Sunday, 21 May 2023

(2.1.18) Maulikata /Originality

Maulikata/ Originality/ मौलिकता

मौलिकता  एक विशिष्ट गुण

प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक विशिष्ट गुण होता है, जिसके द्वारा उस व्यक्ति की पहचान बनती है, इसी गुण के कारण वह दूसरों से अलग दिखता है, उसके सोचने, कार्य करने तथा व्यवहार करने का तरीका दूसरों से भिन्न होता है और एक विशेष छाप छोड़ता है . यही विशिष्ट गुण मौलिकता है . मौलिकता  किसी अन्य की नक़ल या अनुकरण नहीं है, बल्कि एक अनूठापन है जिसमे आकर्षण है, पहचान है, नई सोच और क्षमता है .
सफलता पाने के लिए मौलिकता अपरिहार्य है . किसी अन्य सफल व्यक्ति के अनुभव का उपयोग तो किया जा सकता है, परन्तु उसकी नक़ल करके या उसका अनुकरण करके सफलता प्राप्त नहीं की जा सकती है . पूर्ण सफलता के लिए निजी सोच, शक्ति व दृष्टि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं .
हर व्यवसाय में, हर क्षेत्र में सुधार की संभावना हमेशा बनी रहती है . यदि कोई व्यक्ति नया सोचता है, नया करता है, तो संभव हिअ कुछ लोगों द्वारा या कुछ समय तक उसकी सोच या उसकी नयेपन को मान्यता नहीं मिले परन्तु एक समय बाद निश्चित ही उसे मान्यता मिलती है क्योंकि उसके तरीके में, उसकी सोच में मौलिकता होती है न कि नक़ल .
कई व्यवसाय पुराने व परम्परागत होते हैं, परन्तु एक मौलिक व्यक्ति उस व्यवसाय में नयापन ले आता है जिससे वह इसे एक विशेष पहचान दिला देता है . इसके विपरीत पुराने तरीके से उस व्यवसाय का सचांलन करते रहने से वह व्यवसाय अन्य लोगों के व्यवसाय से पिछड़ जायेगा . नई तकनीक, नई सोच का ही परिणाम है . ऊर्जावान व गतिमान बने रहने के लिए नयेपन की व् मौलिकता की आवश्यकता है अन्यथा जहाँ हम वर्षों पहले थे, अब भी वहीं बने रहेंगे . हमारे पूर्वजों ने उस समय की मांग व आवश्यकता को ध्यान में रख कर अपनी कार्य प्रणाली विकसित की होगी लकिन वर्तमान समय की बदली हुई परिश्थितियों में वह कार्य प्रणाली सफल हो, आवश्यक नहीं है . समय और परिस्थिति के अनुसार नया करने की आवश्यकता होती है . हमारी सोच भिन्नता लिये हुए होनी चाहिए . हमारा बोल ने का तरीका भिन्न व आकर्षक हो और कार्य प्रणाली एक  अलग पहचान लिये हुए हो . हर चीज जो भी हम से जुडी हुई हो, उस पर हमारी छाप होनी चाहिए . ये हीं बातें हमें दूसरों से भिन्न करती हैं . यही मौलिकता है, जिसके कारण हमारा अन्दाज, हमारा आचरण, कार्य प्रणाली आदि भिन्न नजर आते हैं . 

