Sunday, 3 May 2026

(7.1.37) अधिक मास नहीं हो तो क्या होगा What will happen if there is no Adhik Maas अधिक मास महत्व क्या है

अधिक मास नहीं हो तो क्या होगा What will happen if there is no Adhik Maas अधिक मास महत्व क्या है   

सनातन पंचांग की काल गणना के अनुसार मास दो प्रकार के होते हैं, जिनके नाम है चंद्र मास और सौर मास। चंद्र मास, चंद्रमा की गति पर आधारित होता है और सौर मास, सूर्य की गति पर आधारित होता है।

एक अमावस्या से अगली अमावस्या या एक पूर्णिमा से अगली पूर्णिमा के बीच की अवधि को एक चंद्र मास कहा जाता है। बारह चंद्रमास की अवधि को एक चंद्रवर्ष कहा जाता है।

सूर्य एक राशि पर 1 महीने तक रहता है। सूर्य के एक राशि पर रहने की अवधि को सौर मास कहा जाता है। और 12 सौर मास की अवधि को एक सौर वर्ष कहा जाता है।

एक चंद्र वर्ष में 354 दिन होते हैं और एक सौर वर्ष में 365 दिन होते हैं। इस तरह दोनों वर्षों के बीच 1 वर्ष में 11 दिन का अंतर आ जाता है। चंद्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच आए इन ग्यारह दिनों के अंतर को समाप्त करने के लिए 3 साल में अधिक मास की व्यवस्था की गई है।

अधिक मास नहीं हो, तो क्या होगा?

हिंदू धर्म में सभी पर्व ऋतु के आधार पर मनाए जाते हैं। यदि अधिक मास नहीं आए तो त्यौहार और ऋतुओं के बीच तालमेल नहीं रहेगा। प्रत्येक त्यौहार प्रतिवर्ष 11 दिन पीछे हट जाएगा। और हर तीन साल में सारे त्योहार एक महीने पीछे आएंगे।  इस प्रकार लंबी अवधि में जो त्यौहार वर्षा ऋतु में आता है वह धीरे-धीरे ग्रीष्म ऋतु या शीत ऋतु में आने लगेगा।

उदाहरण के लिए शीत ऋतु की समाप्ति पर आने वाला बसंत पंचमी का पर्व माघ माह के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। यदि अधिक मास न हो, तो यह पंचमी का पर्व प्रतिवर्ष 11 दिन पहले आने लगेगा। परिणाम स्वरूप यह वर्षा ऋतु में और ग्रीष्म ऋतु में भी आने लगेगा। जिससे ऋतुओं और त्योहारों के बीच सामंजस्य नहीं रहेगा।

इसी तरह के तालमेल को बिठाने के लिए ग्रेगोरियन कैलेंडर में भी प्रत्येक चौथे वर्ष फरवरी के महीने में एक दिन बढ़ा कर 28 दिन के बजाय 29 दिन कर दिए जाते हैं। इस वर्ष को लीप यीयर कहा जाता है।

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(7.1.36) लीप ईयर और अधिक मास में क्या अंतर है Difference between Adhik Maas and Leap Year

लीप ईयर और अधिक मास में क्या अंतर है Difference between Adhik Maas and Leap Year 

लीप ईयर और अधिक मास के अंतर को जानने से पहले हम यह जानेंगे की लीप ईयर किसे कहते हैं और अधिक मास किसे कहते हैं।

लीप ईयर किसे कहते हैं?

ग्रेगोरियन कैलेंडर सूर्य की गति पर आधारित होता है। इसके अनुसार 1 वर्ष में 365 दिन और 6 घंटे होते हैं। इन अतिरिक्त 6 घंटे को हर चौथे वर्ष जोड़कर एक पूरा दिन बना दिया जाता है जिससे वह वर्ष 365 दिन के बजाय 366 दिन का हो जाता है। इसे ही लीप ईयर कहा जाता है। लीप ईयर में फरवरी 29 दिन की होती है।

अधिक मास किसे कहते हैं?

