Friday, 28 August 2026

(2.4.8) ये दो प्रकार के लोग सुखी रहते हैं Ye Do Prakaar Ke Log Sukhi Rahate Hain

ये दो प्रकार के लोग सुखी रहते हैं Ye Do Prakaar Ke Log Sukhi Rahate Hain 

आचार्य चाणक्य कहते हैं -

अनागत विधाता च प्रत्युपन्न मतिस्तथा।

द्वावेतौ सुख मेधेते यदभविष्यो विनश्यति।

अर्थात् - पहला वह व्यक्ति जो भविष्य में आने वाले संभावित कष्ट या विपत्ति को भांप लेता है तथा उससे निपटने और उसे दूर करने के लिए तैयार रहता है और दूसरा वह व्यक्ति जो विपत्ति या कष्ट  के आने पर उसे दूर करने का तत्काल उपाय सोच लेता है। ये दोनों ही प्रकार के व्यक्ति सुखी रहते हैं।

और जो व्यक्ति यह सोचता है कि भाग्य में जो लिखा वही होगा या जो होना होगा, हो जाएगा। ऐसा सोच कर विपत्ति निवारण के लिए कोई उपाय नहीं करने वाला व्यक्ति दुखी होता हैकष्ट पाता है।