(9.1.1) Shringi Rishi Jayanti

Shringi Rishi - Vrishti Yagya Aur Putreshthi Yagya Karta

Shringi Rishi Ki Katha 

ऋष्य श्रृंग या श्रृंगी ऋषि कश्यप ऋषि के पौत्र और विभण्डक ऋषि के पुत्र थे। उनके जन्म के बारे में तीन अलग अलग कथाएं मिलती हैं। एक मत के अनुसार उनका जन्म उर्वशी  नामक अप्सरा से माना जाता है।  एक अन्य मत के अनुसार एक देवकन्या ने ब्रह्माजी के शाप के कारण एक मृगी के रूप में जन्म  लिया और उसी मृगी से श्रृंगी ऋषि का जन्म हुआ।  एक अन्य मत के अनुसार इनका जन्म , मृगपदा जो एक देवकन्या थी, के गर्भ से हुआ था, ऐसा माना जाता है।
वाल्मीकि रामायण के बालकाण्ड के सर्ग 9 से 14 तक के अनुसार श्रृंगी ऋषि  राजा दशरथ के पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्ठि यज्ञ कराया था। उनका  विवाह अंग देश के राजा रोमपाद की दत्तक पुत्री शान्ता के साथ हुआ था, जो वास्तव में राजा दशरथ की पुत्री और भगवान्  राम की बहिन थी। उनका पालन पोषण उनके पिता विभण्डक के द्वारा एक अरण्य ( वन ) में हुआ। यह अरण्य अंग देश की सीमा से लगता था। 
उस समय अंग देश में राजा रोमपाद का शासन था। उनके पाप कर्म और अत्याचार के कारण एक बार उनके राज्य में वर्षा नहीं हुई जिससे वहाँ अकाल छा गया। इस संकट की घडी का सामना करने के लिए राजा रोमपाद ने सुविज्ञ एवं शास्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों को बुलाया और उनसे इस अनावृष्टि के संकट से उबरने का उपाय पूछा।  इस पर ब्राह्मणों ने कहा कि यदि किसी तरह  विभण्डक मुनि के पुत्र ऋष्य श्रृंग को यहाँ अर्थात अंगदेश लाकर यथाविधि उनका सत्कार किया जाये तो यहाँ वर्षा हो सकती है  और अकाल से मुक्ति मिल सकती है। 
राजा रोमपाद ने अपने मंत्रियों और पुरोहितों को ऋष्य श्रृंग को अंगदेश लाने का उपाय पूछा। प्रत्युत्तर में   उन्होंने कहा कि वैसे तो उन्हें ( ऋष्य श्रृंग  ) उनके आश्रम से यहाँ लाना बहुत कठिन है परन्तु यदि रूपवती और अलंकार युक्त गणिकाएं,(वैश्याएं) भेजी जाये तो वे मुनि को किसी तरह रिझा कर ला सकती है।  हुआ भी ऐसा ही वे गणिकाएं (वैश्याएं ) ऋष्य श्रृंग को मोहित करके उन्हें अपने साथ अंग देश ले आयी। . 
ऋष्य श्रृंग  के नगर में पहुँचते ही  रोमपाद के राज्य में वर्षा होने लगी, जिससे सब प्राणी प्रसन्न हो गए।  रोमपाद  ने यथाविधि अर्घ्य, पाद्यादि प्रदान कर उनका पूजन किया और उनसे वर माँगा कि उनके पिता विभण्डक मुझ पर क्रोध न करें।  फिर रोमपाद ने ऋष्य श्रृंग का विवाह अपनी दत्तक पुत्री शांता से कर दिया।  
 इसके कुछ समय बाद ऋष्य श्रृंग ने अयोध्या के राजा दशरथ की पुत्र कामना के लिए पुत्र कामेष्ठि यज्ञ करवाया था,.परिणाम स्वरुप राम, भरत, लक्ष्मण  और शत्रुघ्न का जन्म हुआ. 
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में ऋष्य श्रृंग का मंदिर भी है। इस मंदिर में ऋष्य श्रृंग  के साथ देवी शांता की प्रतिमा विराजमान है।  यहाँ दोनों की पूजा होती है और दूर -दूर से श्रद्धालु आते है।  

Wednesday, 18 November 2020

(6.2.9) Ganesh chaturthi ko Chandra Darshan Kyon Nahin Karana Chahiye

 Ganesh chaturthi ko Chandra Darshan Kyon Nahin Karana Chahiye

गणेश चतुर्थी को चन्द्रमा को क्यों नहीं देखना चाहिए

गणेश अंक के पृष्ठ 247 के अनुसार यह कथा इस प्रकार है –

एक बार की बात है, कैलाश के शिव सदन में लोक पितामह ब्रह्मा भगवान् शिव के समीप बैठे हुये थे. उसी समय देवर्षि नारद वहाँ आये. उनके पास एक सुन्दर और स्वादिष्ट फल था. नारद जी ने यह फल भगवान् शिव को दे दिया,

उस अदभुद और सुन्दर फल को अपने पिता के हाथ में देखकर गणेश जी और षडानन जी  दोनों आग्रह पूर्वक उस फल को माँगने लगे. तब भगवान् शिव ने ब्रह्मा जी से पूछा “ ब्रह्मन, नारदजी द्वारा दिया हुआ यह अपूर्व फल एक ही है और इसे गणेश और षडानन दोनों लेना चाहते हैं; आप ही बताएं, यह फल किसे दूँ ?

ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया- “ प्रभो, षडानन छोटे हैं इसलिए इस फल के अधिकारी तो षडानन ही हैं.”

भगवान् शिव ने वह फल षडानन को दे दिया. इससे गणेश जी ब्रह्मा जी पर कुपित हो गए.

जब ब्रह्माजी ने अपने भवन पहुँच कर सृष्टि रचना का प्रयत्न किया तो गणेश जी ने विघ्न उत्पन्न कर दिया. वे अत्यन्त उग्र रूप में ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हुए. ब्रह्मा जी गणेश जी के उग्र रूप को देखकर भयभीत हो गए.

गणेशजी का उग्र रूप और ब्रह्मा जी को भयभीत देख कर चन्द्रमा अपने गणों के साथ हँसने लगा.

चन्द्रमा को हँसते हुए देख कर गणेशजी को क्रोध आ गया. उन्होंने चन्द्रमा को शाप दे दिया – “हे चन्द्र, तुम्हारी अशिष्टता के कारण मैं तुम्हें शाप देता हूँ कि अब से  तुम कुरूप और मलीन हो जाओगे. तुम किसी के लिए भी कभी देखने योग्य नहीं रहोगे और यदि किसी ने देख भी लिया तो वह पाप का भागी होगा.

