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Tuesday, 19 September 2023

(6.7.9) देवी लक्ष्मी के 18 पुत्रों के नाम Lakshmi Ke 18 Putron Ke Naam

देवी लक्ष्मी के 18 पुत्रों के नाम Lakshmi Ke 18 Putron Ke Naam

देवी लक्ष्मी के 18 पुत्रों के नाम

देवी लक्ष्मी धन, सम्पति तथा सम्पन्नता की देवी है. इनके आशीर्वाद से इनके भक्तों को कभी भी आर्थिक कठिनाई का सामना नहीं करना पड़ता है. इनकी कृपा पाने के लिए कई स्तोत्र, मन्त्र आदि हैं. इनके 18 पुत्रों के नामों का स्मरण भी उनमें से एक है. प्रतिदिन इन 18 नामों का जप करने से देवी लक्ष्मी की कृपा से सम्पन्नता आती है और मानसिक शान्ति मिलती है. 

देवी माँ लक्ष्मी के 18 पुत्रों के नाम इस प्रकार हैं –

ॐ देवसखाय नमः

ॐ चिक्लीताय नमः

ॐ आनन्दाय नमः

ॐ कर्दमाय नमः

ॐ श्रीप्रदाय नमः

ॐ जातवेदाय नमः

ॐ अनुरागाय नमः

ॐ सम्वादाय नमः

ॐ विजयाय नमः

ॐ वल्लभाय नमः

ॐ मदाय नमः

ॐ हर्षाय नमः

ॐ बलाय नमः

ॐ तेजसे नमः

ॐ दमकाय नमः

ॐ सलिलाय नमः

ॐ गुग्गुलाय नमः

ॐ कुरुन्टकाय नमः 

(6.7.8) श्री सूक्त (आर्थिक सम्पन्नता हेतु) Shree Sukt for wealth and prosperity / Shri Sukt in Hindi

 श्री सूक्त (आर्थिक सम्पन्नता हेतु) Shree Sukt for wealth and prosperity / Shri Sukt in Hindi

श्री सूक्त / श्री सूक्तम्

श्री सूक्त, देवी लक्ष्मी से सम्बंधित स्तोत्रों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तोत्र है. यह स्तोत्र भौतिक कामनाओं की पूर्ति तथा यश प्राप्त करने का अमोघ साधन है.

श्री सूक्त का हिंदी रूपान्तरण इस प्रकार है –

हे जातवेद, अग्निदेव, आप सुवर्ण के समान रंगवाली, किंचित हरितवर्ण विशिष्टा, सोने और चाँदी के हार पहनने वाली, चन्द्रवत प्रसन्नकान्ति, स्वर्णमय लक्ष्मीदेवी का मेरे लिए आह्वान करें. (१)

हे जातवेद, अग्निदेव, उन लक्ष्मीदेवी का, जिनका कभी विनाश नहीं होता है, तथा जिनके आगमन से मैं स्वर्ण, गायें, घोड़े तथा पुत्रादि प्राप्त करूँगा, मेरे लिए आप उनका आह्वान करे. (२)

देवी, जो घोड़े जुते रथ के मध्य में विराजमान रहती हैं. जो हस्तिनाद सुनकर प्रसन्न होती हैं, उन्हीं श्रीदेवी का मैं आह्वान करता हूँ. सबकी आश्रयदाता माता लक्ष्मी मेरे घर में सदैव निवास करे.(३)

जिस देवी का स्वरुप, मन और वाणी का विषय न होने के कारण, अवर्णनीय है तथा जिनके अधरों पर सदैव मुस्कान रहती है, जो चारों ओर स्वर्ण से ओतप्रोत हैं, जिनका ह्रदय दया से द्रवित है, जो अपने भक्तों के मनोरथों को पूर्ण करने वाली हैं, कमल के आसन पर विराजमान और पद्मवर्णा हैं, मैं ऐसी देवी लक्ष्मी को मेरे घर में आने के लिए उनका आह्वान करता हूँ. (४)

चन्द्रमा के समान प्रकाश वाली, श्रेष्ठ कान्ति वाली, अपनी कीर्ति से देदीप्यमान, स्वर्गलोक में देवगणों द्वारा पूजिता, उदारशीला, पद्महस्ता लक्ष्मी देवी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ. आपकी कृपा से मेरी दरिद्रता नष्ट हो. (५)