सनातन पंचांग के अनुसार काल गणना चंद्रमा और सूर्य दोनों की गति के अनुसार की जाती है। चंद्रमा की गति के अनुसार एक चंद्र वर्ष 354 दिन का होता है और सूर्य की गति के अनुसार एक सौर वर्ष 365 दिन का होता है। चंद्रवर्ष और सौर वर्ष के बीच 11 दिन का अंतर आ जाता है। इन 11 दिनों को हर तीसरे वर्ष जोड़कर एक अतिरिक्त महीना बना दिया जाता है। इस अतिरिक्त महीने को अधिक मास कहा जाता है।

लीप ईयर और अधिक मास में अंतर

पहला - लीप ईयर का संबंध ग्रेगोरियन कैलेंडर से है। जबकि अधिक मास का संबंध सनातन पंचांग से है।

दूसरा - लीप ईयर हर चौथे साल आता है जबकि अधिक मास हर तीसरे साल आता है।

तीसरा - लीप ईयर में एक वर्ष में केवल एक दिन की वृद्धि होती है, जबकि अधिक मास में 1 वर्ष में एक माह की वृद्धि हो जाती है।

चौथा - लीप ईयर में बढ़ने वाला एक दिन केवल फरवरी के महीने में ही बढ़ता है, जबकि अधिक मास के रूप में बढ़ने वाला ऐसा कोई एक महीना निश्चित नहीं है।

पांचवां - लीप ईयर का कोई धार्मिक महत्व नहीं है जबकि अधिक मास का आध्यात्मिक और धार्मिक महत्व है। 

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(7.1.35) अधिक मास का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व Religious and Spiritual Importance of Adhik Maas

अधिक मास का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व Religious and Spiritual Importance of Adhik Maas 

हिंदू पंचांग के अनुसार अधिक मास हर तीसरे साल में आने वाला अतिरिक्त महीना है। इसका धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व इस प्रकार है -

अधिक मास भगवान विष्णु को समर्पित होने के कारण विशेष फलदायी माना जाता है।

भगवान विष्णु ने ही इस महीने को पुरुषोत्तम मास का नाम दिया है।

यह महीना आत्म शुद्धि, भक्ति और दान पुण्य के लिए अति उत्तम है।

इस महीने में किए गए जब जप, तप, दान, हवन आदि का फल तुलनात्मक रूप से 10 गुना अधिक मिलता है।

इस महीने में सात्विक जीवन जीने की अपेक्षा की जाती है। इसमें किए गए सात्विक आचरण और व्यवहार से व्यक्ति में आत्म उन्नति का भाव जागृत होता है।

साधु संतों की सेवा करने और सत्संग में समय बिताने को अधिक महत्व दिया जाता है। इससे समर्पण की भावना विकसित होती है।

इस महीने में किए गए धार्मिक कार्यों, दान, पुण्य आदि से पापों का नाश होता है और व्यक्ति को मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

अधिक मास में आने वाली परमा एकादशी और पद्मिनी एकादशी का व्रत रखने से सभी प्रकार के पापों से मुक्ति मिलती है।

यह महीना आध्यात्मिक विकास, सेवा भाव, आत्म चिंतन और ईश्वरीय आराधना - उपासना के लिए श्रेष्ठ समय है।

इस महीने में किए गए निस्वार्थ कार्य व्यक्ति के आध्यात्मिक पुण्य में वृद्धि करते हैं। 

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Saturday, 2 May 2026

(1.1.28) स्वर्ग से आने वाले व्यक्ति के लक्षण Swarg Se Aane Vale Vyakti Ke Lakshan

स्वर्ग से आने वाले व्यक्ति के लक्षण Swarg Se Aane Vale Vyakti Ke Lakshan 

स्वर्ग से आने वाले व्यक्ति के लक्षण

सभी व्यक्ति अपने-अपने अच्छे और बुरे कर्मों के अनुसार फल भोगते हैं। अच्छे कर्म करने वाले स्वर्ग में चले जाते हैं और बुरे कर्म करने वाले नरक में चले जाते हैं। जिन लोगों के कर्म सामान्य होते हैं वे फिर से जन्म लेते हैं, ताकि वे अच्छे कर्म कर सकें। स्वर्ग में जाने वाले लोग अपने पुण्य का फल भोगते हैं और जब वह पुण्य फल समाप्त हो जाता है, तो वे फिर से इस धरती पर जन्म लेते हैं। यह जन्म मरण का चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक व्यक्ति का मोक्ष नहीं हो जाता।

जब कोई व्यक्ति इस संसार में जन्म लेता है, तो उसको पिछले जन्म के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं होता है। लेकिन उस व्यक्ति में कुछ ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं, जिनके आधार पर यह ज्ञात होता है कि वह व्यक्ति स्वर्ग से आया है। ये लक्षण इस प्रकार हैं -

(पहला) उस व्यक्ति की वाणी में मिठास होता है, वह प्रेम पूर्वक और बिना अभिमान के बात करता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, लोग उसकी बात को ध्यान पूर्वक सुनते हैं।

