Wednesday, 18 March 2020

(8.9.3) Navsamvatsar - Hindu Nav Varsh (Hindu new year)

Nav Samvtsar / Hindu Nav Varsh / Hindu New Year नव संवत्सर / हिन्दू नव वर्ष

स्मृतिसार तथा श्रुति के अनुसार संवत्सर उसे कहते हैं जिसमें मासादि भलीभाँति  निवास  करते हैं।  इसका दूसरा अर्थ है बारह माह का काल विशेष अर्थात एक वर्ष।
हिन्दू मान्यता के अनुसार चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला वर्ष नव संवत्सर या हिन्दू नव वर्ष के नाम से जाना जाता है।  नव संवत्सर के बारे में मुख्य - मुख्य बातें इस प्रकार हैं -
(1)हिन्दू नव वर्ष (नव संवत्सर )चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है।
(2)प्रत्येक संवत्सर का अपना नाम होता है साथ ही उस संवत्सर का राजा,मंत्री, सस्येश (खरीफ की फसल का स्वामी), मेघेश (वर्षा का स्वामी), फलेश (फलों का स्वामी)  आदि दस अधिकारी होते हैं। उस वर्ष का फल अर्थात वर्षा, अन्न उत्पादन, फल उत्पादन आदि इन दस अधिकारियों की नैसर्गिक प्रकृति के अनुसार ही रहता है।
(3 )श्री ब्रह्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने   चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रवरा अर्थात सर्वोत्तम तिथि मानकर इसी दिन से सृष्टि की रचना का कार्य प्रारम्भ किया था।  इसलिए इस दिन को सृजन और उत्साह का दिवस भी माना  जाता है।
(4) इसी दिन राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत प्रारम्भ किया था।
(5)शक्ति संचय का पर्व बसंत नवरात्र भी इसी दिन प्रारम्भ होता है।
(6 ) महाराष्ट्र में इसी दिन गुड़ी पड़वा का उत्सव मनाया जाता  है।
(7 ) आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक राज्यों में  इस दिन को उगादि  पर्व  के रूप में मनाया जाता है।
(8 )चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्रवरा तिथि होने इसे स्वयं सिद्ध मुहूर्त के रूप में भी माना जाता है।  अर्थात किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए इस दिन को शुभ माना जाता है।  इस दिन पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है। 
(9 ) महर्षि गौतम की जयन्ती भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही मनायी जाती है।
इस प्रकार नवसंवत्सर अर्थात हिन्दू नव वर्ष कई महत्वपूर्ण विषयों और घटनाओं का दिवस है। 
इस मांगलिक अवसर पर परिचितों, मित्रों, सम्बन्धियों आदि को शुभ कामनाएं प्रेषित करें।  

Friday, 6 March 2020

(6.10.1) Gayatri Mantra Par Shodh ( Research )


गायत्री मंत्र पर शोध (चमत्कारी परिणाम)  Research on Gayatri Mantra (Miraculous results)