हे सूर्य के समान कान्ति वाली देवी, आपके ही तप से वृक्षों में श्रेष्ठ बिल्ववृक्ष उत्पन्न हुआ है. उस बिल्व वृक्ष का फल आपके अनुग्रह से मेरी बाहरी और भीतरी दरिद्रता को दूर् करे. (६)

हे देवी लक्ष्मी, देव सखा कुबेर और उनके मित्र मणिभद्र तथा दक्ष प्रजापति की कन्या कीर्ति मुझे प्राप्त हो अर्थात मुझे धन और यश की प्राप्ति हो. मैं इस राष्ट्र में पैदा हुआ हूँ. मुझे कीर्ति और समृद्धि प्रदान करें. (७)

लक्ष्मी की बड़ी बहन अलक्ष्मी अर्थात दरिद्रता की अधिष्ठात्री देवी का, जो क्षुधा और विपासा से मलीन व क्षीणकाय रहती है, मैं उसका नाश चाहता हूँ. हे देवी, मेरे घर से हर प्रकार की दरिद्रता और अमंगल को दूर करो. (८)

सुगन्धित पुष्प के समर्पण करने से प्राप्त करने योग्य, किसी से भी न दबने योग्य, धन धान्य से सर्वदा पूर्ण कर समृद्धि देने वाली, समस्त प्राणियों की स्वामिनी तथा संसार प्रसिद्ध लक्ष्मी का मैं अपने घर में सादर आह्वान करता हूँ. (९)

हे माँ लक्ष्मी आपकी कृपा से मेरे मनोरथ, संकल्प सिद्धि एवं वाणी की सत्यता मुझे प्राप्त हो. आपकी कृपा से मुझे गाय आदि पशुओं के दूध, दही एवं विभिन्न प्रकार के भोजनादि प्राप्त हो, हे माँ लक्ष्मी सभी प्रकार की संपत्ति को आप मुझे प्राप्त कराये अर्थात मैं लक्ष्मीवान व कीर्तिमान बनूँ (१०)

हे देवी लक्ष्मी, आप कर्दम नामक पुत्र से युक्त हो, हे लक्ष्मी पुत्र कर्दम, आप मेरे घर में प्रसन्नता के साथ निवास करो, और कमल की माला धारण करने वाली आपकी माता श्री लक्ष्मीजी को मेरे घर में स्थापित कराओ. (११)

हे लक्ष्मी के पुत्र चिक्लीत आप मेरे घर में निवास करें. केवल आप ही नहीं, आपके साथ दिव्य गुणों से युक्त सबको आश्रय देने वाली लक्ष्मी को भी मेरे घर में निवास कराओ. (१२)

हे अग्निदेव, आप मेरे घर में पुष्करिणी अर्थात हाथियों की सूंडों से आद्र शरीर वाली, पुष्टि प्रदान करने वाली, पीतवर्ण वाली, कमल की माला धारण करने वाली, चन्द्रमा के समान शुभ्र कान्ति से युक्त , स्वर्णमयी लक्ष्मी देवी का मेरे यहाँ आह्वान करें. (१३)

हे अग्ने, जो दुष्टों का निग्रह करने वाली होने पर भी कोमल स्वभाव की हैं, जो मंगलदायिनी, अवलंबन प्रदान करने वाली, सुवर्ण माला धारिणी, सूर्य स्वरूपा तथा हिरण्यमयी हैं, उन लक्ष्मीदेवी का मेरे लिए आह्वान करें. (१४)

हे अग्ने, कभी नष्ट न होने वाली, उन लक्ष्मी देवी का मेरे यहाँ आह्वान करें, जिनके आगमन से मुझे बहुत सारा धन, गायें, दासियाँ, अश्व और पुत्रादि प्राप्त हो. (१५)

जिस व्यक्ति को सुख समृद्धि व अतुल लक्ष्मी की कामना हो, वह प्रतिदिन पवित्र और सयंमशील होकर अग्नि में घी की आहुति दे तथा इन पन्द्रह ऋचाओं वाले श्री सूक्त का पाठ करे. (१६)