(दूसरा) उसमें दान देने के प्रवृत्ति होती है। वह बिना किसी लालच के या स्वार्थ के यथाशक्ति दान देता है तथा वह समाज सेवा के कई कार्य करता है, जो समाज के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं।

(तीसरा) वह देवताओं की पूजा अर्चना करता है, धार्मिक कार्यों में रुचि रखता है और ऐसे कई कार्य करता है जो उसकी धार्मिक रुचि को प्रकट करता है।

(चौथा) वह विद्वानों और साधु संतों का आदर करता है तथा उन्हें अपने कार्य और व्यवहार से संतुष्ट रखता है। वह अपने हित के पहले दूसरों का हित के बारे में सोचता है।

(पांचवा) उस व्यक्ति में दया की भावना होती है। वह दूसरे व्यक्तियों को अपने कार्य, व्यवहार और आचरण से कभी भी दुखी नहीं करता है, यहाँ तक कि जानवरों के प्रति भी उसके मन में दया का भाव होता है और हो सके जहाँ तक वह उनकी सहायता करता है।

(1.1.27) विपत्ति में कौन साथ देता है Vippati Me Kaun Saath Deta Hai / Vipatti Ke Saathi Kaun Hain

विपत्ति में कौन साथ देता है Vippati Me Kaun Saath Deta Hai / Vipatti Ke Saathi Kaun Hain

विपत्तियां जीवन का आवश्यक अंग है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन काल में कई बार अनेक समस्याओं का, परेशानियों का और विपत्तियों का सामना करना पड़ता है और उन्हें दूर करने के लिए कोई न कोई उपाय सोचता है।

महान कवि तुलसीदास जी ने एक दोहे माध्यम से बताया है कि  विपत्ति के समय ये सात गुण व्यक्ति का साथ देते हैं और उसे विपत्ति  से बचाते हैं। यह दोहा इस प्रकार है - 

तुलसी साथी विपत्ति के विद्या, विनय, विवेक।

साहस, सुकृति, सुसत्यव्रत, राम भरोसे एक।

इस दोहे में वे कहते हैं कि विपत्ति या कठिनाई के समय में ये सात चीजें व्यक्ति का साथ देती हैं। ये सात चीज हैं - विद्या यानि ज्ञान, विनम्रता, विवेक, साहस, सुकृति यानि अच्छे कर्म, सुसत्यव्रत यानि सत्य के प्रति निष्ठा और भगवान राम में पूर्ण विश्वास।

विद्या के द्वारा व्यक्ति उस समस्या या विपत्ति के कारण को समझने का प्रयास करता है और उससे बाहर निकलने का उपाय ढूंढता है।

विनम्रता से अन्य लोगों का सहयोग प्राप्त करता है।

विवेक से सही गलत का निर्णय करता है।

साहस के माध्यम से वह बिना घबराए विपत्ति का सामना कर पाता है।

सुकृति यानि अच्छे कर्मों से वह विपत्ति को दूर करने का उपाय ढूंढ लेता है।

सत्य का व्रत उसे मानसिक रूप से मजबूत बनाता है।

और इन सबसे अधिक भगवान राम पर उसका भरोसा और विश्वास।

ये उसे टूटने नहीं देते हैं, उसका आत्मविश्वास डगमगाता नहीं है और वह उस विपत्ति से छुटकारा पा लेता है। 

(8.1.34) करवा चौथ व्रत / करवा चौथ व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व Religious and Spiritual Importance of Karawa Chauth Vrat

करवा चौथ व्रत / करवा चौथ व्रत का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व Religious and Spiritual Importance of Karawa Chauth Vrat 

भारतीय संस्कृति में व्रत और त्योहार केवल धार्मिक रीति रिवाज तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि ये जीवन और रिश्तो में प्रेम, विश्वास और कर्तव्य भाव को प्रगाढ़ करने वाले शुभ अवसर होते हैं।

कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला करवा चौथ का पर्व न केवल धार्मिक पर्व है बल्कि यह गहन आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश देने वाला पर्व भी है। यह पति-पत्नी के बीच अटूट प्रेम, निष्ठा, और समर्पण की भावना का उत्सव भी है। करवा चौथ हिंदू धर्म में विवाहित महिलाओं का अत्यंत महत्वपूर्ण व्रत है। इस व्रत को महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन में सुख शांति की कामना के लिए रखती हैं।

धार्मिक दृष्टि से यह मान्यता है कि देवी पार्वती ने भी इसी व्रत को रखकर भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त किया था।

इस व्रत को पति-पत्नी के बीच प्रेम, सौभाग्य और रिश्तों की मजबूती का प्रतीक माना जाता है।

