भगवान श्री कृष्ण की शिक्षा Teachings Of Shri Krishna
खुशी मन की एक अवस्था है, जो बाहरी दुनियां से नहीं
मिल सकती है। खुश रहने का एकमात्र उपाय है, इच्छाओं
की कमी करना।
क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र
होती है। जब बुद्धि व्यग्र होती है, तब तर्क नष्ट हो जाता है
और जब तर्क नष्ट हो जाता है तो व्यक्ति का पतन शुरू हो जाता है।
व्यक्ति अपने विश्वास से निर्मित होता है; जैसा
वह विश्वास करता है, वैसा ही वह बन जाता है।
सर्वोच्च शांति के लिए हमें हमारे कर्मों के सभी परिणाम और लगाव को
छोड़ देना चाहिए।
संदेह, संशय, दुविधा और द्वन्द में जीने वाले लोग न तो इस लोक में सुख
पाते हैं और न ही परलोक में। ऐसे व्यक्तियों का जीवन दिशाहीन और भटकाव
से भरा रहता है।
न कोई मरता है और न कोई मारता है। यह सब निमित्त मात्र है। सभी
प्राणी जन्म से पहले बिना शरीर के थे और मरने के उपरांत वे फिर
से बिना शरीर के हो जाएंगे।
सीधे रास्ते से यदि कोई कार्य नहीं बने तो, कूटनीति का रास्ता अपनाने
में भी हिचक नहीं करनी चाहिए।
संकट का समय, घबराने का समय नहीं है। यह खुद को सिद्ध करने का समय है अतः
स्वयं पर विश्वास करके आए हुए संकट का सामना करो।
परिस्थितियां कितनी भी खराब क्यों न हो, समय के साथ सब ठीक हो
जाता है।
स्वयं का आकलन करें और मन पर नियंत्रण रखें।
जीवन में संघर्ष है, लेकिन इसमें सफलता प्राप्ति का आनंद भी है।
जीवन उत्सव है, जिसमें कर्तव्य तो है, लेकिन काम का बोझ नहीं
है।