गायत्री मंत्र एक महामंत्र है | सदियों से मान्यता है कि चारों वेदों में वर्णित गायत्री मंत्र न केवल लक्ष्य की खोज में सहायक है, बल्कि अपने सार रूप में स्वयं ही जीवन का परम लक्ष्य है | वैज्ञानिकों, डॉक्टरों और मनोवैज्ञानिकों ने अपने शोध कार्यों में भी गायत्री मंत्र की महत्ता को स्वीकार किया है | वेदों पर शोध करने वाले भारत और संसार के अनेक विद्वानों ने माना है कि गायत्री मंत्र एक प्रभावशाली मंत्र है |
गायत्री मंत्र को सद् बुद्धि का मंत्र माना  गया है। इस मंत्र के अक्षरों में ज्ञान-विज्ञान तो भरा हुआ है ही इसके अतिरिक्त इस महामंत्र की रचना भी ऐसे विलक्षण ढंग से हुई है कि इसका उच्चारण एवं साधना करने से शरीर और मन के सूक्ष्म केन्द्रों में छिपी हुई अत्यंत महत्वपूर्ण शक्तियां जागृत होती हैं, जिनके कारण देवी वरदानों की तरह सद् बुद्धि प्राप्त होती है । भारत में सदियों से मान्यता है कि जो गायत्री मंत्र का जप करते हैं वे अनुभव करते हैं कि  कोई अज्ञात शक्ति उनके मन क्षेत्र में प्रकाश, नवीन ज्ञान, और नवीन उत्साह रहस्यमय और आश्चर्यजनक तरीके  से बढ़ा रही है।
(1) गायत्री,  देवी तत्वों से परिपूर्ण बुद्धि का नाम है जिसकी प्रेरणा से मनुष्य कल्याणकारी मार्ग का अनुशरण करता है। वह सात्विक विचार और कार्यों को अपनाता है जिससे उसकी प्रत्येक शक्ति की रक्षा और वृद्धि होती है। उसकी प्रत्येक क्रिया उसे अधिक पुष्ट, शशक्त एवं सुदृढ़ बनाती है और वह प्रतिदिन अधिक शक्ति संपन्न बनता चला  जाता  है। मन में अपरिग्रह, परमार्थ, मैत्री, करुणा, नम्रता , धर्म, श्रद्धा, ईश्वर परायणता आदि की भावना विकसित होती  है। यह भावना जहाँ  रहती है वहाँ  के परमाणु सदैव प्रफुल्ल  और चैतन्य रहतें हैं  । इस प्रकार गायत्री सद् बुद्धि देकर हमारी प्राण रक्षा का सेतु बनती हुई अपने नाम को सार्थक करती है। 
(2) गायत्री एक प्रकाश है, एक आशापूर्ण सन्देश है, एक दिव्य मार्ग है जो हमें समस्त भौतिक, आध्यात्मिक, सांसारिक और मानसिक आनन्दों की खान तक ले जाता है । यह हमारे मुंदे हुए विवेक के तृतीय नैत्र को खोलती है । यह हमें सद् विवेकी बऩाती है जिससे हम इस संसार के वास्तविक स्वरुप को देख सकने में समर्थ होते हैं | 
(3) आत्मा में अनेक ज्ञान-विज्ञान, साधारण, असाधारण, अदभुत, आश्चर्यजनक शक्ति के भण्डार छिपे पड़े हैं, गायत्री मंत्र के जप से वे खुल जाते हैं और जपकर्ता अपने आप को असाधारण शक्ति से भरा हुआ अनुभव करता है। 
(4) सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिये बाहर से कुछ नहीं लाना पड़ता है केवल अंतःकरण पर पड़े हुए आवरण को हटाना पड़ता है। गायत्री की सतोगुणी साधना मानसिक अन्धकार के पर्दे को हटा देती है और आत्मा का सहज ईश्वरीय रूप प्रकट हो जाता है। आत्मा का यह  निर्मल रूप सभी रिद्धि सिद्धियों से परिपूर्ण होता है। 
(5) गायत्री साधना द्वारा हुई सतोगुणों की वृद्धि अनेक प्रकार की आध्यात्मिक और सांसारिक समृद्धियों को जन्म देती है। शरीर और मन  को  शुद्ध बनाती  है जिससे सांसारिक जीवन अनेक प्रकार से सुखी व शांतिमय बन जाता है। 
(6) गायत्री मंत्र का जप व्यक्ति के  विवेक और आत्मबल को बढाता  है जिससे अनेक ऐसी कठिनाइयां  जो दूसरों को पर्वत के समान भारी मालूम पड़ती हैं, उस आत्मवान व्यक्ति के लिए तिनके के समान हल्की बन जाती हैं। उसका कोई कार्य रुका नहीं रहता | या तो उसकी इच्छानुसार परिस्थितियाँ बदल जाती हैं या फिर परिस्थितिनुसार उसकी इच्छा बदल जाती है। क्लेश का कारण इच्छा और परिस्थिति के बीच प्रतिकूलता का होना ही तो है। विवेकवान इन दोनों में से किसी एक को अपनाकर उस संघर्ष को टाल देता है और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। 
(7) गायत्री सद् बुद्धि की देवी है और साधक उससे सद् बुद्धि की प्रार्थना करता है। इस सद् बुद्धि द्वारा सभी प्रकार के दुखों को मिटाया जा सकता है। सद् बुद्धि के प्रकाश में वे सभी उपाय दिखाई देने लगते हैं जिनको काम में लाने पर दुःख के कारण दूर हो जाते हैं।
(8) गायत्री साधना द्वारा मानसिक परिष्कार, व्यक्तित्व के विकास, दुखों के निवारण और आत्मिक विकास के दिव्य लाभों के अतिरिक्त कई सिद्धियाँ और शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इन शक्तियों को क्रमशः अर्जित करते हुए व्यक्ति अनुपम, अद्वितीय व असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है।
(9)गायत्री मंत्र के जप से मानसिक और शारीरिक व्याधियों को दूर करने में भी सहायता मिलती है|
इसी बात की पुष्टि AIIMS (एम्स) के डॉक्टरों ने भी अपने शोध कार्य में की है | उन्होंने अपने शोध में पाया कि जिन लोगों ने तीन महीनों तक प्रतिदिन 108 बार निष्ठा व विश्वाश के साथ गायत्री मंत्र का जप किया , उनके शरीर में खुशी व प्रसन्नता के समय उत्पन्न होने वाले रसायनिक पदार्थ तेजी से बढ़ने लगे | इसी तरह का गाबा नामक रासायनिक पदार्थ भी है जिसकी कमी होने से नींद नहीं आती है और depression अर्थात अवसाद जैसी बीमारयाँ हो जाती हैं | लेकिन गायत्री मंत्र का जप करने वाले लोगों के शरीर में दूसरे सप्ताह में ही  गाबा नामक रासायनिक पदार्थ तेजी से बढ़ने लगा | इसके अतिरिक्त दिमाग में सक्रियता बढाने वाले रसायनिक पदार्थों की मात्रा भी ज्यादा हो गई |
जबलपुर चिकित्सा महाविद्यालय के कार्डियोलॉजी विभाग के रीडर डॉ. रविशंकर शर्मा ने कुछ उच्च रक्त चाप के रोगियों और ह्रदय गति की अनियमतता के रोगियों पर गायत्री मंत्र के जप के प्रभाव का अध्ययन किया और पाया कि जिन लोगों ने गायत्री मंत्र का जप किया उनको इस मंत्र के जप से लाभ हुआ |

