Saturday, 5 August 2023

(6.3.7) सप्तश्लोकी दुर्गा - मनोकामना पूर्ति हेतु Saptshloki Durga with Hindi Translation

 सप्तश्लोकी दुर्गा - मनोकामना पूर्ति हेतु Saptshloki Durga with Hindi Translation

सप्तश्लोकी दुर्गा

सप्त श्लोकी दुर्गा में सात श्लोक हैं ,  जिनमें  दिव्य शक्तियों से युक्त देवी दुर्गा की प्रार्थना है।  जब कोई व्यक्ति विश्वास , निष्ठा और एकाग्रता के साथ इन श्लोकों  का पाठ करता है तो उस उपासक को देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है। उसे अपने शुभ उद्देश्य में सफलता मिलती है।देवी कृपा से उसे धन सम्पदा मिलती है। उसका पारिवारिक जीवन सुख शांति मय रहता है। उसे बिमारियों और दुविधाओं से छुटकारा मिलता है तथा जीवन प्रसन्नता  पूर्वक व्यतीत होता है।

श्लोक पठन प्रक्रिया :-

प्रात: काल स्नान आदि से निवृत्त हो कर किसी शांत स्थान पर ऊनी आसन पर बैठ जायें।देवी दुर्गा का चित्र अपने सामने रखें। आँखें  बंद करके देवी का ध्यान करें व भावना करें कि वह  दिव्य शक्तियों  से युक्त है और अपने भक्तों की सद इच्छा की पूर्ति करती है और उनके कष्टों को दूर करती है। मैं ऐसी शक्ति संपन्न  देवी दुर्गा से प्रार्थना करता हूँ कि  वे मुझे प्रसन्नता , बुद्धि ,शांति , स्वास्थ्य  व सम्पन्नता प्रदान करें। इस ध्यान व प्रार्थना के बाद निम्नांकित श्लोकों का तीन माह तक ग्यारह या सात या पाँच बार निष्ठा पूर्वक पाठ करें। ( चारों नवरात्रियों में भी इन का पाठ किया जा सकता है।)

1. ॐ ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा।

बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।।

2. दुर्गे स्मृता हरसि भीति मशेषजन्तो: ,

स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।

दारिद्र्य दुःख भय हारिणि का त्वदन्या ,

सर्वोपकार करणाय सदार्द्र चित्ता।।

3.सर्व मंगल मंगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।

शरण्ये त्र्यम्बके गौरि  नारायणि नमोSस्तु ते ।।

4. शरणागत दीनार्त परित्राण परायणे।

सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोSस्तु ते।।

5.सर्व स्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते ।

भयेभ्य स्त्राहि नो  देवि दुर्गे देवि नमोSस्तु ते।।

6.रोगानशेषानपहंसि तुष्टा ,

रुष्टा तु कामान सकलानभीष्टान ।

त्वामा श्रितानां न विपन्नराणां

त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।

7.सर्वाबाधा प्रशमनं त्रैलोक्य स्याखिलेश्वरि ।

एवमेव त्वया कार्य मस्म द्वैरिविनाशनं।।

II इति श्री सप्त श्लोकी दुर्गा II 

सप्तश्लोकी दुर्गा (हिन्दी में)

ॐ इस दुर्गासप्तश्लोकी स्तोत्र मन्त्र के नारायण ऋषि हैं, अनुष्टुप छन्द है, श्रीमहाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती देवता हैं, श्री दुर्गा की प्रसन्नता के लिये सत्पश्लोकी दुर्गापाठ में इसका विनियोग किया जाता है.

वे भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के भी चित्त को बल पूर्वक खींचकर मोह में डाल देती हैं. (1)

माँ दुर्गे, आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरुषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं. दुःख, दरिद्रता और भय हरने वाली देवि, आप के सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सब का उपकार करने के लिए सदा ही दयार्द्र रहता हो. (2)

नारायणी, तुम सब प्रकार का मंगल प्रदान करने वाली मंगलमयी हो. कल्याण दायिनी शिवा हो. सब पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, तीन नेत्रों वाली एवं गौरी हो. तुम्हे नमस्कार है. (3)

