Saturday, 14 February 2026

(6.1.15) देव शयन काल क्या होता है? हरि शयनकाल कब शुरू होता है Dev Shayan Kaal /Hari Shayan Kaal Kya Hota Hai ?

देव शयन काल क्या होता है? हरि शयनकाल कब शुरू होता है Dev Shayan Kaal /Hari Shayan  Kaal  Kya Hota Hai ? 

पौराणिक कथा के अनुसार जब श्री हरिविष्णु ने वामन रूप में अवतार धारण किया और चक्रवर्ती सम्राट राजा बलि के पास तीन कदम धरती यज्ञ के लिए दान में मांगने गए, तब राजा बलि के द्वारा तीन कदम धरती दान में देने के उपरांत श्री हरि विष्णु ने पहले कदम में संपूर्ण धरती, आकाश और पाताल को नाप लिया। दूसरे कदम में ब्रह्म लोक, देवलोक और संपूर्ण ब्रह्मांड को नाप लिया और तीसरा पग रखने के लिए राजा बलि से पूछा कि तीसरा पग कहां रखूंतो राजा बलि ने तीसरा पग अपने सिर पर रखने को कहा, ताकि उका दान वचन संकल्प पूरा हो सके। तब श्री हरि विष्णु ने तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखा। जिसके प्रभाव से राजा बलि का पाताल लोक में गमन हो गया।

इस पर श्री हरि विष्णु ने राजा बलि को पाताल लोक का राजा घोषित कर दिया और आशीर्वाद दिया वे स्वयं उके राज्य की रक्षा करेंगे। जिस समय भगवान विष्णु 4 माह के लिए क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं, तो उनका एक रूप राजा बलि को दिए हुए वचन को पूरा करने के लिये भी रहता है।

इन्हीं 4 माह की योग निद्रा को चातुर्मास कहा जाता है। और यही चार माह की अवधि देव शयन काल या हरि शयन काल कहलाती है।

हिंदू पंचांग के अनुसार यह चार माह की अवधि आषाढ़ शुक्ल एकादशी, जिसे देवशयनी एकादशी भी कहा जाता हैसे शुरू होकर कार्तिक शुक्ल एकादशी जिसे देव प्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है, तक रहती है। देवशयन काल में विवाह, यज्ञोपवीत, मुण्डन आदि शुभ कार्य नहीं किए जाते हैं। लेकिन गृह प्रवेश करना, किसी भवन का निर्माण शुरू करना, वाहन खरीदना आदि कार्य किये जा सकते हैं।

                                                                                          

(6.11.20) रां रामाय नमः Ram Ramay Namah / तारक मंत्र / षडाक्षर मंत्र /रां रामाय नमः मंत्र के लाभ

 रां रामाय नमः Ram Ramay Namah / तारक मंत्र / षडाक्षर मंत्र /रां रामाय नमः मंत्र के लाभ (  

भगवान राम, भगवान विष्णु के अवतार हैं। वे नैतिकता, श्रेष्ठ गुण और आदर्श के प्रतीक हैं। भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। वे दया के सागर हैं। उनसे संबंधित कई मंत्र, श्लोक और स्त्रोत हैं। रां रामाय नमःमंत्र भी उनमें से एक है। इसे एक शक्तिशाली मंत्र के रूप में जाना जाता है। इसे तारक मंत्र, महामंत्र तथा षडाक्षर मंत्र के नाम से भी जाना जाता है।

इस मंत्र का जप करने के लाभ इस प्रकार हैं -

यह मंत्र जन्म - मृत्यु के चक्र से मुक्ति दिलाने वाला है, इसलिए इसे तारक मंत्र कहा जाता है।

यह सभी दुखों और बाधाओं को दूर करता है, जिससे जीवन में सकारात्मकता आती है।

यह साहस,आंतरिक शक्ति और आत्मविश्वास को बढ़ाता है।

यह व्यक्ति की चेतना को उच्च स्तर पर ले जाता है, आध्यात्मिक उन्नति करता है, आंतरिक शक्ति और शांति देता है।