Monday, 2 March 2020

(6.5.2) Om Namo Naaraanaay

Om Namo Naaraayanaay ॐ नमो नारायणाय 

"ॐ नमो नारायणाय " भगवान् विष्णु का मन्त्र  है।  इस मन्त्र को अष्टाक्षर मंत्र भी कहा जाता है।  विभिन्न धर्म ग्रंथों  के अनुसार इस अष्टाक्षर मन्त्र की महिमा या  महत्व इस प्रकार है -
- यह मन्त्र  समस्त पापों का नाश करने वाला है , समस्त प्रकार के यज्ञों का फल देने वाला है, समस्त दुःख और दोषों की शान्ति  करने वाला है। 
- इस मंत्र के जप करने से  मन शान्त  और निर्मल हो जाता है,  जिससे रचनात्मक विचारों का सृजन होता है।
- कोई भी मरणशील मनुष्य जिसका मरण एक दिन सुनिश्चित , वह इस मन्त्र को जप करके जन्म और संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। 
- यह मंत्र जपकर्ता को समस्त सिद्धियाँ  प्रदान करता  है।
- इस मंत्र के जप करने से भौतिक सुख सुविधा, वैभव और ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं।
- आर्थिक सम्पन्नता आती है और परिवार में स्नेह का वातावरण निर्मित होता है। 

Saturday, 29 February 2020

(3.1.37) Batuk Bairava Mantra

Batuk Bhairava Mantra  (For removing calamity) बटुक भैरव मन्त्र  - ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय  कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं



