Saturday, 17 September 2016

(5.1.9) Samudra Mantha aur 14 Ratna

Which are the fourteen Ratnas / 14 रत्न कौनसे हैं ? समुद्र मंथन और चौदह रत्न 

देवता और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन प्रारम्भ किया, जिसके परिणाम स्वरुप निम्नांकित रत्न प्राप्त हुए :- 
(१)विष - सबसे पहले हलाहल नामक अत्यंत उग्र विष निकला।भगवान  शंकर ने उस तीक्ष्ण हलाहल विष को अपनी हथेली पर उठाया और भक्षण कर गए। विष के प्रभाव से भगवान् शंकर का कण्ठ नीला पड़ गया , परन्तु वह तो प्रजा का कल्याण करने वाले भगवान् शंकर के लिए भूषण रूप हो गया।   
(२) कामधेनु - वह अग्निहोत्र की सामग्री उत्पन्न करने वाली थी। इसलिए ब्रह्म लोक तक पहुँचाने वाले उपयोगी पवित्र घी , दूध आदि प्राप्त करने के लिए ब्रह्मवादी ऋषियों ने इसे ग्रहण किया।  
(३) उच्चैः श्रवा (नामक घोड़ा ) - वह चँद्रमा के समान श्वेत वर्ण का था।  बलि ने उसे लेने की इच्छा प्रकट की। (४) ऐरावत (नामक हाथी ) - उसके चार बड़े बड़े दाँत थे , जो उज्ज्वल कैलाश की शोभा को भी मात करता था। 
(५) कौस्तुभ मणि- उस मणि को अपने हृदय पर धारण करने के लिए अजित भगवान् ने इसे लेना चाहा।  
(६) कल्पवृक्ष- यह वृक्ष याचकों की इच्छाएँ उनकी इच्छित वस्तु देकर पूर्ण करता रहता है।   
(७) रंभा अप्सरा - वह  सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित एवं गले में स्वर्ण हार पहने हुए थी। 
(८) देवी लक्ष्मी  - उन्होंने सदगुणों से युक्त और माया रहित भगवान् को अपना पति बनाया।  
(९) वारुणी देवी- कमलनयनी कन्या के रूप में वारुणी देवी प्रकट हुई।  भगवान् की अनुमति से दैत्यों ने उसे ले लिया।  
(१० ) चन्द्रमा 
(११) पारिजात वृक्ष 
(१२) पाञ्चजन्य शंख 
(१३ ) धन्वन्तरि- वे साक्षात भगवान् विष्णु के अंशांश अवतार थे।  वे आयुर्वेद के प्रवर्तक और यज्ञ भोक्ता थे।  उनके हाथ में कलश था।  
(१४ ) अमृत-   धन्वन्तरि के हाथ में जो कलश था , उसमें अमृत था।

Thursday, 15 September 2016

(7.1.4) Sadhe sati of Shani / शनि की साढ़ेसाती (बृहत् कल्याणी )

शनि की साढ़ेसाती (बृहत् कल्याणी ) / Shadhe saati of the planet Shani /शनि की साढ़े साती के उपाय 