इसके जप से घर में सुख शांति रहती है और जीवन में संपन्नता आती है।

इस मंत्र की जप प्रक्रिया इस प्रकार है -

प्रातः काल नित्यकर्म तथा स्नान आदि  से निवृत्त होकर उत्तर या पूर्व की तरफ मुंह करके ऊन के आसन पर बैठ जायें। भगवान राम का चित्र अपने सामने रखें। अपनी आंखें बंद करें और भगवान राम का ध्यान करें। ध्यान इस प्रकार है -

भगवान राम, जिन्होंने धनुष बाण धारण किए हुए हैं, बद्ध पद्मासन से विराजमान हैं, पीतांबर पहने हुए हैं, जिनके प्रसन्न नयन नूतन कमल दल से स्पर्धा करते हुए वाम भाग में विराजमान श्री सीता जी के मुख कमल से मिले हुए हैं। उन आजानुबाहु, मेघश्याम, नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित तथा विशाल जटाजूट धारी रामचंद्र जी का ध्यान करें।

इसके बाद इस मंत्र का 11 माला का जप करें। मंत्र इस प्रकार है -

रां रामाय नमः

मंत्र जप की समाप्ति के बाद आंखें बंद करके भावना करें कि भगवान राम आपको प्रसन्नता, सफलता,संपन्नता और मनोकामना पूर्ति का आशीर्वाद दे रहे हैं।

(9.1.4) गिरिधर की कुण्डलियाँ (दौलत पाय न कीजिये) Giridhar Ki Kundaliyan (Daulat Paay Na Kijiye

गिरिधर की कुण्डलियाँ (दौलत पाय न कीजिये) Giridhar Ki Kundaliyan (Daulat Paay Na Kijiye)

गिरिधर की कुण्डलियाँ (दौलत पाय न कीजिये)

सुबोध लोकभाषा में लोक व्यवहार की नीति बताने वाले कवियों में गिरिधर कविराय का प्रमुख स्थान है. उनकी लोक नीतिपरक कुण्डलियाँ व्यक्ति को प्रमाद, स्खलन और जगत व्यवहार की कुचालों के विरुद्ध सावधान करती हैं और उसे सत्पथ का निर्देश भी करती हैं. ऐसी ही एक कुण्डली है, जिसका शीर्षक है –

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान

कुण्डली                 

दौलत पाय न कीजिये, सपनेहु अभिमान.

चंचल जल दिन चारिको, ठाउं न रहत निदान.

ठाउं न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै.

मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै.

कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत.

पाहुन निसिदिन चारि, रहत सब ही के दौलत.

हिन्दी अर्थ – कवि गिरिधर कहते हैं कि धन संपत्ति प्राप्त करके कभी भी घमण्ड नहीं करना चाहिए यहाँ तक कि सपने में भी धन दौलत पाने का घमण्ड नहीं करना चाहिए. यह संपत्ति तो जल के समान चंचल है, किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहती है. इसलिए, इस संसार में अपने जीवनकाल में अच्छे कार्य करके यश प्राप्त करो. सभी से मीठे वचन बोलो और सभी के साथ विनय पूर्वक व्यवहार करो. कवि गिरिधर कहते हैं कि इन सब बातों को अपने मन में अच्छी तरह सोच लो. मेहमान की तरह यह संपत्ति चार दिन ही रहती है यानि सबके पास थोड़े समय के लिए ही रहती है.   