गणेश जी के शाप के कारण चन्द्रमा श्री हीन, कुरूप और मलीन हो गया. वह सबके लिए अदर्शनीय हो गया अतः वह अपने आचरण पर पछताने लगा.

चन्द्रमा के अदर्शन से देवगण भी दुखी हुए. अग्नि और इन्द्र आदि देवता गणेश जी के समीप पहुँच कर भक्ति पूर्वक उनकी स्तुति करने लगे.

देवताओं के स्तवन से प्रसन्न होकर गणेशजी ने कहा – “मैं तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हूँ. आप चाहो तो वर मांग लो.

देवताओं ने कहा, “ प्रभो, आप चन्द्रमा पर अनुग्रह करें और उनको दिए गए शाप से मुक्ति का उपाय बताएं.”

इस पर गणेश जी ने कहा,” देवताओं, मैं अपना वचन मिथ्या कैसे कर दूँ? परन्तु मैंने आपको वर माँगने के लिए कहा है,इसलिए मैं आपके आग्रह को भी टालना नहीं चाहता हूँ. इसलिए मैं मेरे शाप को सीमित कर सकता हूँ समाप्त नहीं. सीमित शाप यह है कि कोई भी जान बूझकर या अनजान में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चन्द्रमा को देखेगा, तो वह अभिशप्त होगा. उसे अधिक दुःख उठाना पड़ेगा.” इस प्रकार गणेश जी द्वारा चन्द्रमा के शाप को सीमित किये जाने से देवगण प्रसन्न हुए और गणेशजी को प्रणाम किया.

फिर वे चन्द्रमा के पास गए और उससे (चन्द्रमा से) कहा,”हे चन्द्र, गणेश जी पर हँस करके व उपहास करके तुमने अपराध किया है. हमने बहुत प्रयत्न पूर्वक गणेशजी को प्रसन्न और संतुष्ट किया है. इस कारण उन दयानिधि ने तुम्हें वर्ष में केवल एक दिन अदर्शनीय रहने का वचन देकर अपना शाप अत्यन्त सीमित कर दिया है. तुम भी उन करुणामय की शरण लो और उनकी कृपा से शुद्ध होकर यश प्राप्त करो.”

देवताओं की सलाह पर चन्द्रमा ने बारह वर्ष तक तप किया और गणेश जी के एकाक्षरी मन्त्र का जप किया. इससे गणेश जी प्रसन्न हुए और चन्द्रमा के सामने प्रकट हुये. चन्द्रमा ने हाथ जोड़ कर गदगद कंठ से उनकी स्तुति की और अपने द्वारा किये गए अपराध के लिए क्षमा मांगी. चन्द्रमा के तप और स्तुति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने चन्द्रमा से कहा कि जैसे पहले तुम्हारा सुन्दर रूप था, वैसा ही हो जायेगा, परन्तु जो मनुष्य भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को तुम्हें देख लेगा, वह निश्चय ही अभिशाप का भागी होगा. उसे पाप, हानि, मूढ़ता और कलंक का सामना करना पड़ेगा.

इसलिए भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी यानि गणेश चतुर्थी को चन्द्रमा को नहीं देखा जाता है. भगवान् कृष्ण को भी इस दिन चन्द्रमा का दर्शन करने से झूठे कलंक का सामना करना पड़ा था.             

Sunday, 18 October 2020

(9.1.4) Neend udaane wali chaar Baaten (Vidur Niti)

 Neend udaane wali chaar Baaten (Vidur Niti)

नींद उड़ाने वाली चार बातें

         महाभारत में एक प्रसंग आता है कि एक दिन महाराज धृतराष्ट्र बहुत दुखी थे। उन्होंने महामंत्री विदुर को बुलवाया। विदुर के आने पर धृतराष्ट्र ने विदुर से कहा कि आज मेरा मन बहुत व्याकुल है। मैं चिंता में जलता हुआ अभी तक जाग रहा हूं। मेरा मन पूर्ण रूप से अशांत है। मेरी सभी इंद्रियां विकल हो रही है। अतः मेरे लिए जो कल्याणकारी हो, वह कहो। इस पर महात्मा विदुर ने कहा कि, राजन ! इन चार कारणों से किसी व्यक्ति की नींद उड़ जाती है, उसे नींद नहीं आती, वह बेचैन और अशांत रहता है। वे चार कारण इस प्रकार है :-

1. जिसका बलवान व्यक्ति से विरोध हो गया हो, उस व्यक्ति को नींद नहीं आती है। कमजोर होने के कारण बलवान व्यक्ति से सीधा मुकाबला नहीं कर सकता। अतः वह इस चिंता में डूबा रहता है कि बलवान शत्रु से कैसे बचा जाए ? क्या उपाय किया जाए या किससे सहायता ली जाए ? बलवान शत्रु उसे कितना नुकसान पहुंचाएगा या उसके साथ कैसा व्यवहार करेगा यह डर उसे सताता रहता है। परिणाम स्वरूप उसका मन अशांत रहता है और उसको नींद नहीं आती है।