शरण मे आये हुए दीनों एवं पीड़ितों की रक्षा में संलग्न रहने वाली तथा सबकी पीड़ा दूर करने वाली नारायणी देवि, तुम्हें नमस्कार है. (4)

सर्व स्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि, सब भयों से हमारी रक्षा करों; तुम्हें नमस्कार है. (5)

देवि, तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवांछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो. जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं. तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देने वाले हो जाते हैं. (6)

सर्वेश्वरि, तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो. (7)

|| श्री सप्तश्लोकी दुर्गा सम्पूर्ण || 

पाठ के बाद शांत बैठकर भावना करें कि देवी दुर्गा ने आप की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है और वे आप को आशीर्वाद प्रदान कर रही हैं। आप देवी कृपा से जीवन में नये उत्साह से भरते जा रहे है और सफल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इसके बाद पूजा के स्थान को छोड़कर अपने दैनिक कार्य में लग जाएँ।  

 

(8.5.11) अधिक मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी व्रत की कथा तथा व्रत का महत्व Parama Ekadashi Vrat Ki Katha Va Mahatva

 परमा एकादशी व्रत, व्रत की कथा तथा व्रत का महत्व Parama Ekadashi Vrat Ki Katha Va Mahatva

अधिक मास के कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी व्रत की कथा तथा व्रत का महत्व 

जब अर्जुन ने भगवान श्रीकृष्ण से अधिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी के विषय में पूछा तो भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा - हे अर्जुनअधिक मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी बहुत ही शुभ और उत्तम फल देने वाली है । इस एकादशी को परमा एकादशी कहा जाता है। आगे भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को परमा एकादशी के व्रत का महत्व बताया और व्रत की कथा सुनाई ।

परमा एकादशी व्रत की कथा इस प्रकार है -

अति प्राचीन काल की बात है एक बहुत ही सुंदर काम्पिल्य नाम का नगर था । उस नगर में बहुत ही धर्मात्मा और ईश्वर भक्त ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ रहता था। उस ब्राह्मण का नाम था सुमेधा। सुमेधा की पत्नी भी एक सेवाभावी और पतिव्रता स्त्री थी । सुमेधा की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी परंतु फिर भी वह अपने घर आए किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं जाने देता था ।वह अपने घर आए अतिथि का भी यथा संभव आदर सत्कार करता था। 

अपनी गरीबी को दूर करने की इच्छा से एक दिन सुमेधा ने अपनी पत्नी से कहा कि वह धन कमाने के लिए परदेश जाना चाहता है, जिससे वह अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर सके। तब उसकी पत्नी ने उसे समझाते हुए कहा कि मनुष्य को समय से पहले और अपने भाग्य से अधिक कभी भी कुछ भी नहीं मिलता है। आप चाहे कहीं भी चले जाएं परंतु हमें हमारे भाग्य से अधिक प्राप्त नहीं हो सकता है। यह निर्धनता हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का परिणाम है। आप यहीं रहें और अपना कर्म करते रहें । प्रभु की कृपा से सब अच्छा होगा ।

सुमेधा अपनी पत्नी की इतनी ज्ञान पूर्ण बातें सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और उसने परदेश जाने का अपना निर्णय बदल दिया ।सौभाग्य वश एक दिन उनके घर पर कौण्डिन्य नामक ऋषि का आगमन हुआ । कौण्डिन्य ऋषि को अपने घर पर आया देखकर उन्हें बहुत प्रसन्नता हुई। उन्होंने उनका खूब आदर सत्कार किया ।

उनके आदर सत्कार और सेवा भाव से कौण्डिन्य ऋषि बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने उनसे कुछ मांगने के लिए कहा तो , उस ब्राह्मण दंपति ने ऋषि से अपनी निर्धनता को दूर करने का उपाय पूछा । तो इस पर कौण्डिन्य ऋषि ने उनसे अधिक मास की कृष्ण पक्ष की परमा एकादशी का व्रत करने के लिए कहा और फिर उन्होनें व्रत की विधि बताते हुए कहा कि आप पति पत्नी दोनों परमा एकादशी के व्रत को करो। एकादशी के दिन प्रातः काल स्नानादि नित्य क्रिया से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की मूर्ति के सामने बैठकर जल और पुष्प हाथ में लेकर व्रत का संकल्प करो। इसके बाद विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करो। ब्राह्मण को भोजन कराओ और उसे यथासंभव दक्षिणा देकर संतुष्ट करो। उसके बाद स्वयं फलाहार करो। रात्रि में भजन कीर्तन करते हुए समय व्यतीत करो ।