शनि की साढ़े साती क्या होती है ? (For English translation click here)
किसी व्यक्ति की जन्म राशि से शनि गोचर भ्रमण करते हुए बारहवें, पहले व दूसरे भाव में आ जाये, तो इस साढ़े सात वर्ष की अवधि को शनि की साढ़े साती या बृहत कल्याणी कहा जाता है। जन्म राशि से बारहवी राशि में सिर पर, जन्म राशि में ह्रदय पर तथा द्वितीय राशि में पैरों पर शनि का प्रभाव माना  जाता है।
शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहता है तथा सम्पूर्ण राशि चक्र का भ्रमण तीस वर्ष में पूरा करता है।
इस प्रकार किसी व्यक्ति के जीवन में शनि की साढ़े साती की तीन आवृत्तियाँ आ सकती हैं। शनि की साढ़े साती के दौरान शनि अशुभ फल करता है और विशेष रूप से जब यह जन्म कुंडली में अशुभ स्थिति में हो तो यह निराशा, मानसिक तनाव, परेशानियाँ, विवाद, वित्तीय हानियाँ, बीमारियाँ व शत्रु के कारण परेशानियाँ उत्पन करता है।
हालाँकि सम्पूर्ण अवधि में शनि एक जैसा फल नहीं देता है। अन्य ग्रहों की गोचर की स्थिति और दशा अंतर दशा की स्थिति के कारण परिणाम में अन्तर आ जाता है।
इसके अतिरिक्त  शनि जन्म कुंडली में योग कारक, षडबल से युक्त, उच्च, स्व, मित्र राशि  या शुभ स्थान में हो तो व्यक्ति को  सुख सम्पति एवं व्यापार में अनायास ही सफलता दिला  देता  है। उसका विवाह, बच्चों  का जन्म या नौकरी में तरक्की , चुनाव में जीत , विदेश यात्रा , आदि  शुभ कार्य इस साढ़ेसाती के दौरान होते हैं।
शनि को न्याय का ग्रह माना जाता है। इसलिए यह व्यक्ति को उसके द्वारा किये गए कर्मों के अनुसार उसे अच्छा या बुरा फल देता है। बुरे कार्य के लिए सजा देता है और अच्छे कार्य के लिए पुरुस्कृत करता है।
शनि की साढ़ेसाती के उपाए :-
शनि की साढ़ेसाती के दौरान दुष्प्रभावों को दूर करने के लिए निम्नांकित उपाय लाभकारी हैं :-
कम से कम सात शनिवार तक हनुमान जी के मंदिर में जाकर सात या पाँच बार हनुमान चालीसा का पाठ  करें। (यदि मंदिर में नहीं जाया जा सके तो घर में किसी शांत स्थान पर बैठकर हनुमान चालीसा का ग्यारह बार पाठ  करें।
( या ) शनि वार को सुन्दर कांड का पाठ करें।
 (या) सात शनिवार व्रत रखें , हनुमान जी के मंदिर में जायें , हनुमान जी को 100 ग्राम गुड व 100 ग्राम भुने हुए चने प्रसाद के रूप में चढ़ाएं।
 (या) निम्नांकित मन्त्र का जितना अधिक जप कर सकें उतना जप  करे -
 ॐ शं  शनैश्चराय नमः।
उपरोक्त उपायों के साथ - साथ यथा शक्ति तेल , तिल ,छाता , कम्बल , जूते आदि का  दान करें। कबूतरों को दाना खिलाएं व चीटियों के बिल के पास शक्कर मिला हुआ आटा डालें।
(For English translation click here) 

(7.1.3) Tri Bal Shuddhi / त्रिबल शुद्धि

Tribal Shuddhi / Tribal Shuddhi  in muhurat for marriage /त्रिबल शुद्धि 

त्रिबल शुद्धि क्या है? What is Tribal Shuddhi  (For English translation click here)
विवाह के समय मुहूर्त में त्रिबल शुद्धि देखी जाती हैं जिसमे वर और कन्या के लिए चंद्रबल, वर के लिए सूर्यबल तथा कन्या के लिए गुरु का बल देखा जाता है। भारतीय ज्योतिष में जिन सिद्धांतो को प्रतिपादित किया है उनमें निसंदेह व्यवहारिक पक्ष एवं तार्किक आधार को ध्यान में रखा गया है। ऋषि मुनियों के गहन चिंतन व मनन का परिणाम है कि हमारे पास जीवन में आनेवाले सभी संस्कारों एवं अन्य कार्यों के लिए धरोहर के रूप में उपयुक्त मार्गदर्शन उपलब्ध है। विवाह के समय चंद्रबल, सूर्यबल और गुरुबल देख जाता है।
चन्द्रबल / चंद्र शुद्धि क्यों देखी  जाती है? 
चन्द्रमा मन का कारक है। एकाग्रता व निरंतरता चंद्रबल (शुद्धि) पर आधारित होती है। प्रत्येक कार्य की सफलता उसकी प्रक्रिया में एकाग्रता पर आधारित होती है। विवाह के मुहूर्त में वर और कन्या दोनों की राशि   से चंद्रबल देखा जाता है ताकि विवाह के बाद उनके गृहस्थ जीवन में उनका मन स्थिर रहे और ध्यान की एकाग्रता बनी रहे।
सूर्य शुद्धि / सूर्य बल क्यों देखा जाता है ?
विवाह के बाद गृहस्थी के लिए संसाधन जुटाना पुरुष का कर्तव्य है। सूर्य आत्मा का कारक है तथा आत्मविश्वास का प्रतीक है। अतः विवाह के मुहूर्त में वर की राशि से सूर्य का बल देखा जाता है।
गुरु शुद्धि / गुरुबल क्यों देखा जाता है ? 
गुरु विवेक, बुद्धि और समझ का करक है। विवाह के पश्चात परिवार में सामंजस्य, सोहार्द्र बनाये रखने में महिला की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए कन्या की राशि से गुरुबल देखा जाता है ताकि वह कन्या विवाह के पश्चात आपसी समझ से गृहस्थी के दायित्व को निभा सके, परिवार में समरसता बनाये रखे।
श्रेष्ठ चन्द्रमा:- जब चन्द्रमा जन्म राशि से 1,2,3,5,6,7,9,10,11 वां हो तो श्रेष्ठ माना जाता है।
नेष्ट  चन्द्रमा:- जब चन्द्रमा जन्म राशि से (प्रसिद्द नाम से)4,8,12 वां हो तो नेष्ट  माना जाता है।
परिहार - पाणिग्रहण  में  बारहवाँ चन्द्रमा वर को तो ग्राह्य है परन्तु कन्या के लिए नेष्ट (अशुभ) माना जाताहै। 
श्रेष्ठ सूर्य:- जब सूर्य वर की राशि से 3,6,10,11 वां हो तो श्रेष्ठ माना जाता है।
पूज्य सूर्य:- जब सूर्य वर की राशि से 1,2,5,7,9 वां हो तो सूर्य का जप, दान, पूजा आदि करने से शुभ होता है।
नेष्ट  सूर्य:- जब सूर्य वर की राशि से 4,8,12 वां हो तो ऐसा सूर्य नेष्ट (अशुभ) माना जाता है।
परिहार:- जब सूर्य उच्च राशि पर हो, स्वगृही, मित्र क्षेत्री या वर्गोत्तामी हो तो विशुद्ध माना जाता है।
श्रेष्ठ गुरु:- जब गुरु कन्या की राशि से 2,5,7,9,11 वां हो तो श्रेष्ठ माना जाता है।
पूज्य गुरु:- जब गुरु कन्या की राशि से 1,3,6,10 वां हो तो गुरु का जप, दान, पूजा आदि से शुभ होता है।
नेष्ट  गुरु:- जब गुरु कन्या की राशि से 4,8,12 वां हो तो नेष्ट  माना जाता है।
परिहार:- जब गुरु अपनी उच्च राशि में हो या स्वराशि या मित्र की राशि में हो या वर्गोत्तमी हो तो विशुद्ध माना जाता है। यह विवाह में ग्राह्य है।
(सन्दर्भ - बालबोध ज्योतिष सार समुच्चय पेज 80 तथा शिवशक्ति पंचांग पेज 105  तथा ज्योतिष ज्ञान चन्द्रिका पेज 92 , 93 , 94 )
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(7.2.3) Muhurat for Hindu Marriage /Hindu Marriage dates for the current year 

