर चले, तो उसे मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं होती है।

(तीन) हमेशा ही अच्छे कर्म करो, परिणाम क्या आएगा इसके बारे में सोच कर अपने मन की शांति को भंग मत होने दो। ईश्वर को पता है कि आपके लिए सर्वश्रेष्ठ क्या है?

(चार) यदि व्यक्ति पूरे विश्वास के साथ ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है, तो ईश्वरीय शक्ति कभी भी उसे निराश नहीं करती है।

(पाँच) अहंकार व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है और विनम्रता उत्थान की ओर। इसलिए अहंकार को त्याग कर विनम्रता को धारण करना ही हितकारी है।

(छठा) अपने दैनिक क्रिया कलापों को सोच समझ कर करना चाहिए। स्मरण रखिए, व्यक्ति जो कुछ भी संसार को देता है, वही उसको वापस मिलता है। 

(9.3.2/2) श्रीमद्भागवत कथा का महत्व और लाभ Importance and benefits of Bhagwat Katha

श्रीमद्भागवत कथा का महत्व और लाभ Importance and benefits of Bhagwat Katha

श्रीमद्भागवत महापुराण में 12 स्कंध और 18000 श्लोक हैं। इसमें मुख्य रूप से भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण की जीवन लीलाओं, कहानियों और चमत्कारों का विस्तार से वर्णन है। यह भक्ति योग पर केंद्रित है और भक्तों के जीवन को प्रेरणा देता  है। इसका उद्देश्य भगवान की लीलाओं के माध्यम से भक्ति के महत्व को समझाना है।

श्रीमद् भागवत की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की थी और उनके पुत्र शुक देव जी ने इसे राजा परीक्षित को सुनाया था। यह एक कथा के रूप में है, जिसमें भगवान के भक्तों की गाथाएं भी शामिल हैं।

श्री मद्भागवत एक ऐसा महाकाव्य है जो धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान को साझा करता है। भागवत का अर्थ है, “ भगवतः इदं भागवतंअर्थात जो भगवान का है, वही भागवत है। इसे साक्षात श्री हरि का स्वरूप माना जाता है। इसका महत्व और लाभ इस प्रकार हैं -

(एक) श्रीमद्भागवत अनंत ज्ञान का खजाना है, जो हमें मन, शरीर और आत्मा के संबंध में शिक्षित करता है।

(दो) श्रीमद्भागवत कथा, केवल एक कथा मात्र नहीं है, बल्कि यह भगवत प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। इसके सुनने से मनुष्य के जीवन में समस्त पापों का नाश हो जाता है।

(तीन) भागवत साक्षात भगवान का रूप है, इसलिए इसका पठन तथा श्रवण से बैकुंठ का फल प्रदान करता है।

(चार) श्री मद्भागवत कथा का महत्व बताते हुए श्री शुकदेव जी ने कहा है कि अमृत का फल केवल दीर्घायु है यानि अमृत केवल दीर्घायु प्रदान करता है, जबकि श्रीमद् भागवत कथा का फल भगवत प्राप्ति और पापों का नाश है। यह कथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

(पाँच) जिस प्रकार भगवान के नाम में समस्त शक्तियां समाहित हैं, उसी प्रकार श्रीमद् भागवत के हर श्लोक में पूर्ण शक्ति होती है। यह शक्ति मनुष्य को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।

(छः) श्रीमद्भागवत की कथाएं सुनने से मनुष्य को सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है, जिससे उसके विचार और कार्य सत्य की दिशा में आगे बढ़ते हैं। परहित के कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है, जिससे उसे सही दिशा में आगे बढ़ने का बल मिलता है।

(सात) इसकी कथा सुनने से मोक्ष और भगवान की निष्काम भक्ति प्राप्त होती है।

(आठ) भागवत पुराण मुक्ति का ग्रंथ है, इसलिए इसके आयोजन से पितरों को शांति मिलती है। इससे सभी तरह के ग्रह दोष, पितृ दोष आदि समाप्त हो जाते हैं और नकारात्मक ऊर्जा निष्प्रभावी हो जाती है। 

(9.3.2/1) श्रीमद्भागवत की रचना किसने की और क्यों की? Bhagwat Ki Rachna Kisne Kee? Kyon Kee ?

श्रीमद्भागवत की रचना किसने की और क्यों की? Bhagwat Ki Rachna Kisne Kee? Kyon Kee ?