इस दिन महिलाएं सूर्योदय से लेकर चंद्रमा के दर्शन तक बिना जल और अन्न ग्रहण किये व्रत रखती हैं और भगवान शिव और पार्वती से अपने पति के दीर्घायु और परिवार की सुख समृद्धि के लिये प्रार्थना करती हैं।

वर्तमान में जब वैवाहिक जीवन में कटुता, अविश्वास और संदेह की भावना विकसित होती जा रही है, तो ऐसे समय में करवा चौथ के व्रत का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। क्योंकि यह व्रत  पति-पत्नी के रिश्ते को मजबूत और मधुर बनाने के लिए ही किया जाता है। इस व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने पति के प्रति अपनी निष्ठा, प्रेम और समर्पण को प्रदर्शित करती है। यह प्रेम और समर्पण दांपत्य जीवन के लिए आवश्यक और आधारभूत तत्व है। करवा चौथ के व्रत के माध्यम से महिलाएं अपने पति के साथ अपने संबंधों को और अधिक प्रगाढ़ करती हैं। यह एक ऐसा अवसर है जब पति-पत्नी एक दूसरे के प्रति अपने प्रेम, निष्ठा, विश्वास और सम्मान को बनाए रखने के लिए संकल्पित होते हैं।

 

(2.4.6) ज्ञानी और मूर्ख एक समान कब हो जाते हैं? Gyani Aur Moorkh Ek Samaan Ho Jaate Hain

ज्ञानी और मूर्ख एक समान कब हो जाते हैं? Gyani Aur Moorkh Ek Samaan Ho Jaate Hain

ज्ञानी और मूर्ख एक समान कब हो जाते हैं? इस संबंध में तुलसीदास जी द्वारा रचित एक दोहा इस प्रकार है -

काम, क्रोध, मद, लोभ की, जौ लौं मन में खान।

तौ लौं पंडित, मूरखों, तुलसी एक समान।

इस दोहे का अर्थ इस प्रकार है -

तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य की मन रूपी खान में काम, क्रोध, घमंड, अहंकार और लालच भरे हुए हैं तब तक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति के बीच में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं होता है। दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं।

इसका तात्पर्य यह है कि जब किसी व्यक्ति के मन में काम यानि विभिन्न प्रकार की कामनायें और इच्छाएं,  क्रोध, लालच और घमंड आ जाता है, तो वह व्यक्ति कितना भी ज्ञानी क्यों न हो, उसका ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है और वह मूर्ख की तरह व्यवहार करने लगता है अर्थात उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, जिससे उसके द्वारा किए गए कार्य मूर्खता पूर्ण लगने लगते हैं। इसलिए तुलसीदास जी ने इस स्थिति को ज्ञानी और मूर्ख की एक समान स्थिति कहा है। यानि ज्ञानी और मूर्ख एक जैसे ही हो जाते हैं। उनमें कोई भेद नहीं रह जाता है।

Saturday, 18 April 2026

(9.3.2/2) श्री मद्भागवत पुराण से क्या शिक्षा मिलती है? Bhagwat Kya Sikhati hai? भागवत की शिक्षा

श्री मद्भागवत पुराण से क्या शिक्षा मिलती है? Bhagwat Kya Sikhati hai? भागवत की शिक्षा

श्री मद्भागवत पुराण केवल एक धार्मिक ग्रंथ ही नहीं है, बल्कि यह एक पूर्ण अध्यात्मिक दर्शन है। जो यह बताता है कि हम कौन हैं? हमारे दुखों का कारण क्या है? ईश्वर कौन है और भक्ति क्या है?

यह समस्त प्राणियों के लिए सांसारिक जीवन जीते हुए ज्ञान तथा मुक्ति का मार्ग दिखाता है।

यह सिखाता है कि शरीर नश्वर है और आत्मा शाश्वत है। भौतिक दुनियाँ में सुख-दुख अस्थाई हैं। इसलिए आध्यात्मिक ज्ञान को प्रधानता देनी चाहिए।

श्रीमद् भागवत ईश्वर के प्रति निश्छल भक्ति, निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण की शिक्षा देता है। यह ग्रंथ सिखाता है कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य संसार में रहते हुए ईश्वर से जुड़ना, मन की शुद्धि, विकारों का त्याग और अंततः भगवत प्राप्ति है।

श्रीमद् भागवत कथा से मिलने वाली कुछ और शिक्षा इस प्रकार है -

(एक) भगवत प्राप्ति के लिए ज्ञान और कर्म से ज्यादा भाव और प्रेम की आवश्यकता है।

(दो) यह मृत्यु के भय को दूर करती है। यह सिखाती है कि यदि व्यक्ति भक्ति के मार्ग पर चले, तो उसे मृत्यु से डरने की आवश्यकता नहीं होती है।

(तीन) हमेशा ही अच्छे कर्म करो, परिणाम क्या आएगा इसके बारे में सोच कर अपने मन की शांति को भंग मत होने दो। ईश्वर को पता है कि आपके लिए सर्वश्रेष्ठ क्या है?