(7.2.3) Hidhu marriage dates / हिन्दू विवाह मुहूर्त

Hindu Vivah Muhurat / Hindu Marriage dates / Vivah dates / wedding dates /हिन्दू विवाह मुहूर्त / शादी का मुहूर्त 

(For English translation click here) 
हिन्दू  मान्यता के अनुसार विवाह संस्कार व्यक्ति के सोलह संस्कारों में से एक है।  वैवाहिक जीवन की सफलता के लिए विवाह का सही समय पर मुहूर्त के अनुसार सम्पन्न होना चाहिए। विवाह के मुहूर्त के लिए निम्नांकित बातों/घटकों को ध्यान में रखा जाना चाहिए -
> त्रिबल शुद्धि - कन्या के  गुरु बल, वर के  सूर्य बल तथा दोनों के चंद्र बल पर विचार करना चाहिए।
> तिथि - शुक्ल पक्ष की 2,3,4,5,6,7,8,9,10,11,12,13,15
कृष्ण पक्ष की 1,2,3,4,5,6,7,8,9,10,11,12
> वार - सभी वार ग्राह्य हैं।
> नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा,माघ, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, अनुराधा, मूल, श्रवण, धनिष्ठा, रेवती।
> समय शुद्धि  (विवाह मुहूर्त में अशुद्ध काल ) निम्नांकित अशुद्ध कालांश को टाला जाता है - धनु मल मास, मीन मल मास ,अधिक मास, सिंहस्थ गुरु, गुरु तथा शुक्र का अस्त कालांश, श्राद्ध पक्ष, होलाष्टक, देव शयन कालांश।> विवाह मुहूर्त के दिन, दिनांक, समय के लिए यहाँ क्लिक करें  

Wednesday, 14 September 2016

(5.1.8) Shraddh dates this year /Pitri Paksh dates/Shraddh paksh kya hai?

Dates of Shraddh Paksh / Pitri Paksh dates this year  / श्राद्ध पक्ष दिन व दिनांक / श्राद्ध पक्ष कब है ?