कौण्डिन्य ऋषि ने परमा एकादशी का महत्व बताते हुए कहा कि इस एकादशी का व्रत करने से जातक को धन ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। उसके सभी पापों का नाश हो जाता है और जातक इस लोक में सभी सुखों को भोग कर अंतकाल में वैकुंठधाम को प्राप्त करता है। 

इस व्रत का पालन करने से ही भगवान की कृपा से कुबेर धनाध्यक्ष हुए थे। 

कौण्डिन्य  ऋषि की बात सुनकर सुमेधा और उसकी पत्नी बहुत आशान्वित हो गए और परमा एकादशी आने पर सुमेधा ने अपनी पत्नी के साथ इस एकादशी का व्रत रखा और पूरे विधि विधान के साथ उसका पालन किया। इस व्रत के प्रभाव से उनके जीवन के सभी कष्टों का नाश हो गया। उनकी दरिद्रता दूर हो गई और उनके पास धन-धान्य की कोई कमी नहीं रही। वे दोनों समस्त सांसारिक सुखों को भोग कर अंतकाल में वैकुंठधाम को चले गए ।

 भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा - हे अर्जुन , जो भी मनुष्य परमा एकादशी के व्रत का पालन विधि विधान से करेगा उसका अवश्य ही कल्याण होगा।

Friday, 4 August 2023

(8.9.4) नवरात्र / नवरात्रि में घट स्थापना कब, कहाँ और कैसे की जाती है Ghat Sthapana in Navratri

नवरात्र / नवरात्रि में घट स्थापना कब, कहाँ और कैसे की जाती है Ghat Sthapana in Navratri

नवरात्र में घट स्थापना 

घट स्थापना कब की जाये - 

घट स्थापना या कलश स्थापना नवरात्र के प्रथम दिन की जाती है। घट स्थापना का समय प्रातः काल ही श्रेठ रहता है। परन्तु उस दिन चित्रा नक्षत्र या वैधृति योग रात्रि तक रहे तो या तो वैधृति योग के तीन अंश त्याग कर घट स्थापना करें या मध्यान्ह के समय अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना करें।

घट स्थापना कहाँ करें -

अपने घर के ईशान कोण ( उत्तर-पूर्व के बीच के कौने ) में करना सबसे श्रेष्ठ है। यदि ऐसा स्थान अपने घर या आवास में नहीं हो तो घट स्थापना ऐसे स्थान पर की जाये ताकि देवी का पूजन करते समय व्यक्ति का मुँह पूर्व की तरफ रहे।

घट स्थापना / कलश स्थापना कैसे करें -

जब कलश स्थापना के स्थान का निश्चय हो जाए तब नवरात्रि के प्रथम दिन उस स्थान को साफ़ करें। नदी या झील की रेत या मिट्टी अथवा स्वच्छ स्थान की मिट्टी में जल मिलाकर वेदी का निर्माण करें। वेदी के ऊपर मिटटी या ताम्बे के कलश को गंगा जल या साफ़ जल से भरकर स्थापित कर दें। कलश के मुँह पर ढक्कन लगा दें और उस ढक्कन पर चाँवल रख दें फिर इसके ऊपर श्री फल (नारियल) को लाल वस्त्र में लपेटकर अशोक के पत्तों सहित रख दें। कलश पर स्वस्तिक  का चिन्ह बनाएं ,अक्षत व पुष्प अर्पित करें। वेदी पर कलश के चारों तरफ की मिट्टी को थोड़ा पानी डालकर गीला कर दें और उस गीली मिट्टी में जौ के दाने बो दें। नौ दिन में ये जौ  के दाने चार या पांच इंच के पौधे  का रूप ले लेते हैं। इन पौधों को जवारा  कहा जाता है, जिनको नवरात्रि समाप्ति के दिन परिवार के लोगों तथा भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है। कलश को यथा विधि स्थापित करके गणेश आदि का पूजन किया जाता है।