Friday, 23 January 2026

(2.3.14) प्रेम, धन और सफलता – Prem, Dhan Aur Safalata - inspirational /motivational story

 प्रेम, धन और सफलता – Prem, Dhan Aur Safalata - inspirational /motivational story

प्रेम, धन और सफलता - एक प्रेरक कहानी

एक औरत ने देखा कि तीन संत उसके घर के सामने खड़े हैं। उसने उन संतो को भोजन के लिए आमंत्रित किया, तो उनमें से एक संत ने कहा,”हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते हैं। मेरा नाम धनहै। इन दोनों के नाम सफलताऔर प्रेमहैं। हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है। आप तय कर ले कि किसे आमंत्रित करना है?”

औरत ने घर के भीतर आकर अपने पति को यह सब बताया। पति प्रसन्न होकर बोला, “यदि ऐसा है, तो हमें धन को आमंत्रित करना चाहिए।औरत बोली,”मुझे लगता है कि हमें सफलता को आमंत्रित करना चाहिए।उनकी बेटी जो दूसरे कमरे थी, यह सब सुन रही थी। वह उनके पास आई और बोली,” हमें प्रेम को आमंत्रित करना चाहिए।उसकी बात से सभी सहमत हो गए। औरत घर के बाहर गई और उसने संतो से कहा, “आप में से जिनका नाम प्रेमहै, वे घर में पधारें और भोजन ग्रहण करें।

प्रेमघर की ओर बढ़ चले। बाकी के दो संत भी उनके पीछे-पीछे चलने लगे। औरत ने दोनों से पूछा,” मैने तो केवल प्रेमको आमंत्रित किया था?” उनमें से एक संत ने कहा,”यदि आपने प्रेमके अतिरिक्त किसी और को आमंत्रित किया होता, तो केवल वही आता। लेकिन आपने प्रेमको बुलाया है। प्रेमजहाँ जाता है, धन और सफलता उसके पीछे पीछे चले आते हैं।

शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धन और सफलता की तुलना में प्रेम का अधिक महत्व है। जिस परिवार के सदस्यों में आपस में प्रेम होता है, उन्हें धन और सफलता प्राप्ति का रास्ता अपने आप ही मिल जाता है।

(3.2.13) आत्म विश्वास और धैर्य Atmavishwas aur Dhairya / Inspirational story, Motivational Story

आत्म विश्वास और धैर्य Atmavishwas aur Dhairya / Inspirational story,  Motivational Story

आत्म विश्वास और धैर्य

हम सभी जानते हैं कि हिलेरी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने में कितनी बार असफल हुआ। सबसे पहले वह इस अभियान के लिए अकेला ही निकला था। दुर्भाग्य से ग्लेशियर फिसल पड़े और उसे वापस लौटना पड़ा। हिलेरी दूसरी बार फिर गया। इस बार उसे बर्फीले तूफानों का सामना करना पड़ा और उसे फिर से लौटना पड़ा। वह तीसरी बार फिर गया। इस बार वह हिमपात से इस तरह घिर गया कि उसके लिए आगे बढ़ पाना असंभव हो गया।

जब हिलेरी वापस लौट कर आया, तो लोगों ने उसे घेर लिया और पूछा कि तीसरी असफलता पर तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया है?

हिलेरी ने एवरेस्ट की तरफ अपनी नज़रें गड़ाते हुए कहा, “सुनो, एवरेस्ट जो तुम्हारी समस्या है, वह मेरी नहीं है। तुम्हारी समस्या यह है कि तुम जितनी ऊंचाई पर खड़े हो, उससे और ज्यादा ऊंचे नहीं हो सकते, एक इंच भी नहीं। परंतु मैं अपने धैर्य और कठिन परिश्रम का उपयोग करके एक न एक दिन अपने पाँव तुम्हारे शिखर पर रखने में जरुर सफल हो जाऊंगा।

चौथी बार 1953 में हिलेरी तेनजिंग नोर्गे के साथ मिलकर माउन्ट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने वाला पहला व्यक्ति बन गया।

शिक्षा  - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि यदि व्यक्ति में आत्मविश्वास और धैर्य हो, तो वह जिंदगी में आने वाली हर बाधाओं का सामना करने में सफल हो सकता है।

Saturday, 17 January 2026

(2.3.12) ईश्वर किसकी सहायता करते हैं? प्रेरक कहानी Inspirational Story/ Motivational Story

ईश्वर किन लोगों की सहायता करते हैं? प्रेरक कहानी Inspirational and motivational story

ईश्वर किसकी सहायता करते हैं?