2. दूसरा जो साधन हीन और दुर्बल हो। दुर्बल और साधन हीन व्यक्ति के साथ किसी तरह का अन्याय हो जाए तो भी वह अन्यायी व्यक्ति का सामना नहीं कर पाता है। अतः वह चिंतित रहता है। दुर्बल होने के कारण बलवान और निर्दयी व्यक्ति उसकी संपत्ति या उसके पास जो कुछ भी है उसे छीन सकता है। जिससे व्यक्ति को अपनी संपत्ति के छिन जाने से और उसे वापस प्राप्त करने के बारे में सोचकर चिंता होती है और उसे नींद नहीं आती है।

3. तीसरा जो काम व्यक्ति हो, जिस व्यक्ति के मन में काम भावना जागृत हो गई हो उसे भी रात में नींद नहीं आती है अर्थात उसे रात में जागने का रोग लग जाता है। ऐसा कामी व्यक्ति अपने काम भावना की पूर्ति के प्रयास में सो नहीं पाता है काम भावना उस व्यक्ति को व्याकुल और शांत बनाए रखती है। परिणाम स्वरूप उसकी नींद उड़ जाती है

4. चौथा जिस की आदत चोरी करने की हो जिस व्यक्ति की चोरी करने की आदत हो या जो चोरी को अपना व्यवसाय बना ले तो उसे भी रात में नींद नहीं आती है। चोर हमेशा ही दूसरों की नजर बचाकर चोरी करता है दूसरों की चीजें चुराता है जहां चोरी करना चाहता है वहां रहने वाले सभी लोगों के सो जाने की प्रतीक्षा करता है इस प्रतीक्षा में उसे नींद नहीं आती है


(9.1.3) Mahatma Vidur (Neetigya and Mahabharat ke patra)

 Mahatma Vidur (Neetigya and Mahabharat ke patra)

महात्मा विदुर नीतिज्ञ और महाभारत के पात्र

विदुर धृतराष्ट्र और पांडु के लघु भ्राता थे। दासी पुत्र होने के कारण वे राज्य के अधिकारी नहीं हुए। मांडव्य ऋषि के द्वारा श्राप के कारण धर्मराज ने ही विदुर जी के रूप में जन्म लिया था। वह परम बुद्धिमान, प्रज्ञा शक्ति से संपन्न तथा महान योग बल से प्रतिष्ठित थे। इनके प्रज्ञा वैभव एवं बुद्धि चातुर्य के विषय में वेदव्यास कहते हैं कि देव गुरु बृहस्पति और असुर गुरु शुक्राचार्य भी वैसे बुद्धिमान नहीं है जैसे पुरुष प्रवर विदुर है।

जब कभी पुत्र स्नेहवश धृतराष्ट्र पांडवों को दुख देने या उनके अहित की योजना सोचते, तब विदुर उन्हें यानी धृतराष्ट्र को समझाते थे। जब दुरात्मा दुर्योधन ने लाक्षागृह में पांडवों को जलाने का षड्यंत्र किया, तब विदुर ने उन्हें बचाने की व्यवस्था की और कूट भाषा या (यावनी भाषा ) में संदेश भेजकर युधिष्ठिर को पहले ही सावधान कर दिया, जिसके कारण पांडवों के प्राण बच गए।

जब पांडवों को 12 वर्ष का वनवास और 1 वर्ष का अज्ञातवास हुआ तो विदुर जी बहुत दुखी हुए। पांडवों के वनवास के समय, दुर्योधन के भड़काने से एक दिन धृतराष्ट्र ने क्रोध में आकर विदुर को कहा," तुम हमेशा पांडवों की प्रशंसा करते रहते हो, उन्हीं के पास चले जाओ। मेरे यहां मत रहो।" विदुर उसी समय पांडवों के पास जाकर जंगल में रहने लगे। उनके चले जाने के बाद धृतराष्ट्र को उनके महत्व का पता चला। वे विदुर की अनुपस्थिति में अपने आपको असहाय समझने लगे। उन्होंने दूत भेजा। अपने अपराध की क्षमा चाही और शीघ्र ही विदुर जी से हस्तिनापुर आने की प्रार्थना की। धृतराष्ट्र की प्रार्थना स्वीकार कर विदुर जी लौट आए।

महाभारत का युद्ध आरंभ हुआ तो विदुर जी किसी के भी पक्ष में नहीं रहे। अवधूत वेश बनाकर 12 वर्ष तक पृथ्वी पर विचरण करते रहे। जो मिल जाता, वही खा लेते। जहां रात्रि हो जाती ,वही सो जाते। फल फूल खाते हुए सभी तीर्थों में घूमते रहे। मैत्रेयजी से ज्ञानोपदेश प्राप्त करके वह हस्तिनापुर पहुंचे। पांडवों ने इनका बहुत सत्कार किया। कुछ दिन वहां रहे। अंत में, इन्होंने धृतराष्ट्र से वन में चलकर तपस्या करने के लिए कहा। इनकी बात मानकर वे गांधारी और कुंती के साथ वन में चले गए। विदुर जी भी उनके साथ थे। वन में जाकर विदुर जी ने एक पेड़ के सहारे खड़े खड़े ही योगियों की तरह अपने शरीर को त्याग दिया और अपने स्वरूप में मिल गए।