पराशर ऋषि के पुत्र श्री वेदव्यास जी ने कलयुग को आया देखकर सर्व कल्याण की भावना से वेद को चार भागों में विभक्त कर दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने 17 पुराणों की रचना की और महाभारत भी लिख दिया। इतना सब करने पर भी उनके मन को शान्ति नहीं मिली। वे असंतोष और अशांति का अनुभव कर रहे थे।

एक दिन व्यास जी अशांति के विचारों में डूब कर बैठे हुए थे। संयोग से उसी समय नारद जी अपनी वीणा लिए हुए वहाँ आ गए। व्यास जी को विचार मग्न और उदास देखकर नारद जी ने उनके दुख का कारण पूछा। इस पर व्यास जी ने उत्तर दिया कि मैंने इतिहास, पुराण, महाभारत आदि ग्रंथों की रचना की है, परंतु मेरा चित्त सुखी नहीं है, मैं अभी भी असंतुष्टि का अनुभव कर रहा हूं। मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मुझे कुछ और करना चाहिये। लेकिन क्या करना चाहिये? यह मैं समझ नहीं पा रहा हूँ। अब आप ही मुझे ऐसा कुछ बताइए जिससे मेरे मन को संतुष्टि मिल जाए।

नारद जी ने व्यास जी की बात को ध्यान से सुना और कहा कि आपने पुराणों तथा महाभारत में धर्म का निरूपण किया है, परंतु आपने भगवान श्री हरि की निर्मल भक्ति और प्रेम की कथाएं नहीं लिखी हैं। मनुष्य मात्र को सच्चा सुख भगवान की भक्ति के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है। इसलिए अब आप दुखी लोगों के दुखों को दूर करने के लिए भगवान की सगुण लीलाओं का वर्णन करो। जिससे सब लोगों में भगवान की भक्ति उत्पन्न हो और उनका कल्याण हो।

इस संदर्भ में महर्षि वेदव्यास जी का मार्गदर्शन करने के लिए नारद जी ने उन्हें चार श्लोक बताएं। यही चार श्लोक चतु:श्लोकी भागवत के नाम से जाने जाते हैं। इन चार श्लोक का विस्तार करके ही वेदव्यास जी ने नारद जी की प्रेरणा से 18000 श्लोक वाले श्रीमद्भागवत महापुराण की रचना की।

Saturday, 4 April 2026

(2.4.5) सात उपयोगी बातें Seven Useful Things

सात उपयोगी बातें Seven Useful Things

(पहली) भविष्य उनका है, जो अपने सपनों की सुंदरता में विश्वास रखते हैं और भविष्य उनका भी है, जो आज उसके लिए तैयारी करते हैं।

(दूसरी) गति से ज्यादा दिशा मायने रखती है।

(तीसरी) ज्ञानी का मार्ग कर्म करना है, प्रतिस्पर्धा नहीं।

(चौथी) अंधकार प्रकाश का अभाव है और अहंकार जागरूकता का अभाव है।

(पांचवी) खुशी से यात्रा करना, गंतव्य स्थान पर पहुंचने से बेहतर है।

(छठी) मुस्कुराहट अच्छे रिश्ते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

(सातवीं) अच्छा करने का प्रयास करना महत्वपूर्ण है, परंतु उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण है, बुराई से दूर रहने का प्रयास करना। 

(2.4.4) आत्मविश्वासी लोगों की सात विशेषताएं Seven Qualities of Confident People

आत्मविश्वासी लोगों की सात विशेषताएं Seven Qualities of Confident People

(पहली) वे लोगों से आंखों में आंखें डाल कर बात करते हैं।

(दूसरी) उन्हें दूसरों से मान्यता की आवश्यकता नहीं होती है।

(तीसरी) वे अपनी गलतियों को स्वीकार करने से डरते नहीं है, बल्कि वे उनसे कुछ न कुछ नया सीखते हैं।

(चौथी) वे अपनी ताकत और कमजोरी को जानते हैं।

(पांचवी) वे बदलाव को स्वीकार करते हैं और चुनौतियों को अवसर के रूप में देखते हैं।

(छठी) वे फायदे और नुकसान का आकलन कर लेते हैं और जोखिम उठाने से डरते नहीं है।

(सातवीं) वे बोलते कम और सुनते ज्यादा हैं।

 

(2.4.3) सफल व्यक्तियों की आदतें Habits of Successful People

सफल व्यक्तियों की आदतें Habits of Successful People

वे प्रातः काल जल्दी उठते हैं।

वे प्रतिदिन नया पढ़ते हैं और कुछ नया सीखते हैं।

वे जिम्मेदारी लेते हैं और उसे पूरी तरह निभाते भी हैं।

वे गलती को स्वीकार करते हैं और दूसरों पर दोषारोपण नहीं करते हैं।

वे बहाने बाजी नहीं करते हैं।

वे आज के काम को कल पर नहीं टालते हैं।

वे आत्म अनुशासित होते हैं।

वे सोच समझकर किसी कार्य को शुरू करते हैं और फिर उसे बीच में नहीं छोड़ते हैं।

वे समस्या से घबराते नहीं हैं, बल्कि वे इसका कोई न कोई समाधान निकाल लेते हैं।

वे अपनी प्रशंसा और प्रोत्साहन सुनकर भी निरपेक्ष रहते हैं और हमेशा अपना संतुलन बनाए रखते हैं।

वे आलोचना को भी सकारात्मक ढंग से स्वीकार करते हैं।

वे समय का मूल्य समझते हैं, इसलिए वे इसका प्रबंधन करते हैं और इसे रचनात्मक कार्यों में लगाते हैं।