एक व्यक्ति हनुमानजी का भक्त था। एक बार वह अपनी बैलगाड़ी से कहीं जा रहा था। उसकी गाड़ी एक दलदल में फंस गई। वह हनुमान-चालीसा का पाठ करने लगा और यह अपेक्षा करने लगा कि हनुमानजी की कृपा से उसकी बैलगाड़ी दलदल से बाहर निकल आएगी।

संयोग से उसी समय एक पंडित जी वहाँ से गुजर रहे थे। जब उन्होनें यह सब देखा, तो वे वास्तविकता को समझ गए और उन्होंने उस व्यक्ति को याद दिलाया, "मित्र, हनुमानजी को भी संजीवनी बूटी का सही स्थान पता नहीं था, इसलिए वे पूरा पहाड़ ही उठा लाए थे। तुम्हें कम से कम अपनी गाड़ी को धक्का देने का प्रयास तो करना चाहिए।"

उस व्यक्ति ने वैसा ही किया और उसकी इस छोटी सी सहायता से बैलों ने भी जोर लगाया और गाड़ी को बाहर खींच लिया।

शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ईश्वर उनकी सहायता करते हैं, जो स्वयं अपनी सहायता करते हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि ईश्वर उनके लिए सब कुछ कर देंगे, तो उन्हें जाग जाना चाहिए और कड़ी मेहनत शुरू कर देनी चाहिए। उन्हें जान लेना चाहिए कि ईश्वर की शक्ति, स्वयं की शक्ति की ही पूरक है।

Friday, 16 January 2026

(2.3.11) ईश्वर की सहायता / Ishwar ki Sahayata / Inspirational Story/ motional Story

ईश्वर किस प्रकार सहायता करते हैं An inspirational story / Motivational Story

ईश्वर किस प्रकार सहायता करते हैं?

किसी गांव में एक व्यक्ति रहता था। वह भक्त था और ईश्वर पर बहुत आस्था और विश्वास रखता था। उसका मानना था कि ईश्वर सब की सहायता करते हैं।

एक बार तेज बरसात हो गई जिसके कारण उसके गाँव के पास से बहने वाली नदी का पानी उसके गाँव में घुस गया। जिला प्रशासन की ओर से सहायता करने वाले कर्मचारी आए और गाँव के लोगों को अपने घर खाली करके सुरक्षित स्थान पर चलने के लिए कहा। गाँव के लोग अपने घरों को खाली करने लगे और आवश्यकता का सामान अपने साथ लेकर किसी सुरक्षित स्थान की ओर जाने लगे। लेकिन वह भक्त अपने घर के सामने ही खड़ा रहा। उसने अपना घर खाली नहीं किया। तब प्रशासन के लोगों ने उस व्यक्ति से कहा कि नदी का पानी घरों में घुस सकता है। तुम हमारे साथ सुरक्षित स्थान पर चलो। लेकिन उसने यह कह कर उनके साथ जाने से मना कर दिया कि मुझे विश्वास है, ईश्वर मेरी सहायता करने अवश्य आयेंगे और मुझे बचा लेंगे।

नदी का पानी तेजी से बढ़ता हुआ उस भक्त के घर के पास तक पहुंच गया। कुछ समय बाद एक नाव वहाँ पहुँची और उसमें बैठे हुए लोगों ने उस व्यक्ति से कहा,”पानी का बहाव तेज है, तुम हमारे साथ आओ, हम तुम्हें सुरक्षित स्थान पर ले चलेंगे।उसने इस बार भी उनके साथ जाने से इंकार कर दिया और कहा कि ईश्वर मुझे बचाने जरुर आयेंगे। जब पानी उस व्यक्ति के घर में चला गया, तो वह घर की छत पर चढ़ गया और प्रतीक्षा करने लगा कि भगवान उसे बचाने आएंगे।