मूर्ति / तस्वीर स्थापना -

माँ भगवती तथा श्री राम एवं श्री हनुमान जी की मूर्ति अथवा तस्वीर को घट  के पास चौकी पर लाल वस्त्र या आसन बिछाकर उसके ऊपर स्थापित करें। तस्वीर को चन्दन, रोली का तिलक लगाकर अक्षत चढ़ाएं ,धूप ,दीप प्रज्वलित करे। 

 

 

  

(5.2.3) नव संवत्सर / हिन्दू नव वर्ष Nav Samwatsar/Hindu New Year

 नव संवत्सर / हिन्दू नव वर्ष Nav Samwatsar/Hindu New Year

नव संवत्सर / हिन्दू नव वर्ष

स्मृतिसार तथा श्रुति के अनुसार संवत्सर उसे कहते हैं जिसमें मासादि भलीभाँति  निवास  करते हैं।  इसका दूसरा अर्थ है बारह माह का काल विशेष अर्थात एक वर्ष का समय संवत्सर कहलाता है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार चैत्र माह की शुक्ल प्रतिपदा से शुरू होने वाला वर्ष नव संवत्सर या हिन्दू नव वर्ष के नाम से जाना जाता है।  नव संवत्सर के बारे में मुख्य - मुख्य बातें इस प्रकार हैं -

(1)हिन्दू नव वर्ष (नव संवत्सर )चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है।

(2)प्रत्येक संवत्सर का अपना नाम होता है साथ ही उस संवत्सर का राजा,मंत्री, सस्येश (खरीफ की फसल का स्वामी), मेघेश (वर्षा का स्वामी), फलेश (फलों का स्वामी)  आदि दस अधिकारी होते हैं। उस वर्ष का फल अर्थात वर्षा, अन्न उत्पादन, फल उत्पादन आदि इन दस अधिकारियों की नैसर्गिक प्रकृति के अनुसार ही रहता है।

(3 )श्री ब्रह्म पुराण के अनुसार ब्रह्मा जी ने   चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को प्रवरा अर्थात सर्वोत्तम तिथि मानकर इसी दिन से सृष्टि की रचना का कार्य प्रारम्भ किया था।  इसलिए इस दिन को सृजन और उत्साह का दिवस भी माना  जाता है।

(4) इसी दिन राजा विक्रमादित्य ने विक्रम संवत प्रारम्भ किया था।

(5)शक्ति संचय का पर्व बसंत नवरात्र भी इसी दिन प्रारम्भ होता है। 

(6 ) महाराष्ट्र में इसी दिन गुड़ी पड़वा का उत्सव मनाया जाता  है।

(7 ) आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक राज्यों में  इस दिन को उगादि  पर्व  के रूप में मनाया जाता है। 

(8 )चैत्र शुक्ल प्रतिपदा प्रवरा तिथि होने इसे स्वयं सिद्ध मुहूर्त के रूप में भी माना जाता है।  अर्थात किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए इस दिन को शुभ माना जाता है।  इस दिन पंचांग शुद्धि देखने की आवश्यकता नहीं है।  

(9)महर्षि गौतम की जयन्ती भी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को मनायी जाती है .

इस प्रकार नवसंवत्सर – हिन्दू नव वर्ष कई महत्वपूर्ण विषयों और घटनाओं का दिवस है .

इस मांगलिक अवसर पर परिचितों, मित्रों, रिश्तेदारों आदि को शुभ कामनाएं दें . 

 