बटुक भैरव मन्त्र  - ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय  कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं।
भैरव को भगवान् शिव का अंशावतार माना जाता है।  बटुक भैरव को भैरव का सौम्य और सात्विक रूप माना जाता है।  बटुक भैरव की पूजा - उपासना  आराधना से विपत्तियों का नाश होता है , आपदाएं दूर होती हैं  और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
इनकी आराधना - उपासना भैरव जयन्ती, अष्टमी, रविवार या मंगलवार से शुरू करनी चाहिये।
बटुक भैरव मन्त्र  की जप विधि इस प्रकार है -
उत्तर या पूर्व की तरफ मुँह  करके किसी शांत स्थान पर ऊन के आसान पर बैठें।  अपनी आँखें बंद करके बटुक भैरव का सात्विक ध्यान करें।  सात्विक ध्यान इस प्रकार है -
भगवान् श्री बटुक भैरव बालरूप में  हैं।  उनकी देहकान्ति  स्पटिक की तरह है।  घुंघराले केशों से उनका चेहरा प्रदीप्त है।  उनकी कमर और चरणों में नव मणियों के अलंकार ; जैसे किंकिणी, नुपुर आदि विभूषित हैं।  वे उज्जवल रूप वाले, भव्य मुख वाले, प्रसन्नचित्त और त्रिनैत्र युक्त हैं।  कमल के समान सुन्दर दोनों हाथों में वे शूल और दण्ड धारण किये हुए हैं। ऐसे भगवान् बटुक भैरव को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ।  
ध्यान के बाद बटुक भैरव मन्त्र  का कम से काम 108 बार जाप करें। ऐसा इकतालीस दिन तक करें।  इस अवधि में शारीरिक व मानसिक रूप से शुद्धता तथा सात्विकता रखें।  बटुक भैरव मंत्र इस प्रकार है -
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय  कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं।
मन्त्र जप के बाद भावना करें कि बटुक भैरव ने आपकी प्रार्थना को  सुन लिया है और उनकी कृपा से आपकी विपदा दूर हो जायेगी तथा आपके जीवन में प्रसन्नता व सम्पन्नता आयेगी।  



Sunday, 23 February 2020

(6.5.1) Om Namo Bhagawate Vasudevaay

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय Om Namo Bhagawate Vasudevaay 


"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय " एक महामन्त्र  है। इस मन्त्र को द्वादशाक्षर मन्त्र भी कहा जाता है।  यह भगवान् विष्णु और भगवान् कृष्ण का मन्त्र है। यह सर्व कल्याणकारी मन्त्र है।  इस मन्त्र का जप करने से -
- बाधाओं से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख समृद्धि आती है।
- शारीरिक और मानसिक ऊर्जा प्राप्त होती है।
- मानसिक शान्ति मिलती है।
- आध्यात्मिक शक्ति मिलती है  जिससे इच्छा शक्ति प्रबल होती है।
- वासुदेव भगवान् के भक्तों का कभी भी अमंगल नहीं होता है।     

Thursday, 20 February 2020

(6.2.3) Rin Harta Ganesh Stotra (Rin Mukti Hetu Stotra)

Rin Harta Ganesh Stotra (Debt removing Ganesh Stotra) ऋण हर्ता  गणेश स्तोत्र (कर्ज मुक्ति हेतु प्रभावी उपाय)