श्राद्ध पक्ष सोलह दिन की अवधि है जो भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन माह की अमावस्या  तिथि तक चलती है।  हिन्दू मान्यता के अनुसार मृत पूर्वज (पितृ /पितर ) जो पितृ लोक में रहते हैं , इस श्राद्ध पक्ष की अवधि में व्यक्ति द्वारा दिए गए दान, पिण्डदान, भोजन आदि स्वयं ग्रहण करते हैं।
इस वर्ष श्राद्ध पक्ष के प्रारम्भ और समाप्ति की तिथि जानने के लिए यहाँ क्लिक करें - श्राद्ध पक्ष / पितृ पक्ष की दिनांक तथा दिन 
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(5.1.7) What is Shraddh / Benefits of Shraddh 

(5.1.7) Shraddh / Shraaddh in Hinduism /What is shraaddh

श्राद्ध / श्राद्ध क्या है ?  श्राद्ध किसे कहते हैं ? श्राद्ध क्यों किया जाता है? श्राद्ध करने के क्या लाभ हैं ?Benefits of Shraaddh / What is shraaddh ? 

श्राद्ध किसे कहते हैं ? - (for English translation click here )
अपने मृत पूर्वजों, जिन्हें पितर (पितृ ) कहा जाता है, के निमित्त किया जाने वाला कार्य श्राद्ध कहलाता है।  इन कार्यों में प्रमुख हैं -
> पिण्ड  दान
> तर्पण
> ब्राह्मणों को भोजन कराना
> गाय, कुत्ते, तथा कौए को भोजन देना।
श्राद्ध क्यों किया जाता है ? श्राद्ध करने से क्या लाभ होता है ? -
शास्त्रों में मनुष्य के लिए तीन प्रकार के ऋण बताये गए हैं।  ये तीन ऋण हैं - देव ऋण , ऋषि ऋण तथा  पितृ ऋण। श्राद्ध करके पितृ ऋण उतारा जाता है।
विष्णु पुराण के अनुसार - " श्राद्ध से तृप्त होकर पितृ गण समस्त कामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। इसके अतिरिक्त श्राद्ध करने वाले व्यक्ति से विश्वे देव गण , पितृ गण, मातामह तथा कुटुम्बीजन - सभी संतुष्ट रहते हैं।  पितृ  पक्ष में स्वयं श्राद्ध ग्रहण करने आते हैं तथा श्राद्ध मिलने पर प्रसन्न होते हैं और श्राद्ध नहीं मिलने पर निराश हो जाते हैं तथा शाप देकर लौट जाते हैं।
 (for English translation click here ) 

(6.3.1) Durga Mantra (parivaar men sneh tatha shanti ke liye) in Hindi

Parivaar men Shanti tatha Sneh Ke LiyeDurga Manra  दुर्गा मंत्र (परिवार में शांति व स्नेह हेतु )

दुर्गा, देवी का अवतार है जो दिव्य शक्तियों का प्रतीक है।ऐसा विश्वास किया जाता है कि दुर्गा,देवी लक्ष्मी ,काली ,और सरस्वती की शक्तियों का मिश्रित रूप है।उसमें उसके भक्तों को सम्पन्नता,शांति ,प्रसन्नता ,शक्ति और बुद्धि देने का सामर्थ्य है।
मंत्र जप की प्रक्रिया :-
सुबह स्नान करके ऊनी  आसन पर पूर्व या  उत्तर की तरफ  मुख करके किसी शांत स्थान पर बैठ जाएँ।देवी दुर्गा का चित्र अपने सामने रख लें।अपनी आखें बंद करके देवी दुर्गा का  ध्यान करें ।भावना करें कि देवी दुर्गा जगत की माता है जो अपने भक्तों की इच्छा पूर्ति करती है।कष्टों से मुक्त करके उन्हें प्रसन्नता,सम्पन्नता,शक्ति व बुद्धि देती है।ऐसी देवी दुर्गा को मैं प्रणाम करता हूँ  और प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे मन की शांति दे ,मेरे परिवार में शांति व  प्रसन्नता और स्नेह का वातावरण बनाये रखें ।परिवार के सभी सदस्य सकारात्मक तथा स्नेह पूर्ण भावना के साथ रहें।
ऐसी प्रार्थना और भावना के बाद निम्नाकित मंत्र का 540 बार (पांच माला का) जप तीन माह तक प्रतिदिन करें।अपेक्षित परिणाम हेतु इस मंत्र का 125000 बार जप करना चाहिए। मंत्र निम्न अनुसार है :-
 या देवी सर्व भूतेषु शांतिरूपेण संस्थिता ,
 नमस्तस्यै, नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नमः। 
मंत्र जप के बाद आखें बंद करके शांत भाव से बैठें और देवी दुर्गा के असीम स्नेह पर मनन करें।अपने मन में भावना तथा विश्वास करें कि देवी दुर्गा ने आपकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है।वे आप पर और आप के परिवार पर उनका आशीर्वाद उड़ेल रहीं हैं।देवी दुर्गा की कृपा से आपके परिवार में स्नेह व शांति का वातावरण उत्पन्न होगा।(For English translation click here)