        महाभारत में वर्णन आता है कि धृतराष्ट्र मोह वश अपने पुत्र दुर्योधन का अधिक पक्ष लेते थे। इस कारण वे बहुत दुखी भी रहते थे। अधर्म नीति के परिणामों को जान कर वे अत्यंत विकल हो गए। अनिश्चय की स्थिति में पहुंच गए तो उन्होंने एक दिन अमात्य विदुर जी को बुलवाया और अपनी चिंता मिटाने का उपाय पूछा इस पर विदुर जी ने जो उपदेश धृतराष्ट्र को दिया वहीं विदुर नीति के नाम से जाने जाते हैं। विदुर जी ने बहुत सी बातें समझाई है। हालांकि यह बातें धृतराष्ट्र को संबोधित करके कही गई है परंतु यह बातें सभी के लिए कल्याणकारी व उपयोगी है।


Wednesday, 12 August 2020

(6.6.1)Krishna Gayatri Mantra Ke Laabh

 Krishna Gayatri Mantra / Benefits Of Krishna Gayatri Mantra / कृष्ण गायत्री मन्त्र / कृष्ण गायत्री मन्त्र के लाभ 

कृष्ण गायत्री मन्त्र

भगवान् कृष्ण, भगवान् विष्णु के अवतार हैं. इनसे सम्बन्धित कई स्तोत्र, मन्त्र आदि हैं. कृष्ण गायत्री मन्त्र भी उनमें से एक है.  

कृष्ण गायत्री मन्त्र के लाभ इस प्रकार हैं-

कृष्ण गायत्री मन्त्र का जप करने से बौद्धिक स्तर बढ़ता है जिससे सोचने व समझने की क्षमता का विकास होता है.

तार्किक क्षमता बढ़ती है.

जपकर्ता को उसके प्रयासों में सफलता मिलती है.

आत्मविश्वास की वृद्धि होती है.

सभी प्रकार की सम्पन्नता आती है.

विद्यार्थियों को परीक्षा में सफलता मिलती है.

क्या करूं, क्या नहीं करूं की स्थिति नहीं रहती है अर्थात लक्ष्य स्पष्ट दिखने लगता है.

कृष्ण गायत्री मन्त्र जप की विधि –

दैनिक कार्य से निवृत्त होकर पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊन के आसन पर बैठ जायें. श्री कृष्ण का चित्र अपने सामने रख लें. धूपबत्ती व दीपक जलायें. अपनी आँखें बंद करके श्री कृष्ण का ध्यान करें. ध्यान इस प्रकार है –

जिनके अंग की कान्ति मेघ के सामान श्याम है, जो प्यारे व्रज चन्द्र, बडभागी और दिव्य लीलामय हैं, सदा आनन्द करने वाले और भ्रान्ति को भगाने वाले हैं, उन सब सुखों के सारभूत, परब्रह्म स्वरुप, नन्द नन्दन श्री कृष्ण को मैं वार बार प्रणाम करता हूँ. इस प्रकार ध्यान के बाद श्री कृष्ण गायत्री मन्त्र का पाँच, तीन या एक माला का जप करें.    

कृष्ण गायत्री मन्त्र इस प्रकार है –

ॐ देवकीनन्दनाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्णः प्रचोदयात्  

मन्त्र जप के बाद भावना करें भगवान् कृष्ण का आशीर्वाद आपको मिल रहा है.  

 

 

Sunday, 2 August 2020

(1.1.25) Gita/Geeta sambandhi prashn aur uttar (Questions and answers related to Geeta)

 श्री मद्भगवद्गीता सम्बन्धी प्रश्न और उत्तर (Questions and answers related to Geeta)

श्री मद्भगवद्गीता सम्बन्धी प्रश्न और उत्तर

(1)किसी महापुरुष की जयंती मनाई जाती है, परन्तु एक ग्रन्थ ऐसा है जिसकी भी जयंती मनाई जाती है, वह कौनसा ग्रन्थ है?

वह ग्रन्थ है गीता.

(2)गीता जयंती क्यों मनाई जाती है?

अन्य ग्रन्थ किसी न किसी मनुष्य द्वारा लिखे या संकलित किये गए हैं, परन्तु गीता एक ऐसा ग्रन्थ है जिसका जन्म स्वयं भगवान् के श्रीमुख से हुआ है.

(3)गीता जयंती कब मनाई जाती है?

गीता जयंती प्रतिवर्ष मार्गशीर्ष में शुक्लपक्ष की एकादशी को मनाई जाती है. इस तिथि को गीता का प्रतीकात्मक जन्म दिवस माना  जाता है.