इति श्री सूक्त सम्पूर्ण

 

 

 

(6.7.7) श्री सूक्त के पाठ करने के लाभ और पाठ की विधि Benefits of Shree Sookt

 श्री सूक्त के पाठ करने के लाभ और पाठ की विधि Benefits of Shree Sookt

श्री सूक्त के पाठ करने के लाभ और विधि

श्री सूक्त या श्री सूक्तम् देवी लक्ष्मी की आराधना के लिए उनको समर्पित स्तोत्र है. इस स्तोत्र मन्त्र का पाठ करने के लाभ इस प्रकार हैं –

श्रीसूक्त का श्रद्धा और विश्वास पाठ करने वाले व्यक्ति पर देवी लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है जिससे उसको किसी प्रकार का अभाव नहीं रहता है. इस संसार के समस्त सुखों की प्राप्ति होती है. उसकी मनोकामना पूर्ण होती है,

उसे आर्थिक सम्पन्नता और यश प्राप्त होते हैं. जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव आते हैं.

रचनात्मकता का विकास होता है और कार्य में अपेक्षित सफलता प्राप्त होती है.

श्री सूक्त के पाठ करने की विधि –

श्री सूक्त का पाठ शुक्रवार या किसी शुभ दिन से प्रारम्भ किया जा सकता है. देवी लक्ष्मी का चित्र अपने सामने रखें. पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊन के आसन पर बैठ जाएँ. फिर देवी लक्ष्मी का ध्यान करे.

ध्यान इस प्रकार है –

भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान जिनके सुन्दर नेत्र हैं. जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्त वाली नाभि है, जो सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि जड़ित दिव्य स्वर्ण कलशों के द्वारा स्नान किये हुए हैं, जो भगवान् विष्णु को बहुत प्रिय है, वे कमलहस्ता सदा सभी मंगलों के सहित मेरे घर में निवास करें.    

ध्यान के बाद प्रतिदिन श्री सूक्त का पाठ करें. पाठ करने के बाद भावना करें कि देवी लक्ष्मी की आप पर कृपा वृष्टि हो रही है और आप भौतिक और आध्यात्मिक रूप से सम्पन्न हो रहे हैं. आपकी मनोकामना पूर्ण हो रही है.

 

Sunday, 3 September 2023

(6.7.6) लक्ष्मी गायत्री मन्त्र / लक्ष्मी गायत्री मंत्र के लाभ Benefits of Lakshmi Gayatri Mantra

 लक्ष्मी गायत्री मन्त्र / लक्ष्मी गायत्री मंत्र के लाभ Benefits of Lakshmi Gayatri Mantra

लक्ष्मी गायत्री मन्त्र Lakshmi Gayatri Mantra

देवी लक्ष्मी धन, समृद्धि, सम्पदा और शौभाग्य की देवी है. यह अपने भक्तों को सभी प्रकार की सम्पदा प्रदान करती है. देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त करने के लिए शास्त्रों में कई उपाय बताये गए हैं. लक्ष्मी गायत्री मन्त्र का जप करना भी उन उपायों में से एक उपाय है.

लक्ष्मी गायत्री मन्त्र के जप करने के लाभ इस प्रकार हैं –

लक्ष्मी गायत्री मन्त्र का निष्ठा और विश्वास के साथ जप करने से जप कर्ता को देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.

जपकर्ता का भाग्योदय होता है.

आर्थिक सम्पन्नता प्राप्त होती है.

व्यवसाय में सफलता प्राप्त होती है.

व्यापार में घाटे की स्थिति नहीं आती है.

मनोकामना पूर्ण होती है.

ऋणी को ऋण से मुक्ति मिलती है.

लक्ष्मी गायत्री मन्त्र के जप करने की विधि –

देवी लक्ष्मी का चित्र अपने सामने रखें. पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊन के आसन पर बैठ जाएँ. फिर देवी लक्ष्मी का ध्यान करे.

ध्यान इस प्रकार है –

भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान जिनके सुन्दर नैत्र हैं. जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्त वाली नाभि है, जो सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि जड़ित दिव्य स्वर्ण कलशों के द्वारा स्नान किये हुए हैं, जो भगवान् विष्णु को बहुत प्रिय है, वे कमलहस्ता सदा सभी मंगलों के सहित मेरे घर में निवास करें.    