(7.1.2) Kaal Sarp Yog kya hai / Janm Kundali men Kaal Sarp Yog

Kaal Sarp Yog Kya Hai ? काल सर्प योग / काल सर्प दोष 

काल सर्प योग (कितनी सच्चाई कितनी भ्रान्ति ?)
वर्तमान में कालसर्प योग के बारे में बहुत कुछ कहा और सुना जाता है | कई लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि ऐसी कुंडली वाला व्यक्ति अपने जीवन में तरह - तरह की समस्याओं  का सामना करता है और उसके द्वारा किये गए अधिकतर प्रयासों का उसे कोई लाभ नहीं मिलता है। जबकि वास्तविक स्थिति यह नहीं है | यह इस योग का केवल डराने वाला पक्ष है | केवल कालसर्प योग से ही कुण्डली की सब बातें तय नहीं हो जाती हैं |इस योग के बारे में बिन्दुवार विश्लेषण व जानकारी से सब कुछ स्पष्ट हो जाएगा | बिन्दुवार जानकारी इस प्रकार है -  
योग किसे कहते हैं?
जब दो या दो से अधिक ग्रह किसी जातक की कुंडली में किसी राशि में साथ- साथ या किसी अंतर पर स्थित होते हैं तो वे एक दूसरे को प्रभावित करते हैं. ग्रहों की इस स्थिति को ज्योतिष की भाषा में योग कहते हैं | ग्रहों की इन परस्पर शुभ स्थितियों से शुभदायक योग बनते हैं और अशुभ स्थितियों से अशुभदायक योग बनते हैं.   
शुभ योगों से कुंडली सबल हो जाती है और अशुभ योगों से निर्बल हो जाती है। तथाकथित कालसर्प योग भी उनमें से एक है, जिसे अशुभ योगों की श्रेणी में माना जाता है | वर्तमान में तो कालसर्प योग की इतनी अधिक चर्चा होती है जैसे कि जन्म कुंडली का फलादेश इस योग से ही तय होता है और कुण्डली में बने शेष योग कोई महत्व नहीं रखते | जबकि वास्तविकता यह नहीं है | कुण्डली में बने अन्य योगो की अनदेखी करके तथा ग्रहों की दशा - अन्तर्दशा व गोचर की स्थिति पर ध्यान नहीं देकर सही फलादेश किया ही नहीं जा सकता | 
काल सर्प योग भयावह क्यों बन गया है ?
काल सर्प योग एक अशुभ योग है। इसके नाम ने इसे और भी अधिक डरावना बना दिया है - काल का अर्थ है "मृत्यु" तथा सर्प का अर्थ है "साँप" जो बहुत ही कष्ट दायक स्थिति का  संकेत देता है।इसके अतिरिक्त कुछ लोग इसके प्रभाव का इस भयावह तरीके से वर्णन करते हैं जिससे व्यक्ति काल्पनिक भय से भर जाता है और जीवन में अमंगल या अशुभ घटनाओं की कल्पना करने लगता है |
काल सर्प योग कैसे बनता है ?
वर्तमान परिभाषा के अनुसार   कुंडली में सात ग्रह - सूर्य ,चन्द्रमा , मंगल ,बुध , गुरु , शुक्र और शनिजब राहु और केतु के बीच स्थित हों तो ऐसी कुंडली में काल सर्प दोष बनता है।
कुछ दैवज्ञ मानते हैं कि जब ये सात ग्रह केतु और राहु के बीच होते हैं तब भी कुण्डली में कालसर्प योग का निर्माण हो जाता है |
जबकि कुछ कहते हैं कि सातों ग्रह राहु – केतु के बीच आतें हैं तब ही काल सर्प योग बनता है न कि केतु – राहु के बीच आने पर |
कुछ देवज्ञ मानते हैं कि कोई भी ग्रह राहु - केतु के बीच में न होकर बाहर आ जाये, तो यह आंशिक कालसर्प  योग कहलाता है और कुछ अन्य के अनुसार इस स्थिति में काल सर्प योग का निर्माण ही नहीं होता है |
कुछ विद्वान मानते हैं कि कालसर्प योग 12 प्रकार का होता है जबकि कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार कालसर्प योग 288 प्रकार का होता है | कालसर्प योग 288 प्रकार का होने पर तो यह योग अधिकांश व्यक्तियों की कुण्डली में उपस्थित होगा तो क्या वे सब इस योग से पीड़ित होंगे ? 
ये सब मतान्तर क्यों हैं ? क्योंकि ज्योतिष के प्राचीन तथा प्रमाणिक ग्रंथों में कालसर्प योग का कोई उल्लेख नहीं होने से अलग – अलग लोगों ने अपने अपने अनुभव तथा ज्ञान के आधार पर इस योग के बारे अपनी – अपनी व्याख्या कर दी है |
काल सर्प योग का अशुभ प्रभाव
जो लोग कालसर्प योग को मानते हैं, उनका कहना है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प योग होता है उसके शिक्षा में रूकावट आती है, विवाह में विलम्ब होता है,जीवन में तनाव रहता है, संतान पक्ष से असंतुष्टि रहती है, आये दिन दुर्घटनाएं होती रहती हैं, व्यवसाय में बाधा आती है, कुंडली के अच्छे योग भी कालसर्प योग के कारण शुभ प्रभाव उत्पन्न नहीं करते,. ऐसा भी कहा जाता है कि उस व्यक्ति को डरावने स्वप्न आते हैं और स्वप्न में साँप दिखते हैं. (जबकि वास्तविकता यह नहीं है. यह केवल डराने वाला पक्ष है. ये बातें कुंडली में अन्य अशुभ योग या योगों के उपस्थित होने से भी हो सकती हैं )