व्यक्ति के जीवन में कभी - कभी ऐसा समय आता है जब उस पर ऋण या कर्ज बहुत अधिक बढ़ जाता है और उस कर्ज को चुकाने  का कोई मार्ग दिखाई नहीं देता है , तो इस स्थिति में ऋण या कर्ज मुक्ति से पाने के लिये ऋण हर्ता गणेश स्तोत्र का विश्वास  और निष्ठां पूर्वक पाठ करना उत्तम माना जाता है।  इस स्तोत्र का इकतालीस दिन तक  पाठ करने से गणेश जी की कृपा प्राप्त होती है तथा आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होने का कोई न कोई मार्ग दिखने लगता है।
ऋण हर्ता गणेश स्तोत्र की जप विधि इस प्रकार है -
प्रातःकाल दैनिक कार्य से निवृत्त होकर उत्तर या पूर्व की तरफ मुँह करके ऊनी आसन पर बैठ जाएँ।  भगवान् गणेश जी के चित्र को अपने सामने रख लें।  दीपक या धूपबत्ती जला लें।  अपनी आँखें बन्द करके भगवान् गणेश जी का ध्यान करें।  ध्यान इस प्रकार है -
सच्चिदानन्दमय भगवान् गणेश की अंगकान्ति  सिन्दूर के समान है।  उनके दो भुजाएं हैं।  वे लम्बोदर हैं और कमलदल पर विराजमान हैं।  ब्रह्मा आदि देव उनकी सेवा में लगे हैं तथा वे सिद्ध समुदाय से युक्त हैं।  ऐसे श्री गणपति देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
इस प्रकार ध्यान करने के पश्चात ऋण हर्ता गणेश स्तोत्र का पाठ करें।  इस स्तोत्र का हिन्दी  रूपान्तरण इस प्रकार है -
"सृष्टि के आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टि रूप फल की सिद्धि के लिये जिनका सम्यक पूजन किया था, वे पार्वती  पुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें।
महिषासुर के वध के लिए देवी दुर्गा ने जिन गणनाथ की उत्कृष्ट पूजा की थी, वे पार्वती  पुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें।
कुमार कार्तिकेय ने तारकासुर के वध से पूर्व जिनका भली भाँति पूजन किया था, वे पार्वती  पुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें।
भगवान् सूर्यदेव ने अपनी तेजमयी प्रभा की रक्षा करने के लिये जिनकी आराधना की थी,  वे पार्वती  पुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें।
चन्द्रमाँ ने अपनी कान्ति की सिद्धि के लिए जिन गणनायक का पूजन किया था,  वे पार्वती  पुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें।
विश्वामित्र ने अपनी रक्षा के लिये तपस्या  द्वारा जिनकी पूजा की थी,  वे पार्वती  पुत्र गणेश सदा ही मेरे ऋण का नाश करें।"
इस स्तोत्र के पठन के बाद ऋणहर्ता महामन्त्र का भी एक सौ आठ बार जप करें। मन्त्र इस प्रकार है -
ॐ गणेश ऋणं छिन्धि वरेण्यं हुं नमः QV~
स्तोत्र तथा मन्त्र जप के बाद मन ही मन भावना करें कि भगवान् गणेश जी की कृपा से आपको ऋण (कर्ज) से मुक्ति मिलेगी और आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी होगी।





Wednesday, 12 February 2020

(6.12.1) Batuk Bhairava Mantra

Batuk Bhairava Mantra - Om Hreem Batukaay Aapaduddhaaranaay Kuru kuru Batukaay Hreem
बटुक भैरव मन्त्र  - ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय  कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं।
(आपदा तथा विपत्ति निवारण हेतु )