Friday, 3 April 2026

(2.4.2) आदर्श दिनचर्या An Ideal Daily Routine / What is an Ideal Daily Routine

 आदर्श दिनचर्या An Ideal Daily Routine

प्रातः काल उठने से लेकर रात को सोने तक किए जाने वाले कार्यों को सामूहिक रूप से दिनचर्या कहा जाता है। एक आदर्श दिनचर्या वह है, जो व्यक्ति में शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाए रखे।

स्वस्थ मनुष्य की दिनचर्या में शामिल है, प्रातः काल चार से पांच बजे के बीच उठ जाना, हल्का व्यायाम या प्रातः भ्रमण करना, समय पर नाश्ता और दोनों समय संतुलित भोजन करना, दिन में अपने व्यवसाय से संबंधित कार्य को करना, रात का भोजन हल्का हो और इसे सोने से कम से कम दो घंटे पहले खा लेना। रात में 10:00 बजे तक सो जाना यानि कम से कम 6 या 7 घंटे की नींद लेना आवश्यक है।

दिन चर्या के लिये सुझाव -

प्रातः काल नींद खुलते ही दोनों हाथों की हथेलियों को देखते हुए यह श्लोक बोलें -

कराग्रे वसते लक्ष्मी: , कर मध्य सरस्वती।

कर मूले स्थितो ब्रह्मा, प्रभाते कर दर्शनम् ।।

अर्थात - हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी, हाथ के मध्य में सरस्वती और हाथ के मूल भाग में ब्रह्मा जी निवास करते हैं, अतः प्रातः काल दोनों हाथों का अवलोकन करना चाहिए।

दैनिक कार्य से निवृत होने के बाद निम्नांकित मंत्रों का कम से कम 11 बार जप करें (ज्यादा कर सको तो और अच्छा ) -

(पहला) गायत्री मंत्र -

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्

(दूसरा) शिव मंत्र -

ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ

(तीसरा) सूर्यदेव का एकाक्षरी बीज मंत्र -

यह मंत्र इस प्रकार है - ॐ घृणि: सूर्याय नमः

इसके बाद मन में निम्नांकित संकल्प दो तीन बार दोहराओ -

Day by day in every way, through the grace of God, I am getting better and better.

इसके बाद जो भी अपना दिन भर का कार्य है, उसे उत्साह और प्रसन्नता के साथ करो।

रात्रि में सोने से पहले किए जाने वाले कार्य -

सोने से पहले बिस्तर पर बैठ कर या लेटकर गायत्री मंत्र और शिव मंत्र का ग्यारह - ग्यारह बार जप करो। और फिर ईश्वर से यह प्रार्थना करें,  हे ईश्वर मुझे और मेरे परिवार को अच्छी नींद और सुरक्षा प्रदान करो और कल के लिए नई ऊर्जा दो। फिर  ॐ शान्ति, शान्ति, शान्तिबोल कर सो जाओ।

 

Tuesday, 24 February 2026

(7.3.6) होलाष्टक क्या होते हैं /होलाष्टक में क्या करें क्या नहीं करें Holashtak Kya Hote Hain? Holashtak Me Kya Karen

 होलाष्टक क्या होते हैं होलाष्टक में क्या करें क्या नहीं करें Holashtak Kya Hote Hain? Holashtak Me Kya Karen
होलाष्टक क्या होते हैं ? होलाष्टक किसे कहते हैं

होली हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योंहार है.फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है. पूर्णिमा से आठ दिन पूर्व यानि फाल्गुन शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक की आठ दिन की अवधि होलाष्टक कहलाती है यानि होलाष्टक अष्टमी तिथि को शुरू होते हैं और होलिका दहन के साथ ही समाप्त हो जाते हैं.

होलाष्टक को अशुभ काल या अशुद्ध कालांश माना जाता है. इसलिए इस अवधि में कोई भी शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं.

होलाष्टक में वर्जित कार्य इस प्रकार हैं - 

किसी भी उद्देश्य के लिए भवन का निर्माण करना.

गृह प्रवेश करना.       

सगाई अथवा विवाह करना.

वाहन क्रय करना.

कुआ, जलाशय आदि खुदवाना,

मुंडन संस्कार करना.

किसी भी व्रत का आरम्भ और उद्यापन करना.

नव विवाहिता वधु का प्रवेश.

देव प्रतिमा की स्थापना करना.

यज्ञोपवीत संस्कार.

मन्त्र दीक्षा लेना.

कर्ण वेध.

आदि कार्य नहीं करने चाहिए.

लेकिन जो कार्य पहले शुरू किये जा चुके हैं, उन कार्यों को जारी रखा जा सकता है. नित्य एवं नैमित्तिक कर्म किये जा सकते हैं. इनके अतिरिक्त सूतिका स्नान आदि कार्य जिनकी अवधि निश्चित होती है वे कार्य किये जा सकते हैं.