(2.4.6) ज्ञानी और मूर्ख एक समान कब हो जाते हैं? Gyani Aur Moorkh Ek Samaan Ho Jaate Hain
ज्ञानी और मूर्ख एक समान कब हो जाते हैं? Gyani Aur Moorkh Ek Samaan Ho Jaate Hain
ज्ञानी और मूर्ख एक समान कब हो जाते हैं? इस संबंध
में तुलसीदास जी द्वारा रचित एक दोहा इस प्रकार है -
काम, क्रोध, मद, लोभ की, जौ लौं मन में खान।
तौ लौं पंडित, मूरखों, तुलसी एक समान।
इस दोहे का अर्थ इस प्रकार है -
तुलसीदास जी कहते हैं कि जब तक मनुष्य की मन रूपी
खान में काम, क्रोध, घमंड, अहंकार और लालच भरे हुए
हैं तब तक ज्ञानी और मूर्ख व्यक्ति के बीच में किसी भी प्रकार का अंतर नहीं होता
है। दोनों एक जैसे ही हो जाते हैं।
इसका तात्पर्य यह है कि जब किसी व्यक्ति के मन में
काम यानि विभिन्न प्रकार की कामनायें और इच्छाएं,
क्रोध, लालच और घमंड आ
जाता है, तो वह व्यक्ति
कितना भी ज्ञानी क्यों न हो, उसका ज्ञान अज्ञान में बदल जाता है और वह मूर्ख की तरह
व्यवहार करने लगता है अर्थात उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, जिससे उसके द्वारा किए गए
कार्य मूर्खता पूर्ण लगने लगते हैं। इसलिए तुलसीदास जी ने इस स्थिति को ज्ञानी और
मूर्ख की एक समान स्थिति कहा है। यानि ज्ञानी और मूर्ख एक जैसे ही हो जाते हैं।
उनमें कोई भेद नहीं रह जाता है।