भैरव को भगवान् शिव का अंशावतार माना जाता है।  बटुक भैरव को भैरव का सौम्य और सात्विक रूप माना जाता है।  बटुक भैरव की पूजा - उपासना  आराधना से विपत्तियों का नाश होता है , आपदाएं दूर होती हैं  और मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
इनकी आराधना - उपासना भैरव जयन्ती, अष्टमी, रविवार या मंगलवार से शुरू करनी चाहिये।
बटुक भैरव मन्त्र  की जप विधि इस प्रकार है -
उत्तर या पूर्व की तरफ मुँह  करके किसी शांत स्थान पर ऊन के आसान पर बैठें।  अपनी आँखें बंद करके बटुक भैरव का सात्विक ध्यान करें।  सात्विक ध्यान इस प्रकार है -
भगवान् श्री बटुक भैरव बालरूप में  हैं।  उनकी देहकान्ति  स्पटिक की तरह है।  घुंघराले केशों से उनका चेहरा प्रदीप्त है।  उनकी कमर और चरणों में नव मणियों के अलंकार ; जैसे किंकिणी, नुपुर आदि विभूषित हैं।  वे उज्जवल रूप वाले, भव्य मुख वाले, प्रसन्नचित्त और त्रिनैत्र युक्त हैं।  कमल के समान सुन्दर दोनों हाथों में वे शूल और दण्ड धारण किये हुए हैं। ऐसे भगवान् बटुक भैरव को मैं बारम्बार प्रणाम करता हूँ। 
ध्यान के बाद बटुक भैरव मन्त्र  का कम से काम 108 बार जाप करें। ऐसा इकतालीस दिन तक करें।  इस अवधि में शारीरिक व मानसिक रूप से शुद्धता तथा सात्विकता रखें।  बटुक भैरव मंत्र इस प्रकार है -
ॐ ह्रीं बटुकाय आपदुद्धारणाय  कुरु कुरु बटुकाय ह्रीं।
मन्त्र जप के बाद भावना करें कि बटुक भैरव ने आपकी प्रार्थना को  सुन लिया है और उनकी कृपा से आपकी विपदा दूर हो जायेगी तथा आपके जीवन में प्रसन्नता व सम्पन्नता आयेगी।  

Wednesday, 29 January 2020

(6.11.1) Ram Ramaay Namah

 रां  रामाय नमः Raam Raamaay Namah राम मंत्र - प्रसन्नता व सफलता के लिए

भगवान् राम भगवान् विष्णु के अवतार हैं।  वे नैतिकता, श्रेष्ठ गुण तथा आदर्श के प्रतीक हैं। भगवान् राम को पुरुषोत्तम कहा जाता है। वे दया के सागर हैं।  उनसे सम्बन्धित यह मंत्र अर्थात  "रां रामाय नमः " प्रसन्नता का स्रोत है तथा सभी प्रकार की बाधाओं को दूर कर जपकर्ता को उद्देश्य प्राप्ति में सफलता दिलाता है।  इस मंत्र की जप प्रक्रिया इस प्रकार है -
प्रातःकाल दैनिक कार्य से निवृत्त होकर उत्तर या पूर्व की तरफ मुख करके ऊनी आसन परबैठ जाएँ।  भगवान् राम का चित्र अपने सामने रखें।  अपनी आँखें बंद करके भगवान् राम का इस प्रकार ध्यान करें -
भगवान् राम जिन्होनें धनुष - बाण किये हुए हैं, बद्ध पद्मासन से विराजमान हैं, पीताम्बर पहने हुए हैं, जिनके प्रसन्न नयन नूतन कमलदल से स्पर्धा करते वाम भाग में विराजमान श्री सीता जी के मुख कमल से मिले हुए हैं, उन आजानुबाहु , मेघश्याम,नाना प्रकार के अलंकारों से विभूषित तथा विशाल जटाजूटधारी श्रीरामचन्द्र जी का ध्यान करे। 
इसके बाद इस मंत्र का ग्यारह माला का जप करें।  मंत्र इस प्रकार है -
रां रामाय नमः। 
मंत्र जप के बाद आँखें बन्द  करके भावना करे. कि भगवान् राम आपको प्रसन्नता और सफलता का आशीर्वाद  दे रहे हैं। 