Thursday, 3 August 2023

(6.3.6) नवरात्र /नवरात्रि (शक्ति संचय का पर्व) Importance of Navratra / Navratri

नवरात्र /नवरात्रि (शक्ति संचय का पर्व) Importance of Navratra / Navratri

नवरात्र / नवरात्रि

 नवरात्र में प्रयुक्त  'नवशब्द 'नौ' का और ' रात्र शब्द 'रात्रि' का प्रतीक है। नवरात्र का अर्थ नव अहो रात्र के रूप में भी उल्लिखित है। इस प्रकार जो पर्व नौ दिन और नौ रात तक चले वही नवरात्र है।इसे शक्ति संचय और उपासना -आराधना का पर्व भी माना जाता है। ये नौ दिन देवी पार्वती , लक्ष्मी और सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं। जिन्हें नव दुर्गा के नाम से जाना जाता है। पहले तीन दिन पार्वती  के तीन स्वरूपों की, अगले तीन दिन लक्ष्मी के तीन स्वरूपों की और आखिर के तीन दिन सरस्वती के तीन स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन नौ रूपों के नाम हैं :-1 शैल पुत्री 2. ब्रह्म चारिणी 3. चंद्रघंटा 4. कूष्मांडा 5. स्कंदमाता 6. कात्यायनी 7. काल रात्रि 8. महा गौरी 9. सिद्धि दात्री।

वर्ष में चार बार नवरात्र पर्व मनाये जाते हैं 

1. बसंत नवरात्रि  या राम नवरात्रि या चैत्र नवरात्रि ( चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक )

2. शारदीय नवरात्र ( आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक ) 

3. माघ नवरात्र ( माघ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक ) 

4. आषाढ़ नवरात्र (आषाढ़ शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक )

चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों को प्रकट नवरात्र कहा जाता है और माघ तथा आषाढ़  माह के नवरात्रों को गुप्त नवरात्रा कहा जाता है।

पूजा विधि एवं घट स्थापना या कलश स्थापना :-

नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में घट स्थापना या कलश स्थापना का विधान है। घट स्थापना के लिए मिट्टी  या तांबे के कलश में शुद्ध जल भरें। कलश के मुंह पर नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर अशोक के पत्तों सहित रखें। कलश के नीचे बालू मिट्टी की वेदी बनायें व इसमें जौ के दाने व पानी डाल दें। इस वेदी पर कलश रखदें । कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें । वेदी की रेत में जौ बोने  के बजाय अलग से किसी पात्र में भी मिट्टी डाल कर जौ बोये जाते हैं, जिन्हें जुवारे कहते हैं। घट स्थापना या कलश स्थापना मूल रूप से देवी दुर्गा का आव्हान है।

मूर्ति या तस्वीर स्थापना -

घट या कलश के पास एक पाटे पर लाल वस्त्र बिछा कर माँ भगवती की तस्वीर भगवान राम , हनुमान जी या अपने ईष्ट देव की तस्वीर रखें।

आसन - देवी उपासक लाल या सफेद रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें। पूर्व की तरफ मुँह करके पूजा , मंत्र , हवन एवं अनुष्ठान समाप्त  करें।

नवरात्र के दौरान पाठ- जप आदि :-

साधक अपनी इच्छानुसार दुर्गासप्तशती का पाठ या दुर्गा के किसी मन्त्र का जप करे।

(या ) सुन्दर काण्ड का पाठ

 (या ) राम रक्षा स्त्रोत का पाठ

(या) गायत्री मन्त्र जप

(या ) रामचरित मानस पाठ

 (या)किसी भी देवी - देवता के मन्त्र का जप करे।

 पाठ या मन्त्र जाप  का  फल - नवरात्रि  का समय वर्ष के श्रेष्ट समय में से एक है अत: इस अवधि में किये गए जप - तप , व्रतउपवास का फल तुलनात्मक रूप से ज्यादा मिलता है।जप - तप  या पाठ निष्काम भाव से किया जाये या सकाम  भाव से, सभी का सुफल मिलता है, सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। यदि  किसी विशेष उद्देश्य के लिए जप या पाठ किया जाता है तो उस उद्देश्य की अवश्य पूर्ति होती है।

कुमारी पूजन - अपनी कुल परम्परा के अनुसार अष्टमी या नवमी के दिन दो वर्ष से नौ वर्ष तक की उम्र की नौ कन्याओं को अपने घर बुलाकर उनकी पूजा करेंउन्हें भोजन करायें व यथा शक्ति दक्षिणा दें।

हवन -

नवरात्रि  के दौरान जितने मन्त्रों का जप किया जाता है उसके दसवें भाग का हवन दसमी के दिन या नवमी के दिन किया जाता है।(यदि हवन नहीं किया जा सके तो कुल जपे हुये मन्त्रों की संख्या के दसवें भाग का जप और करें।)

