Saturday, 14 February 2026

(9.1.4) गिरिधर की कुण्डलियाँ (दौलत पाय न कीजिये) Giridhar Ki Kundaliyan (Daulat Paay Na Kijiye

गिरिधर की कुण्डलियाँ (दौलत पाय न कीजिये) Giridhar Ki Kundaliyan (Daulat Paay Na Kijiye)

गिरिधर की कुण्डलियाँ (दौलत पाय न कीजिये)

सुबोध लोकभाषा में लोक व्यवहार की नीति बताने वाले कवियों में गिरिधर कविराय का प्रमुख स्थान है. उनकी लोक नीतिपरक कुण्डलियाँ व्यक्ति को प्रमाद, स्खलन और जगत व्यवहार की कुचालों के विरुद्ध सावधान करती हैं और उसे सत्पथ का निर्देश भी करती हैं. ऐसी ही एक कुण्डली है, जिसका शीर्षक है –

दौलत पाय न कीजिये, सपने में अभिमान

कुण्डली                 

दौलत पाय न कीजिये, सपनेहु अभिमान.

चंचल जल दिन चारिको, ठाउं न रहत निदान.

ठाउं न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै.

मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै.

कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत.

पाहुन निसिदिन चारि, रहत सब ही के दौलत.

हिन्दी अर्थ – कवि गिरिधर कहते हैं कि धन संपत्ति प्राप्त करके कभी भी घमण्ड नहीं करना चाहिए यहाँ तक कि सपने में भी धन दौलत पाने का घमण्ड नहीं करना चाहिए. यह संपत्ति तो जल के समान चंचल है, किसी एक स्थान पर स्थिर नहीं रहती है. इसलिए, इस संसार में अपने जीवनकाल में अच्छे कार्य करके यश प्राप्त करो. सभी से मीठे वचन बोलो और सभी के साथ विनय पूर्वक व्यवहार करो. कवि गिरिधर कहते हैं कि इन सब बातों को अपने मन में अच्छी तरह सोच लो. मेहमान की तरह यह संपत्ति चार दिन ही रहती है यानि सबके पास थोड़े समय के लिए ही रहती है.