मनोवैज्ञानिक बात – कुछ बातें ऐसी होती हैं जिनका हमारे मन पर शुभ या अशुभ प्रभाव पड़ता है | जैसे किसी को कहा जाये कि जब आप किसी मंत्र का आँखें बंद करके जप करें तो उस समय आपके दिमाग में जल में तैरती हुई मछली  की आकृति नहीं आनी चाहिए या नहीं दिखनी चाहिये, तभी यह मंत्र अपना प्रभाव दिखायेगा I तो यह मानकर चलो यह आकृति आपको अवश्य दिखेगी I ऐसे ही आपको कहा जाये कि कुंडली में काल सर्प योग होने पर उस व्यक्ति को स्वप्न में साँप दिखाई देता है तो निश्चित ही आपको सपने में साँप दिखने लगेगा | इसी प्रकार आपके जीवन में कोई कठिनाई आयी तो आप उसे कालसर्प योग से जोड़ कर देखने लगेंगे,यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है|    
कालसर्प योग की वास्तविकता  -
कुंडली में राहु - केतु  की स्थिति से ही सब कुछ तय नहीं हो जाता। शेष सात ग्रहों का और उनकी स्थिति का भी अपना महत्व है।उनकी शुभ या अशुभ स्थिति कुंडली को प्रभावित करती है।कुंडली में उच्च राशि  में स्थित ग्रह , शुभ योग जैसे - गज केसरी योग , राज योग या अन्य कोई शुभ योग हो या राहु और केतु भी अच्छी स्थिति में हो या अपनी उच्च राशि में हो, तो तथाकथित काल  सर्प योग प्रभाव हीन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त वैदिक ज्योतिष के प्राचीन ग्रंथों में काल सर्प योग का कोई उल्लेख नहीं है। लेकिन बाद के विद्वानों ने इस योग का उल्लेख किया है और धीरे  - धीरे इसे भयावह योग के रूप में पहचान मिलती जा रही है।लोग इसके नाम से ही हताश और निराश हो जाते हैं। जबकि  वास्तविकता यह है कि कठिनाइयाँ हरेक व्यक्ति के जीवन में आती हैंअसफलता प्रत्येक को मिलती  हैं, कष्ट , बीमारियाँ ,दुर्घटनायें जीवन के साथ जुडी हुई हैं। इनको यों ही कालसर्प योग से जोड़ दिया जाता है. कुंडली में कुछ दूसरे अशुभ योग, शनि साढ़ेसाती या शनि  की ढेया आदि भी इन घटनाओं के कारण बनते हैं न कि कालसर्प योग | इसके साथ ही यह भी महत्वपूर्ण बात है कि प्रत्येक ग्रह एक राशि पर एक निश्चित समय तक रहता है | यदि चन्द्रमा केतु के पास वाले भाव में हो तो उसे जिस राशि  पर राहु है उस राशि से आगे बढ़ने में (अर्थात कालसर्प योग की स्थिति समाप्त होने में) लगभग बारह दिन या  अधिक दिन का समय लग जाता है तो क्या इस बारह दिन की अवधि में जन्में लाखों लोग इस अशुभ काल सर्प योग से ग्रसित होंगे ? यह सोचनीय और विचारणीय बात है |
अत: यदि किसी की  कुंडली में तथाकथित काल सर्प योग है  तो उसे इस योग से  भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है इसके साथ साथ इस तथ्य को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि कुण्डली का विश्लेषण केवल एक योग को देखकर नहीं किया जा सकता इसके लिए ग्रहों की दशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतर दशा व ग्रहों की गोचर स्थिति का भी ध्यान रखना होता है |
हालाँकि इस योग के प्रति एक बार जमे हुए कुविश्वास को दूर करना बहुत मुश्किल  है अत: व्यक्ति अपने अन्दर आत्म विश्वास भरने व निराशा की भावना को दूर करने के लिए भगवान् शिव की उपासना करे तथा विशेष रूप से महा मृत्युंजय मंत्र या त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र का जप करे।    
यह भी याद रखिये –
पुण्य से व्याधि का हरण होता है , पुण्य से ग्रह जनित प्रकोपों की शान्ति होती है, पुण्य से शत्रु भी दबाते हैं, जहाँ धर्म है, वहीं विजय है |
उल्लेखनीय बात
यहाँ यह उल्लेख करना आवश्यक कि कई ऐसे व्यक्ति भी हैं जिनकी कुंडली में तथाकथित काल सर्प योग उपस्थित है लेकिन उन्होंने अपने जीवन में अपार सफलता और प्रसिद्धि प्राप्त की है. उनमें से मुख्य- मुख्य निम्नांकित हैं -  
पण्डित जवाहर लाल नेहरु , मोरारी बापू , धीरुभाई अम्बानी, अमिताभ बच्चन, मोहनलाल सुखाडिया, दिलीप कुमार फिल्म अभिनेता , सचिन तेंदुलकर, आचार्य रजनीश आदि जो विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्ध रखते हैं.