ध्यान के बाद लक्ष्मी गायत्री मन्त्र का श्रद्धा और विश्वास के साथ प्रतिदिन सुविधा अनुसार पाँच, तीन या एक माला का जप करें. जप करने के बाद भावना करें कि देवी लक्ष्मी की आप पर कृपा वृष्टि हो रही है और आप भौतिक और आध्यात्मिक रूप से सम्पन्न हो रहे हैं. आपकी मनोकामना पूर्ण हो रही है.

लक्ष्मी गायत्री मन्त्र इस प्रकार है -

ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णु प्रियायै धीमहि तन्नो लक्ष्मी प्रचोदयात्

 

 

Saturday, 2 September 2023

(6.7.5) लक्ष्मी कहाँ नहीं रहती है ? लक्ष्मी कहाँ वास नहीं करती है. Laxmi Kahan Nahin Rahati Hai?

 लक्ष्मी कहाँ नहीं रहती है ? लक्ष्मी कहाँ वास नहीं करती है. Laxmi Kahan Nahin Rahati Hai?

 लक्ष्मी कहाँ नहीं रहती है ?

लक्ष्मी कहाँ नहीं रहती है इस संबंध में देवी लक्ष्मी स्वयं कहती हैं कि मैं मिथ्यावादी अर्थात झूठ बोलने वाले, धर्म ग्रंथों को कभी भी नहीं देखने वाले यानि धर्म ग्रंथों को पढ़ने सुनने से परहेज करने वाले, पराक्रम से हीन, दुष्ट स्वभाव वाले पुरुषों के घर मैं नहीं जाती हूँ.  

सत्य से हीन, किसी की धरोहर छीनने वाले, झूठी गवाही देने वाले, विश्वासघात करने वाले, तथा कृतघ्न पुरुषों के घर भी मैं नहीं जाती हूँ.

चिंता ग्रस्त, भय में सदा डूबे हुए, शत्रुओं से घिरे हुए, अत्यंत पातकी, कर्जदार और अत्यन्त कंजूस के घर मैं नहीं जाती हूँ. परिणाम स्वरुप वे जीवन भर दीन हीन ही बने रहते हैं.

मैं दीक्षाहीन, शोकग्रस्त, मन्दबुद्धि और व्यभिचारी मनुष्य के घर में भी मैं नहीं रहती हूँ.

कटुभाषी, कलह प्रिय अर्थात जिस परिवार में कलह या लड़ाई झगड़े का वातावरण होता है, ऐसे परिवार में भी मैं नहीं रहती हूँ.

जिस घर में भगवान की पूजा और कीर्तन नहीं होते हैं अर्थात जहाँ सात्विक वातावरण का प्रभाव नहीं होता है, जिस व्यक्ति के मन में भगवान की प्रशंसा का भाव नहीं होता है, मैं वहाँ नहीं रहती हूँ.     

मैं अकर्मण्य, आलसी, नास्तिक, परलोक और ईश्वर को नहीं मानने वाले, वर्णसंकर   जारज,  कृतघ्न यानि उपकार को भुला देने वाले, अपनी बात पर स्थिर नहीं रहने वाले, कठोर वचन बोलने वाले, चोर और गुरुजन के प्रति इर्ष्या – द्वेष तथा डाह रखने वाले पुरुषों के घर में भी मैं कभी नहीं रहती हूँ.

मैं ऐसे पुरुषों के पास भी कभी नहीं रहना चाहती, जिनमें तेज, बल और आत्म गौरव का सदा अभाव रहता है. जो लोग थोड़े में ही कष्ट का अनुभव करने लगते हैं, जरा – जरा सी बात पर क्रोध करने लगते हैं तथा जिनके मनोरथ कभी कार्यरूप में परिणित नहीं होते हैं.

चाणक्य नीति के अनुसार गन्दा वस्त्र पहनने वाले, दांतों को साफ़ नहीं रखने वाले, अधिक भोजन करने वाले, निष्ठुर भाषण करने वाले तथा सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय सोने वाले व्यक्ति को लक्ष्मी त्याग देती है.