(4)गीता किस ग्रन्थ का भाग है?

गीता महाभारत के भीष्मपर्व का भाग है.

(5)गीता को गीता क्यों कहा जाता है?

गीता शब्द का अर्थ है गायन किया हुआ. श्री कृष्ण ने छन्द रूप में यानि गाकर उपदेश दिया, इसलिए इसे गीता कहा जाता है.

(6)गीता को मद्भगवद्गीता क्यों कहा जाता है?

गीता उपदेश स्वयं भगवान् के द्वारा गायन के रूप में दिया गया,इसलिए इसे मद्भगवद्गीता कहा जाता है.

(7)गीता को गीतोपनिषद क्यों कहा जाता है?

गीता की गणना उपनिषदों में की जाती है, इसलिए इसी गीतोपनिषद कहा जाता है.

(8)गीता का उपदेश किसने दिया और किसको दिया ?

गीता का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को दिया। 

(9)अर्जुन के अतिरिक्त गीता का उपदेश किसने सुना ?

अर्जुन के अतिरिक्त गीता का उपदेश संजय ने सुना और उसने धृतराष्ट्र को सुनाया.

(10)संजय कौन था?

संजय धृतराष्ट्र की सभा के सम्मानित सदस्य थे. वे वेदव्यास के शिष्य और कृष्ण के भक्त थे.

(11)संजय को दिव्य दृष्टि किसने दी थी और क्यों दी थी?

संजय को दिव्य दृष्टि महर्षि वेदव्यास जी ने दी थी, ताकि वह महाभारत युद्ध की समस्त घटनाओं को देख सके, सुन सके और जान सके और धृतराष्ट्र को युद्ध का सारा वृत्तान्त सुना सके.

(12)संजय को दिव्यदृष्टि देने से पहले वेदव्यासजी दिव्य नेत्र किसे देना चाहते थे और क्यों देना चाहते थे?

धृतराष्ट्र अंधे थे इसलिए वेदव्यासजी उन्हें दिव्य नेत्र देना चाहते थे ताकि वे युद्ध की समस्त घटनाओं को देख सके. लेकिन उन्होंने (धृतराष्ट्र) ने दिव्य नेत्र लेने से मना कर दिया.    

(13)अर्जुन से पहले गीता ज्ञान किसको मिला था?

श्री मद्भगवद्गीता के अध्याय चार के श्लोक पहले में भगवान् कहते हैं कि मैंने यह अविनाशी योग सूर्य को कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा.   

(14)गीता में कुल कितने अध्याय हैं?

गीता में कुल 18 अध्याय हैं.

(15)गीता का सबसे लम्बा और सबसे छोटा अध्याय कौनसा है?

सबसे लम्बा अध्याय अठारहवाँ है, जिसमें 78 श्लोक हैं तथा सबसे छोटा अध्याय पन्द्रहवाँ है, जिसमें 20 श्लोक हैं। 

(16)गीता में कुल कितने श्लोक हैं?

गीता में कुल 700 श्लोक हैं। जिनमें से पहला श्लोक धृतराष्ट्र ने कहा है और अंतिम श्लोक संजय ने कहा है। 

(17)किसके द्वारा कितने कितने श्लोक कहे गए हैं?

धृतराष्ट्र ने एक श्लोक कहा है,संजय ने चालीस, अर्जुन ने 85 और श्री कृष्ण ने 574 श्लोक कहे हैं।

(18)महाभारत का युद्ध कहाँ हुआ था?

महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था। 

(19)कुरु क्षेत्र को कुरुक्षेत्र क्यों कहा जाता है ?

कुरुक्षेत्र को कुरुक्षेत्र कहा जाता है,क्योंकि यह क्षेत्र राजा कुरु की तपोभूमि रहा है। 

(20)कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र क्यों कहा जाता है?

शतपथब्राह्मणादि शास्त्रों में कहा गया है कि यहाँ (कुरुक्षेत्र) अग्नि,इन्द्र, ब्रह्मा आदि देवताओं ने तप किया था; राजा कुरु ने भी यहाँ बड़ी तपस्या की थी तथा यहाँ मरने वालों को उत्तम गति प्राप्त होती है, इसलिए कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जाता है.

(21)अर्जुन के रथ में कितने और किस रंग के घोड़े जुते हुए थे?

अर्जुन के रथ में सफ़ेद रंग के चार घोड़े जुते हुए थे.

(22)अर्जुन के रथ पर लगे झंडे पर किसका चिन्ह था?

अर्जुन के रथ पर लगे झंडे पर चन्द्रमा और तारों के चिन्ह थे और उस पर हनुमान जी विराजमान थे.

(23)युद्ध के प्रारम्भ करने की घोषणा किसने की?

भीष्म पितामह ने शंख बजा कर युद्ध के प्रारम्भ करने की घोषणा की.

(24)किसके शंख का क्या नाम था?