कुंडली विश्लेषण
नाम धीरुभाई अम्बानी , जन्म दिनांक -28.12-1932, जन्म समय 06:37 प्रातःकाल, जन्म स्थान – Veraval 
यदि धीरुभाई अम्बानी की जन्म कुंडली का विश्लेषण करें तो आप पाएंगे कि यह धनु लग्न की कुण्डली है, लग्न में सूर्य और चन्द्रमा हैं , दूसरे भाव में शनि है  तीसरे भाव में राहु है, नवेँ भाव में मंगल और केतु हैं, दशवें भाव में गुरु है और बारहवें भाव में शुक्र और बुध स्थित हैं | इस कुण्डली के तीसरे भाव में राहु के होने से अन्य ग्रह राहु और केतु के बीच में आ गए जिससे तथाकथित कालसर्प योग का निर्माण हो गया |
लेकिन इस कुण्डली में कई शुभ योग हैं जिनके कारण इसमें तथाकथित काल सर्प योग होने पर भी उन्होंने जीवन में सफलता प्राप्त की है. इनकी कुंडली में ग्रहों की शुभ स्थिति और शुभ योग निम्नानुसार हैं
(1)चन्द्रमा से केंद्र स्थान यानि दसवें भाव में गुरु के स्थित  होने से गज केसरी योग का निर्माण हो रहा है. यह योग जातक को तेजस्वी, धनवान, मेधावी, गुणवान, और राजप्रिय बनाता है.
(2)लग्न में भाग्येश सूर्य स्थित है और गुरु का लग्न पर केन्द्रीय प्रभाव है.
(3)गुरु की पाँचवी पूर्ण दृष्टि धन भाव पर है और धनेश स्वयं धन भाव में स्थित है. यह स्थिति व्यक्ति को धनवान बनाती है. गुरु की सातवी पूर्ण दृष्टि सुख भाव पर है. यह जातक को सुखी, संतुष्ट, आवास-वाहनादि सुखों से युक्त करती है.
(4)तीसरे भाव में स्थित राहु जातक को साहसी बनता है और ख्याति भी देता है. 
(5)पंचम भाव का स्वामी मंगल भाग्य भाव में मित्र राशि में स्थित है जो भाग्य को बढ़ा रहा है.
(6)भाग्य भाव का स्वामी सूर्य मित्र राशि में लग्न में स्थित होकर भाग्य वृद्धि का योग बना रहा है.
(7)शुक्र बारहवें भाव में स्थित है यह स्थिति  जातक को जीवन के सभी भौतिक सुख देती है.    
यदि उपर्युक्त विवरण को ध्यान में रखें और रचनात्मक तथा सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो कालसर्प योग वाले व्यक्ति बहुत सफलता पाते हैं और बहुत ऊंचाई पर पहुँच जाते हैं, लेकिन साथ ही यह भ्रम भी न रखें कि उन्हें यह सफलता राहु केतु से निर्मित तथाकथित कालसर्प योग के कारण मिली है. वास्तव में यह सफलता उनकी  कुंडली के अन्य शुभ योगों के कारण मिली है. अतः कालसर्प योग का भय मन निकाल दें और ईश्वर में विश्वास रखते हुये अपना कार्य करें सफलता अवश्य मिलेगी. 