नवरात्र उत्थापन -

नवरात्र के नवें या दसवें दिन बोये हुए जवारे उग कर बड़े हो जाते हैं , उन्हें प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। घट के जल का आचमन कर उसे अपने शरीर पर स्पर्श कराया जाता है तथा कुछ जल को अपने घर में भी छिड़का जाता है। फिर विधि विधान पूर्वक पूजा करके समस्त पूजा सामग्री को जलाशय में विसर्जित किया जाता है।     

 

  

(6.3.5) ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे Navaarn Mantra / om aing hreem kleemchaamundaaye vichche

ॐ ऐं  ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे Navaarn Mantra / om aing hreem kleemchaamundaaye vichche

दुर्गा मंत्र (सम्पन्नता ,शांति ,आनन्द और बुद्धि हेतु )


देवी दुर्गा हिन्दू धर्म के अनुसार लोक प्रिय देवी है।उसे दिव्य माता के रूप में जाना जाता है जो कि करुणा ,शक्ति ,नैतिकता और संरक्षण का प्रतीक मानी जाती है।वह उसके भक्तो को बुरी शक्तियों से बचाकर उनकी रक्षा करती है।देवी दुर्गा को देवी लक्ष्मी ,सरस्वती और काली का मिश्रित रूप  माना जाता है। इसलिए इन तीनों देवियों  की शक्तियां देवी दुर्गा में समाहित हैं। जिस से वह  अपने भक्तों  को सम्पन्नता ,शांति ,प्रसन्नता ,बुद्धि और स्वास्थ प्रदान  करने में सक्षम है।

मंत्र जप प्रक्रिया :-

सुबह स्नान करके ऊनी  आसन पर पूर्व या  उत्तर में मुख करके किसी शांत स्थान पर बैठ जाएँ।देवी दुर्गा का चित्र अपने सामने रख लें।अपनी आखें बंद करके देवी दुर्गा का  ध्यान करें ।भावना करें कि देवी दुर्गा जगत की माता है जो अपने भक्तों की इच्छा पूर्ति करती है।कष्टों से मुक्त करके उन्हें प्रसन्नता,सम्पन्नता,शक्ति व बुद्धि देती है।ऐसी देवी दुर्गा को मैं प्रणाम करता हूँ  और प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझे प्रसन्नता,सम्पन्नता,शक्ति व बुद्धि  का आशीर्वाद प्रदान करें।

ऐसी भावना व प्रार्थना के बाद देवी के इस मंत्र का पाँच, सात या ग्यारह माला का जप करें. 

मन्त्र इस प्रकार है -

 

 ॐ ऐं  ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।

जब मंत्र जप समाप्त हो जाये तो तुरन्त उस स्थान को नहीं छोड़ें।थोड़ी देर शांत बैठे और आखें बंद करके देवी के असीम स्नेह पर मनन करें।मन में भावना करें कि देवी दुर्गा ने आपकी प्रार्थना को स्वीकार कर लिया है।वे आप पर आशीर्वाद की वर्षा कर रहीं हैं।पूरा विश्वास करें कि देवी की कृपा से आपको प्रसन्नता,सम्पन्नता ,शांति और बुद्धि की प्राप्ति हो रही है।आपकी मनोकामना पूरी हो रही है।फिर पूजा का स्थान छोड़ दें। 

Wednesday, 2 August 2023

(6.3.4) दुर्गा मंत्र (सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति हेतु ) Durga Mantra For Getting a Good Wife

दुर्गा मंत्र (सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति हेतु ) Durga Mantra For Getting a Good Wife

 देवी दुर्गा हिन्दू धर्म के अनुसार बहुत लोकप्रिय देवी है जिसे दिव्य माता के रूप में जाना जाता है. उसे करुणा, शक्ति, नैतिकता, बुद्धि और संरक्षण का प्रतीक माना जाता है. वह अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है. देवी दुर्गा से सम्बंधित कई प्रार्थना मंत्र हैं. उनमें से एक मंत्र सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति हेतु भी है. यदि कोई व्यक्ति पूरी निष्ठा और विश्वास के साथ इस मंत्र का जप करे तो, देवी दुर्गा की कृपा से उसकी मनोकामना पूर्ण होती है. मंत्र जप की विधि इस प्रकार है –