श्री कृष्ण के शंख का नाम पांचजन्य था, अर्जुन के शंख का देवदत्त, भीमसेन के शंख का पौण्ड्र, युधिष्ठिर के शंख का अनन्तविजय, नकुल के शंख का सुघोष और सहदेव के शंख का नाम मणि पुष्पक था.

(25)अर्जुन के धनुष का नाम क्या था?

अर्जुन के धनुष का नाम गाण्डीव था.

(26)अर्जुन को दिव्य दृष्टि किसने और क्यों दी?

अर्जुन को दिव्य दृष्टि स्वयं भगवान् ने दी ताकि वह भगवान के दिव्य स्वरुप को देख सके. साधारण नेत्रों से भगवान् का अलौकिक रूप नहीं देखा जा सकता था.  

 

 


Tuesday, 28 July 2020

(6.7.2) Ashta Lakshmi Mantra - Benefits

Ashta Lakshmi Mantra for Material and Spiritual Prosperity / Benefits of Ashtalakshmi Mantra / अष्ट  लक्ष्मी मन्त्र के लाभ

अष्ट लक्ष्मी मन्त्र के लाभ क्या हैं
देवी लक्ष्मी को विभिन्न स्वरूपों में पूजा जाता है।  मुख्य रूप से इनके आठ स्वरुप मने गए हैं। इन आठ स्वरूपों के समूह को अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है।  ये आठ स्वरुप इस प्रकार हैं -

आदि लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, धान्य लक्ष्मी, गज लक्ष्मी, संतान  लक्ष्मी, धैर्य  लक्ष्मी, विजय लक्ष्मी और विद्या लक्ष्मी। 
इन आठ  स्वरूपों के  मन्त्र का श्रद्धा और विश्वास के साथ जप करें तो, जपकर्ता के जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक सम्पन्नता और सुखों की कोई कमी नहीं रहती है।
मन्त्र जप की विधि इस प्रकार है  

इन मन्त्रों के जप के लिए लक्ष्मी के आठ स्वरुप वाला चित्र तथा श्री यन्त्र अपने सामने रखले. उत्तर या पूर्व की तरफ मुँह करके ऊन के आसन पर बैठ जायें. कुछ समय तक देवी लक्ष्मी के चित्र की तरफ देख कर उनके विभिन्न स्वरूपों का ध्यान करें. ध्यान के बाद इन आठ मन्त्रों का कम से कम एक माला का जप करें. मन्त्र इस प्रकार है –

ॐ आद्यलक्ष्म्यै नमः

ॐ धनलक्ष्म्यै नमः

ॐ धान्यलक्ष्म्यै नमः

ॐ गजलक्ष्म्यै नमः

ॐ संतानलक्ष्म्यै नमः

ॐ धैर्यलक्ष्म्यै नमः

ॐ विजयलक्ष्म्यै नमः

ॐ विद्यालक्ष्म्यै नमः

मन्त्र जप के बाद मन ही मन भावना करें कि देवी लक्ष्मी की कृपा से आपको सभी प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदा प्राप्त हो रही है. 

Wednesday, 22 July 2020

(6.7.1)) Ashta Lakshmi - Eight Forms of Lakshmi

Ashta Lakshmi - Eight Forms of Lakshmi अष्ट लक्ष्मी - लक्ष्मी के आठ स्वरुप
अष्ट लक्ष्मी - लक्ष्मी के आठ स्वरुप कौनसे हैं