थोड़ी देर बाद एक बचाव दल हेलीकॉप्टर से आया और नीचे रस्सी डाल कर उस व्यक्ति से कहा कि तुम यह रस्सी पकड़ लो और ऊपर आ जाओ। इस बार भी उस व्यक्ति ने दोहराया कि तुम लोग जाओ, मुझे तो ईश्वर बचाने आएंगे। आखिरकार पानी इतना बढ़ गया कि वह व्यक्ति पानी में डूब गया और मर गया।

मरने के बाद वह ईश्वर के पास पहुंचा और ईश्वर पर चिल्लाते हुए कहा कि मैं आपका बहुत बड़ा भक्त हूँ। मुझे पूरा विश्वास था कि आप मुझे बचाने अवश्य आएंगे। मैं प्रतीक्षा करता रहा और आप नहीं आए। अब आप पर कौन  विश्वास करेगा और क्यों कोई आपकी भक्ति करेगा? इस पर ईश्वर ने कहा कि मैंने तुम्हें बचाने के लिए तीन बार प्रयास किया, लेकिन तुम स्वयं ही बचना नहीं चाहते थे। पहली बार मैंने तुम्हें बचाने के लिए प्रशासन के लोग भेजे। दूसरी बार मैंने तुम्हारी रक्षा के लिए एक नाव भेजी। तीसरी बार मैंने तुम्हारे लिए हेलीकॉप्टर भेजा। फिर भी तुम मेरी सहायता को समझ नहीं सके। याद रखो, मैं किसी माध्यम से सहायता करता हूँ।

शिक्षा -  इस कहानी से हमें शिक्षा मिलती है कि ईश्वर जिसकी सहायता करना चाहते हैं, वे उस व्यक्ति के लिए सहायता का कोई न कोई माध्यम बना देते हैं। बस आवश्यकता है, उन दिव्य संकेतों को समझने की।


Wednesday, 14 January 2026

(2.3.10) जीवन का आनंद और दृष्टिकोण (प्रेरक कहानी) Jivan Ka Anand Aur Drishtikon (Motivational Story / Inspirational Story)

जीवन का आनन्द दृष्टिकोण में है – प्रेरक कहानी Motivational Story / Inspirational Story

जीवन का आनंद और दृष्टिकोण

किसी स्थान पर एक विशाल मंदिर के निर्माण का कार्य चल रहा था। वहाँ से गुजर रहे एक संत ने देखा कि निर्माण कार्य के लिए तीन मजदूर धूप में बैठे हुए पत्थर तोड़ रहे हैं। संत ने उनसे पूछा तुम क्या कर रहे हो?” एक मजदूर ने दुःखी मन से उत्तर दिया, “आप देख नहीं रहे हो? मैं पत्थर तोड़ रहा हूं।वह उत्तर देकर फिर से बुझे मन से पत्थर तोड़ने लगा।

तभी उस संत की ओर देखते हुए दूसरे मजदूर ने कहा, “बाबा, यह तो रोजी-रोटी है। मैं तो यह काम करके बस अपनी आजीविका कमा रहा हूं।उत्तर देकर वह भी अपने काम में लग गया। लेकिन उत्तर देते समय उस मजदूर के चेहरे पर न तो दुख का भाव था और न आनंद का।

तभी संत ने अपने प्रश्न का उत्तर पाने की इच्छा से तीसरे मजदूर की तरफ देखा। तीसरे मजदूर के चेहरे पर आनंद का भाव था और आंखों में चमक थी। उसने उत्तर दिया बाबा जी, यहाँ देवी मां का मंदिर बन रहा है। मंदिर में लोग देवी के दर्शन करके आनंदित होंगे। मैं यही सोच कर इस मंदिर के निर्माण कार्य में सहयोग कर रहा हूं।