Monday, 20 January 2020

(6.8.4) Shiva Manas Pooja

Shiva Manas Pooja  शिव मानस पूजा विधि 

वस्तुतः भगवान् को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं है, वे तो भक्त की भावना को देखते हैं।  संसार में ऐसे दिव्य पदार्थ उपलब्ध नहीं हैं, जिनसे पमेश्वर की पूजा की जा सके।  इसलिये पुराणों में मानस पूजा का विशेष महत्व माना गया है। भगवान्  शिव की मानसपूजा विधि इस प्रकार है -
हे दयानिधे ! हे पशुपते! हे देव ! यह रत्न निर्मित सिंहासन, शीतल जल से स्नान, नाना रत्नावलिविभूषित  दिव्य वस्त्र, कस्तूरिकागन्ध समन्वित चन्दन, जूही, चम्पा  और बिल्वपत्र से रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप यह सब मानसिक (पूजोपहार ) ग्रहण कीजिये।  मैनें नवीन रत्न खण्डों से रचित सुवर्णपात्र में घृतयुक्त खीर, दूध और दधि सहित पाँच प्रकार का व्यंजन, कदलीफल, शर्बत, अनेकों शाक, कपूर से सुवासित  और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और ताम्बूल - ये सब मन के द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं; प्रभो ! कृपया इन्हें स्वीकार करें।
छत्र, दो चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग,दुन्दुभी के वाद्य, गान और नृत्य, साष्टांग प्रणाम, नाना विधि स्तुति - ये सब मैं संकल्प से ही आपको समपर्ण करता हूँ; प्रभो ! मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये।  हे शम्भो ! मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वती जी हैं, प्राण आपके गण  हैं , शरीर आपका मन्दिर  है, सम्पूर्ण विषय -  भोग की रचना आपकी पूजा है, निंद्रा समाधि है, मेरा चलना - फिरना आपकी परिक्रमा है और सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं; इस प्रकार मैं जो - जो कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है। प्रभो ! मैनें हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण , नैत्र अथवा मन से जो भी अपराध किये हों; वे विहित हों  अथवा अविहित, उन सबको आप क्षमा कीजिये। हे करुणासागर श्री महादेव शंकर ! आपकी जय हो। 

Saturday, 21 December 2019

(6.8.3) Shiva Pooja Me Belpatra Ka Mahtva

Shiva Pooja Men Belpatra Ka Mahatva शिव पूजा में बेलपत्र का महत्व  


बेलपत्र जिसे बिल्वपत्र भी कहा जाता है, भगवान शिव को बहुत प्रिय है .इसलिए शिवपूजा में बेलपत्र का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है. बेलपत्र में त्रिदल अर्थात तीन पत्ते एक साथ जुड़े होते हैं. हालांकि बेलपत्र में तीन दल से अधिक दल भी होते हैं. परन्तु सामान्यतया तीन दल वाला बेलपत्र सरलता पूर्वक उपलब्ध हो जाता है. बेलपत्र चढाने के लाभ इस प्रकार हैं –
भगवान् शिव को बेलपत्र चढाने से सम्पन्नता आती है, आयु में वृद्धि होती है, शारीरिक व मानसिक कष्ट दूर होते हैं, सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं और परिवार में सुख शान्ति बनी रहती है.
बेलपत्र तोड़ने के नियम इस प्रकार हैं –
बेलपत्र तोड़ने से पहले और तोड़ने के बाद बेलवृक्ष को प्रणाम करना चाहिए. बेलपत्र तोड़ते समय ध्यान रखा जाये कि बेलवृक्ष को कोई नुकसान नहीं हो. बेलवृक्ष की टहनी से चुन-चुन कर केवल बेलपत्र ही तोड़ना चाहिए न कि पूरी टहनी. चतुर्थी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और अमावस्या तथा सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़ना चाहिए. इसलिए इन तिथियों व वार को बेलपत्र चढाने के लिए एक दिन पहले ही बेलपत्र तोड़ कर रख लेना चाहिए.
बेलपत्र चढाने की विधि
बेलपत्र कटा-फटा नहीं हो और न ही उसमें कोई छेद हो. बेलपत्र चढाने से पहले उसके डंठल को तोड़ देना चाहिए. शिवलिंग पर बेलपत्र को उल्टा चढ़ाना चाहिए यानि पत्ते का चिकना भाग नीचे रहना चाहिए. पाँच, सात, ग्यारह या अधिक संख्या में बेलपत्र चढ़ाए जा सकते हैं . बेलपत्र चढाते समय कोई और मंत्र नहीं बोल सकें तो ‘ॐ नमः शिवाय’ का उच्चारण करना चाहिए. स्कन्द पुराण के अनुसार यदि नया बेलपत्र उपलब्ध नहीं हो, तो किसी दूसरे व्यक्ति के द्वारा चढ़ाए गए बेलपत्र को भी धोकर कई बार अर्पित किया जा सकता है.