(7.1.1) Jyotish kya hai ? Vedic Astrology

Vedic Jyotish / Jyotish / वैदिक ज्योतिष / ज्योतिष / ज्योतिष क्या है ?

> वेद भारतीय संस्कृति के मूल आधार हैं।  वेदों के छः अंग हैं - शिक्षा , कल्प , व्याकरण , निरुक्त , छंद तथा ज्योतिष।
> महर्षि पाणिनि के अनुसार ज्योतिष वेद पुरुष का नैत्र है। दूसरे शब्दों में जिस प्रकार नैत्रों के बिना मनुष्य का व्यक्तित्व अपूर्ण है, ठीक उसी प्रकार नैत्र रूपी ज्योतिष शास्त्र  के बिना सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान अपूर्ण है।
> जिस शास्त्र से भूतल, अंतरिक्ष तथा भूगर्भ के प्रत्येक पदार्थ का यथार्थ ज्ञान हो, वह शास्त्र ज्योतिष शास्त्र कहलाता है।
> भारतीय ज्योतिष को तीन स्कन्धों में बांटा गया है - सिद्धांत, संहिता तथा होरा। सिद्धांत स्कन्ध गणित विद्या से सम्बंधित है।  संहिता स्कन्द में सिद्धांत  व फलित दोनों का मिश्रित रूप है। जिस स्कन्द में मानव जीवन के सुख - दुःख आदि शुभाशुभ विषयों का विवेचन किया गया हो , उसे होरा कहा जाता है। 

Tuesday, 13 September 2016

(6.1.1)Vishnu ke 24 Avatar / Twenty four incarnations of Lord Vishnu

Bhagwan Vishnu Ke Chaubees Avatar भगवान् विष्णु के 24 अवतार / Twenty four incarnations of Lord Vishnu 

श्री मद्भागवत पुराण के अनुसार भगवान् विष्णु के 24 अवतार निम्नानुसार हैं :- 
(१) सनकादि चार ब्राह्मण कुमार - प्रभु ने सनक ,सनन्दन , सनातन और सनत्कुमार - इन चार ब्राह्मणों के रूप में अवतार ग्रहण करके अत्यन्त कठिन ब्रह्मचर्य का पालन किया। 
(२) वाराह - दूसरी बार इस संसार के कल्याण के लिए समस्त यज्ञों के स्वामी उन भगवान् ने ही रसातल में गयी हुई पृथ्वी को निकाल लाने के लिए सूकर रूप ग्रहण किया। 
३) नारद - ऋषियों की सृष्टि में भगवान् ने देवर्षि नारद के रूप में तीसरा अवतार ग्रहण किया और सात्वत तन्त्र का (जिसे नारद पाञ्चरात्र कहते हैं ) उपदेश किया, उसमें कर्मों के द्वारा किस प्रकार कर्मबंधन से मुक्ति मिलती है , इसका वर्णन है।
(४) नर - नारायण - धर्म पत्नी मूर्ति के गर्भ से उन्होंने नर - नारायण के रूप में चौथा अवतार ग्रहण किया।  अवतार में उन्होंने ऋषि बन कर मन और इन्द्रियों का सर्वथा संयम करके बड़ी तपस्या की।
(५) कपिल 
(६) दत्तात्रेय 
(७) यज्ञ 
(८) ऋषभदेव 
(९) पृथु 
(१०) मत्स्य 
(११) कच्छप 
(१२) धन्वन्तरि 
(१३) मोहिनी 
(१४) नरसिंह 
(१५)वामन 
(१६) परशुराम 
(१७) व्यास 
(१८) राम 
(१९) बलराम 
(२०) कृष्ण 
(२१) बुद्ध 
(२२) कल्कि 
यहाँ बाईस अवतारों की गणना की गयी है , परन्तु भगवन के चौबीस अवतार प्रसिद्ध हैं।  कुछ विद्वान चौबीस अवतारों की संख्या यों पूर्ण करते हैं - राम व कृष्ण के अतिरिक्त बीस अवतार उपयुर्क्त हैं ही , शेष चार अवतार श्री कृष्ण के ही अंश हैं।  उनके चार अंश ये हैं - एक तो केशका अवतार , दूसरा सुतसा तथा पृश्नि पर कृपा करने वाला अवतार , तीसरा संकर्षण -बलराम और चौथा परब्रह्म।  इस प्रकार इन चार अवतारों से विशिष्ट पांचवें साक्षात भगवान् वासुदेव हैं। दूसरे विद्वान ऐसा मानते हैं कि बाईस अवतार तो उपर्युक्त हैं ही, इनके अतरिक्त दो और हैं - हंस और हयग्रीव।  
( Source - Shreemadbhagwat-Sudha-Sagar Page  30)