विदुर नीति के अनुसार जो व्यक्ति दुःख से पीड़ित, प्रमादी, नास्तिक, आलसी और उत्साह रहित हैं, उनके यहाँ भी लक्ष्मी वास नहीं करती है. इसके अतिरिक्त महात्मा विदुर आगे कहते हैं कि जैसे हंस सूखे सरोवर के आस पास ही मंडराकर रह जाते हैं, भीतर प्रवेश नहीं करते, उसी प्रकार जिसका चित्त चंचल है, जो अज्ञानी और इन्द्रियों का गुलाम है, उसके घर में लक्ष्मी प्रवेश नहीं करती है.

 

Thursday, 24 August 2023

(6.7.3) देवी लक्ष्मी का महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र आर्थिक सम्पन्नता हेतु Mahalakshmi ashtakam stotra for prosperity

 देवी लक्ष्मी का महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र आर्थिक सम्पन्नता हेतु Mahalakshmi ashtakam stotra for prosperity

महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र आर्थिक सम्पन्नता हेतु

महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र, धन, सम्पदा और सम्पन्नता की देवी लक्ष्मी की इन्द्र द्वारा की गयी स्तुति है. कहा जाता है कि दुर्वासा ऋषि के शाप से इन्द्र श्रीहीन हो गये. तब इन्द्र ने एक स्तोत्र की रचना की और देवि लक्ष्मीकी स्तुति की. यह स्तोत्र ही महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र कहलाता है.

महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र का पाठ करने के लाभ –

महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र के आठ श्लोकों में धन की देवी लक्ष्मी के स्वरुप, गुण और महाशक्तियों का उल्लेख है. जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ इस स्तोत्र का सदा पाठ करता है, वह सारी सिद्धियों और राज वैभव को प्राप्त कर सकता है. जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है, उसके बड़े – बड़े पापों का नाश हो जाता है. जो दो समय पाठ करता है, वह धन – धान्य से सम्पन्न होता है. जो प्रतिदिन तीन काल पाठ करता है, उसके शत्रुओं का नाश हो जाता है और उसके ऊपर कल्याणकारिणी, वरदायिनी महालक्ष्मी सदा ही प्रसन्न होती है. 

धन तेरस से दीपावली तक जो कोई प्रतिदिन पाँच बार या अधिक बार पाठ करता है, तो उस पर लक्ष्मी की विशेष कृपा होती है. वह धन – धान्य से युक्त होता है. 

महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र के पाठ करने की विधि –

देवी लक्ष्मी का चित्र अपने सामने रखें. पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊन के आसन पर बैठ जाएँ. फिर देवी लक्ष्मी का ध्यान करे.

ध्यान इस प्रकार है –

भगवती लक्ष्मी कमल के आसन पर विराजमान हैं, कमल की पंखुड़ियों के समान जिनके सुन्दर नैत्र हैं. जिनकी विस्तृत कमर और गहरे आवर्त वाली नाभि है, जो पयोधरों के भार से झुकी हुई और सुन्दर वस्त्र के उत्तरीय से सुशोभित हैं, जो मणि जड़ित दिव्य स्वर्ण कलशों के द्वारा स्नान किये हुए हैं, वे कमलहस्ता सदा सभी मंगलों के सहित मेरे घर में निवास करें.    

ध्यान के बाद इस स्तोत्र का श्रद्धा और विश्वास के साथ पाठ करें. पाठ करने के बाद भावना करें कि देवी लक्ष्मी की आप पर कृपा वृष्टि हो रही है और आप भौतिक और आध्यात्मिक रूप से सम्पन्न हो रहे हैं. 