इन तीनों मजदूरों की बात सुनकर संत भाव - समाधि में डूब गए। सचमुच जीवन तो वही है, पर दृष्टिकोण भिन्न होने से सब कुछ बदल जाता है। दृष्टिकोण के भेद से फूल काँटे हो जाते हैं और कांटे फूल हो जाते हैं। आनंद अनुभव करने का दृष्टिकोण जिसने पा लिया, उसके जीवन में आनंद के सिवा और कुछ नहीं रहता है।

शिक्षा - इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन का आनंद किसी वस्तु या परिस्थिति में नहीं है, बल्कि जीने वाले के दृष्टिकोण में है। स्वयं अपने आप में है। हमको क्या मिला है उसमें नहीं, बल्कि हम उसे पाकर कैसा अनुभव करते हैं? उसे किस तरह से लेते हैं? उसमें है। यही वजह है कि एक ही वस्तु या स्थिति दो भिन्न दृष्टिकोण वाले व्यक्तियों के लिए अलग-अलग अर्थ रखती है। एक को उसमें आनंद की अनुभूति होती है और दूसरे को विषाद की।

Sunday, 11 January 2026

(2.3.9) कर्तव्य और भावना Kartvya Aur Bhawana An Inspirational Story/ Motivational Story

 कर्तव्य और भावना Kartvya Aur Bhawana An Inspirational Story/ Motivational Story  

कर्तव्य और भावना 

प्राचीन समय की बात है। चीन में एक धनवान व्यक्ति रहता था। उसका व्यवसाय था, भेड़ पालन करना। एक बार उसने भेड़ों को चराने और उनकी देखभाल करने के लिए दो लड़के रख लिए और दोनों लड़कों को आधी आधी भेड़ें बाँट दी। कुछ समय तक तो सब ठीक चलता रहा परंतु धीरे-धीरे भेड़ें दुबली होती गई और उनमें से कुछ तो मर भी गई। उसने जाँच की कि यह सब कैसे और क्यों हुआ?

उसे ज्ञात हुआ कि दोनों लड़के भेड़ों की देखभाल करने के बजाय अपने-अपने व्यसनों में लगे हुए हैं। उनमें से एक लड़के को जुआ खेलने की आदत थी, उसे जब भी मौका मिलता, वह भेड़ों को छोड़कर जुआ खेलने के लिए जा बैठता था। भेड़ें कहीं से कहीं पहुँच जाती थी और भूखी प्यासी कष्ट पाती थी। यही बात दूसरे लड़के के साथ भी थी, वह पूजा पाठ करने का आदी था। वह पूजा पाठ करता था और भेड़ों पर ध्यान नहीं देता था।

दोनों लड़के कर्तव्य पालन की उपेक्षा करते हुए पकड़े गए। उन्हें न्यायाधीश के सामने प्रस्तुत किया गया। दोनों के कार्य और कारणों में अन्तर था, परंतु कर्तव्य पालन की उपेक्षा करने के लिए दोनों समान रूप से दोषी थे। न्यायाधीश ने दोनों को समान रूप से दंडित किया और कहा कि कर्तव्य की उपेक्षा करके, जो भी कुछ किया जाता है वह व्यसन ही है, व्यसन में चाहे जुआ खेला हो चाहे पूजा पाठ किया हो। कर्तव्य की अपेक्षा तो दोनों में ही है। इसलिए वे दोनों ही समान रूप से दंड के भागी हैं।

शिक्षा - इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि कर्तव्य भावना से बड़ा होता है। कर्तव्य की उपेक्षा करके दूसरा कोई भी कार्य किया जाए, चाहे वह कितना भी अच्छा क्यों न हो, व्यसन ही माना जाएगा।