अष्ट लक्ष्मी - लक्ष्मी के आठ स्वरुप
लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी है। उन्हें सम्पदा, सम्पन्नता व सौभाग्य की देवी के रूप में जाना जाता है। लक्ष्मी को आठ स्वरूपों में पूजा जाता है।  इन आठ स्वरूपों के समूह को अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है। इन स्वरूपों में वह अपने उपासकों व भक्तों को  विभिन्न प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदा प्रदान करती है।  लक्ष्मी के आठ स्वरुप इस प्रकार हैं -
(1) आदि लक्ष्मी -
लक्ष्मी के इस रूप में वे कमल पर विराजमान हैं। उनके चार हाथ हैं जिनमें से  एक में कमल है, दूसरे में पताका है, तीसरे में अभय मुद्रा और चौथे वरदा मुद्रा है।  इस रूप में ये पवित्रता और प्रसन्नता का प्रतीक हैं। इनकी साधना उपासना से मानसिक शांति व सम्पन्नता मिलती है।
(2) धन लक्ष्भी  -
लाल वस्त्र धारण किये देवी की इस छवि में छः भुजाएं हैं जिनमें चक्र,कलश, धनुष , कमल, अभय  मुद्रा (स्वर्ण मुद्रा सहित) हैं। वे धन और स्वर्ण की प्रतीक हैं।वे अपने भक्तों को आर्थिक सम्पन्नता प्रदान करती हैं।
(3) धान्य लक्ष्मी -
इस रूप में देवी हरित वस्त्र धारण किये हुए होती है। इनके आठ भुजाएं हैं जिनमें दो कमल, गदा, धान की फसल,गन्ना, केला, अभय मुद्रा तथा वरदा  मुद्रा हैं। वे अपने भक्तों को भोजन, अनाज और विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री के साथ साथ सांसारिक भोग की वस्तुएं भी प्रदान करती हैं।
(4) गज लक्ष्मी -
इस छवि में वे लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं। उनके दोनों तरफ एक - एक हाथी है। उनके चार भुजाएं हैं, जिनमें दो कमल,अभय मुद्रा तथा वरदा मुद्रा हैं। इनको पशुधन की समृद्धि की दाता माना जाता है। ये कार्य में गतिशीलता प्रदान करती हैं।
(5) संतान लक्ष्मी -
इस रूप में देवी के छः भुजाएं हैं।  उनके दो हाथों में कलश हैं, दो हाथों में तलवार और ढाल हैं,  एक हाथ अभय मुद्रा में है , उनकी गोद में एक बच्चा है  जिसे एक हाथ से थामा हुआ है, बच्चे के हाथ में एक कमल है। संतान लक्ष्मी के रूप में वे अपने उपासकों को उत्तम संतान प्रदान करती हैं।
(6)धैर्य लक्ष्मी  -
इस रूप में वे लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं।  उनके आठ भुजाएं हैं, जिनमें चक्र,शंख, धनुष, तीर, तलवार, ताड़ के पत्तों पर लिखी हुई पाण्डुलिपि, अभय मुद्रा तथा वरदा मुद्रा हैं।  ये वीरता, साहस की प्रतीक हैं , इसलिए इनको वीर लक्ष्मी भी कहा जाता है। वे अपने भक्तों को  सभी प्रकार की बाधाओं पर विजय पाने के लिए साहस , शक्ति और धैर्य प्रदान करती हैं।
(7) विजय लक्ष्मी -
इस छवि में देवी लाल वस्त्र धारण किये हुए है।  उनके आठ भुजाएं हैं , जिनमें चक्र, शंख, तलवार, कवच, कमल, पाशा, अभय मुद्रा और वरदा मुद्रा हैं। ये श्रेष्ठ वरदानों की प्रतीक हैं। यह अपने उपासकों को जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय दिलाने के लिए जानी जाती है।  इनकी कृपा से शत्रु का दमन होता है।  नकारात्मक विचार प्रभावहीन  रहते हैं।
(8) विद्या लक्ष्मी -
इस छवि में देवी  सफ़ेद साड़ी पहने हुई है। वे सरस्वती की तरह दिखाई देती हैं। उनके चार भुजाएं हैं, जिनमें पुस्तक, कलम के रूप में मोर पंख, वरदा मुद्रा और अभय मुद्रा हैं।  वे अपने भक्तों को कला, विज्ञानं आदि सभी क्षेत्रों का  ज्ञान प्रदान करती हैं। वे सद्बुद्धि दायनी हैं। 

Wednesday, 15 July 2020

(6.8.5) Shivling Ki Parikrama Ka Vidhan

Shvaling Ki Parikrama Kaise Ki Jati Hai ? Shivling Ki Kitani Parikrama Ki Jati Hai ?Shiv Ling Ki Adhi Parikrama Kyon Ki Jati Hai शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्योंऔर कैसे की जाती है 

शिवलिंग की आधी परिक्रमा क्यों और कैसे की जाती है
भगवान शिव की पूजा - अर्चना करने से सम्पूर्ण मनोकामनाओं की पूर्ती होती है और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। शिवलिंग की परिक्रमा करना भी शिव पूजा का ही अंग है।
शिवलिंग की परिक्रमा  का विधान -
शिवलिंग की आधी परिक्रमा करने का ही विधान है। परिक्रमा करते समय सोम सूत्र लांघा नहीं जाता है। सोमसूत्र से तात्पर्य उस स्थान से है जिस स्थान की ओर शिवलिंग पर चढ़ाया हुआ जल गिरता है। अतः जो व्यक्ति परिक्रमा करना चाहता है, उसे सोमसूत्र के पास इस तरह खड़ा होना चाहिए जिससे उसका दाहिना हाथ सोमसूत्र और शिवलिंग की तरफ रहे। परिक्रमा करते हुए सोमसूत्र तक जाकर बिना उसे लांघे पीछे मुड़कर वापस उस स्थान तक पहुँच जाये जहाँ से परिक्रमा शुरू की गई थी। इस प्रकार सोमसूत्र के पास से चल कर वापस सोमसूत्र तक आना शिवलिंग की आधी परिक्रमा पूर्ण होती है।
किस स्थिति में सोमसूत्र का लंघन किया जा सकता है - 
नित्य कर्म पूजा प्रकाश के पृष्ठ संख्या 297 के अनुसार यदि सोमसूत्र तृण, काष्ठ, पत्थर, ईंट आदि से ढका हुआ हो तो, उस सोमसूत्र का लंघन किया जा सकता है अर्थात लांघा जा सकता है।