महालक्ष्म्यष्टकम् स्तोत्र के आठों श्लोक हिन्दी में इस प्रकार है –

श्री पीठ स्थित और देवताओं से पूजित होने वाली हे महामाये ! तुम्हें नमस्कार है. हाथ में शंख, चक्र और गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मि, तुम्हें प्रणाम है.(1)

गरुड़ पर आरूढ़ हो कोलासुर को भय देने वाली और समस्त पापों को हरने वाली हे भगवति महालक्ष्मि, तुम्हें प्रणाम है. (2)

सब कुछ जानने वाली, सबको वर देने वाली, समस्त दुष्टों को भय देने वाली और सबके दुखों को दूर करने वाली, हे देवि महालक्ष्मि, तुम्हें नमस्कार है. (3)

सिद्धि,बुद्धि, भोग और मोक्ष देने वाली हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मि, तुम्हें सदा प्रणाम है. (4)

हे देवि, हे आदि – अंत रहित आदिशक्ते, हे महेश्वरि, हे योग से प्रकट हुई भगवति महालक्ष्मि, तुम्हें नमस्कार है. (5)

हे देवि, तुम स्थूल, सूक्ष्म एवं महारौद्ररूपिणी हो, महा शक्ति हो, महोदरा हो और बड़े – बड़े पापों का नाश करने वाली हो. हे देवि महालक्ष्मि, तुम्हें नमस्कार है.(6)

हे कमल के आसन पर विराजमान परब्रह्मस्वरूपिणी देवि, हे परमेश्वरि, हे जगदम्बे, हे महालक्ष्मि, तुम्हें मेरा प्रणाम है.(7)

हे देवि ! तुम श्वेत वस्त्र धारण करने वाली और नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषिता हो. सम्पूर्ण जगत में व्याप्त एवं अखिल लोक को जन्म देने वाली हो.

हे महालक्ष्मि, तुम्हें मेरा प्रणाम है.(8) 

 

 

Wednesday, 22 July 2020

(6.7.1)) Ashta Lakshmi - Eight Forms of Lakshmi

Ashta Lakshmi - Eight Forms of Lakshmi अष्ट लक्ष्मी - लक्ष्मी के आठ स्वरुप
अष्ट लक्ष्मी - लक्ष्मी के आठ स्वरुप कौनसे हैं

अष्ट लक्ष्मी - लक्ष्मी के आठ स्वरुप
लक्ष्मी भगवान् विष्णु की पत्नी है। उन्हें सम्पदा, सम्पन्नता व सौभाग्य की देवी के रूप में जाना जाता है। लक्ष्मी को आठ स्वरूपों में पूजा जाता है।  इन आठ स्वरूपों के समूह को अष्ट लक्ष्मी कहा जाता है। इन स्वरूपों में वह अपने उपासकों व भक्तों को  विभिन्न प्रकार की भौतिक और आध्यात्मिक सम्पदा प्रदान करती है।  लक्ष्मी के आठ स्वरुप इस प्रकार हैं -
(1) आदि लक्ष्मी -
लक्ष्मी के इस रूप में वे कमल पर विराजमान हैं। उनके चार हाथ हैं जिनमें से  एक में कमल है, दूसरे में पताका है, तीसरे में अभय मुद्रा और चौथे वरदा मुद्रा है।  इस रूप में ये पवित्रता और प्रसन्नता का प्रतीक हैं। इनकी साधना उपासना से मानसिक शांति व सम्पन्नता मिलती है।
(2) धन लक्ष्भी  -
लाल वस्त्र धारण किये देवी की इस छवि में छः भुजाएं हैं जिनमें चक्र,कलश, धनुष , कमल, अभय  मुद्रा (स्वर्ण मुद्रा सहित) हैं। वे धन और स्वर्ण की प्रतीक हैं।वे अपने भक्तों को आर्थिक सम्पन्नता प्रदान करती हैं।
(3) धान्य लक्ष्मी -
इस रूप में देवी हरित वस्त्र धारण किये हुए होती है। इनके आठ भुजाएं हैं जिनमें दो कमल, गदा, धान की फसल,गन्ना, केला, अभय मुद्रा तथा वरदा  मुद्रा हैं। वे अपने भक्तों को भोजन, अनाज और विभिन्न प्रकार की खाद्य सामग्री के साथ साथ सांसारिक भोग की वस्तुएं भी प्रदान करती हैं।
(4) गज लक्ष्मी -
इस छवि में वे लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं। उनके दोनों तरफ एक - एक हाथी है। उनके चार भुजाएं हैं, जिनमें दो कमल,अभय मुद्रा तथा वरदा मुद्रा हैं। इनको पशुधन की समृद्धि की दाता माना जाता है। ये कार्य में गतिशीलता प्रदान करती हैं।
(5) संतान लक्ष्मी -
इस रूप में देवी के छः भुजाएं हैं।  उनके दो हाथों में कलश हैं, दो हाथों में तलवार और ढाल हैं,  एक हाथ अभय मुद्रा में है , उनकी गोद में एक बच्चा है  जिसे एक हाथ से थामा हुआ है, बच्चे के हाथ में एक कमल है। संतान लक्ष्मी के रूप में वे अपने उपासकों को उत्तम संतान प्रदान करती हैं।
(6)धैर्य लक्ष्मी  -
इस रूप में वे लाल वस्त्र धारण किये हुए हैं।  उनके आठ भुजाएं हैं, जिनमें चक्र,शंख, धनुष, तीर, तलवार, ताड़ के पत्तों पर लिखी हुई पाण्डुलिपि, अभय मुद्रा तथा वरदा मुद्रा हैं।  ये वीरता, साहस की प्रतीक हैं , इसलिए इनको वीर लक्ष्मी भी कहा जाता है। वे अपने भक्तों को  सभी प्रकार की बाधाओं पर विजय पाने के लिए साहस , शक्ति और धैर्य प्रदान करती हैं।
(7) विजय लक्ष्मी -
इस छवि में देवी लाल वस्त्र धारण किये हुए है।  उनके आठ भुजाएं हैं , जिनमें चक्र, शंख, तलवार, कवच, कमल, पाशा, अभय मुद्रा और वरदा मुद्रा हैं। ये श्रेष्ठ वरदानों की प्रतीक हैं। यह अपने उपासकों को जीवन के सभी क्षेत्रों में विजय दिलाने के लिए जानी जाती है।  इनकी कृपा से शत्रु का दमन होता है।  नकारात्मक विचार प्रभावहीन  रहते हैं।
(8) विद्या लक्ष्मी -
इस छवि में देवी  सफ़ेद साड़ी पहने हुई है। वे सरस्वती की तरह दिखाई देती हैं। उनके चार भुजाएं हैं, जिनमें पुस्तक, कलम के रूप में मोर पंख, वरदा मुद्रा और अभय मुद्रा हैं।  वे अपने भक्तों को कला, विज्ञानं आदि सभी क्षेत्रों का  ज्ञान प्रदान करती हैं। वे सद्बुद्धि दायनी हैं। 