(चार) यदि व्यक्ति पूरे विश्वास के साथ ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाता है, तो ईश्वरीय शक्ति कभी भी उसे निराश नहीं करती है।

(पाँच) अहंकार व्यक्ति को विनाश की ओर ले जाता है और विनम्रता उत्थान की ओर। इसलिए अहंकार को त्याग कर विनम्रता को धारण करना ही हितकारी है।

(छठा) अपने दैनिक क्रिया कलापों को सोच समझ कर करना चाहिए। स्मरण रखिए, व्यक्ति जो कुछ भी संसार को देता है, वही उसको वापस मिलता है। 

(9.3.2/2) श्रीमद्भागवत कथा का महत्व और लाभ Importance and benefits of Bhagwat Katha

श्रीमद्भागवत कथा का महत्व और लाभ Importance and benefits of Bhagwat Katha

श्रीमद्भागवत महापुराण में 12 स्कंध और 18000 श्लोक हैं। इसमें मुख्य रूप से भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों और विशेष रूप से भगवान श्री कृष्ण की जीवन लीलाओं, कहानियों और चमत्कारों का विस्तार से वर्णन है। यह भक्ति योग पर केंद्रित है और भक्तों के जीवन को प्रेरणा देता  है। इसका उद्देश्य भगवान की लीलाओं के माध्यम से भक्ति के महत्व को समझाना है।

श्रीमद् भागवत की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की थी और उनके पुत्र शुक देव जी ने इसे राजा परीक्षित को सुनाया था। यह एक कथा के रूप में है, जिसमें भगवान के भक्तों की गाथाएं भी शामिल हैं।

श्री मद्भागवत एक ऐसा महाकाव्य है जो धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान को साझा करता है। भागवत का अर्थ है, “ भगवतः इदं भागवतंअर्थात जो भगवान का है, वही भागवत है। इसे साक्षात श्री हरि का स्वरूप माना जाता है। इसका महत्व और लाभ इस प्रकार हैं -

(एक) श्रीमद्भागवत अनंत ज्ञान का खजाना है, जो हमें मन, शरीर और आत्मा के संबंध में शिक्षित करता है।

(दो) श्रीमद्भागवत कथा, केवल एक कथा मात्र नहीं है, बल्कि यह भगवत प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। इसके सुनने से मनुष्य के जीवन में समस्त पापों का नाश हो जाता है।

(तीन) भागवत साक्षात भगवान का रूप है, इसलिए इसका पठन तथा श्रवण से बैकुंठ का फल प्रदान करता है।

(चार) श्री मद्भागवत कथा का महत्व बताते हुए श्री शुकदेव जी ने कहा है कि अमृत का फल केवल दीर्घायु है यानि अमृत केवल दीर्घायु प्रदान करता है, जबकि श्रीमद् भागवत कथा का फल भगवत प्राप्ति और पापों का नाश है। यह कथा देवताओं के लिए भी दुर्लभ है।

(पाँच) जिस प्रकार भगवान के नाम में समस्त शक्तियां समाहित हैं, उसी प्रकार श्रीमद् भागवत के हर श्लोक में पूर्ण शक्ति होती है। यह शक्ति मनुष्य को सकारात्मक ऊर्जा से भर देती है।

(छः) श्रीमद्भागवत की कथाएं सुनने से मनुष्य को सत्य का ज्ञान प्राप्त होता है, जिससे उसके विचार और कार्य सत्य की दिशा में आगे बढ़ते हैं। परहित के कार्य करने की प्रेरणा मिलती है। आत्मविश्वास और आंतरिक शक्ति प्राप्त होती है, जिससे उसे सही दिशा में आगे बढ़ने का बल मिलता है।

(सात) इसकी कथा सुनने से मोक्ष और भगवान की निष्काम भक्ति प्राप्त होती है।

(आठ) भागवत पुराण मुक्ति का ग्रंथ है, इसलिए इसके आयोजन से पितरों को शांति मिलती है। इससे सभी तरह के ग्रह दोष, पितृ दोष आदि समाप्त हो जाते हैं और नकारात्मक ऊर्जा निष्प्रभावी हो जाती है।