Friday, 30 August 2019

(3.2.5) Lakshmi Ke Baarah Naam


लक्ष्मी के बारह नाम Lakshmi ke Barah Naam 

हिन्दू मान्यता के अनुसार लक्ष्मी एक प्रमुख देवी है |वे भगवान् विष्णु की पत्नी हैं | लक्ष्मी को धन, सम्पदा, शान्ति, सम्पन्नता व समृद्धि की देवी माना जाता है | यों तोलक्ष्मी से सम्बंधित कई मन्त्र,स्तोत्र, श्लोक आदि हैं | सभी का अपना अपना महत्व है| इसी सन्दर्भ में देवी लक्ष्मी के बारह नामों का भी अपना महत्व है | इसी सन्दर्भ में देवी लक्ष्मी के बारह नामों का भी उल्लेख मिलाता है जिनका प्रतिदिन जप करके लक्ष्मी की कृपा व आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है | लक्ष्मी के बारह नामों का स्तोत्र इस प्रकार है -  
लक्ष्मी के बारह नाम का स्तोत्र
ईश्वरी कमला लक्ष्मीश्चला भूतिर्हरिप्रिया |
पद्मा पद्मालय सम्पद रमा श्री: पद्मधारिणी  ||
द्वादशैतानि नामानि लक्ष्मीं सम्पूज्य यः पठेत |
स्थिरा लक्ष्मीर्भवेत तस्य पुत्रदारादिभिः सह ||
यदि इस स्तोत्र का पाठ नहीं किया जा सके तो निम्नांकित बारह नामों का जप किया जा सकता है -
लक्ष्मी के बारह नाम - 
ईश्वरी, कमला, लक्ष्मी, चला, भूति, हरिप्रिया, पद्मा, पद्मालया, संपत्ति, रमा, श्री, पद्मधारिणी
पद्मा, पद्मालया, सम्पद, रमा, श्री, पद्मधारिणी