प्रतिदिन प्रातःकाल देवी दुर्गा का चित्र अपने सामने रख लें. उत्तर या पूर्व की तरफ मुँह करके बैठें और मन ही मन दुर्गा का ध्यान करें तथा सोचें कि देवी दुर्गा माँ स्वरूप है, शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है. वह अपने भक्तों की प्रार्थना सुनती है तथा उनकी मनोकामना पूर्ण करती है. ऐसी दिव्य माता को मैं बार बार प्रणाम करता हूँ. इसके बाद इस मंत्र का 108 बार या अधिक बार जप करें. मंत्र इस प्रकार है -   

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्

तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्

मंत्र जप के बाद पाँच मिनट तक कल्पना करें कि देवी दुर्गा आपको सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति की इच्छा पूरी होने का आशीर्वाद दे रही है. देवी में पूर्ण आस्था व विश्वास एवं मंत्र का अधिक से अधिक संख्या में जप लाभकारी होगा.

 

 


(6.3.3) दुर्गा मंत्र (परिवार में सुख - शान्ति हेतु) Durga Mantra for Happiness in Family

 दुर्गा मंत्र (परिवार में सुख - शान्ति हेतु) Durga Mantra for Happiness in Family

या देवी सर्वभूतेषु शान्ति रूपेण संस्थिता . नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः 

 देवी दुर्गा शक्ति स्वरूपा भी है और माँ स्वरूपा भी है . शक्ति स्वरुप में वह दुष्टों का विनाश करती है और माँ स्वरुप में वह अपने भक्तों के अज्ञानता रूपी अंधकार को दूर करके उन्हें कल्याणकारी मार्ग दिखाती है .

कभी – कभी किसी परिवार में किसी कारणवश तनावपूर्ण वातावरण बन जाता है, छोटी छोटी बातें विवाद का रूप ले लेती हैं जिससे पारिवारिक सुख –शान्ति पर विपरीत प्रभाव पड़ता है . परिवार में कलह निवृत्ति व सुख शान्ति स्थापना हेतु देवी दुर्गा के इस प्रार्थना मंत्र का निष्ठा व विश्वास के साथ प्रतिदिन 108 या ज्यादा बार जप करना चाहिए . मंत्र इस प्रकार है –

या देवी सर्वभूतेषु शान्ति रूपेण संस्थिता , नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः 

 

 

 

Tuesday, 1 August 2023

(6.2.14) संतान गणपति स्तोत्र / Santan Ganpati Stotra

 संतान गणपति स्तोत्र / Santan Ganpati Stotra

संतान गणपति स्तोत्र (पुत्र प्राप्ति के लिए)

नमोSस्तु गणनाथाय सिद्धिबुद्धियुताय च

सर्वप्रदाय देवाय पुत्रवृद्धिप्रदाय च

गुरूदराय गुरवे गोप्त्रे गुह्यासिताय ते

गोप्याय गोपिताशेषभुवनाय चिदात्मने

विश्वमूलाय भव्याय विश्वसृष्टिकराय ते

नमो नमस्ते सत्याय सत्य पूर्णाय शुन्डिने

एकदन्ताय शुद्धाय सुमुखाय नमो नमः

प्रपन्नजनपालाय प्रणतार्तिविनाशिने

शरणं भव देवेश संततिं सुदृढाम् कुरु

भविष्यन्ति च ये पुत्रा मत्कुले गणनायक

ते सर्वे तव पूजार्थे निरताः स्युर्वरो मतः

पुत्रप्रदमिदं स्तोत्रं सर्व सिद्धि प्रदायकम्

अर्थ –

सिद्धि – बुद्धि सहित उन गणनाथ को नमस्कार है, जो पुत्र वृद्धि प्रदान करने वाले तथा सब कुछ देने वाले देवता हैं. जो भारी पेट वाले (लम्बोदर), गुरू (ज्ञानदाता), गोप्ता (रक्षक), गुह्य (गूढ़स्वरुप) तथा सब ओर से गौर हैं, जिनका स्वरुप और तत्व गोपनीय है तथा जो समस्त भुवनों के रक्षक हैं, उन चिदात्मा आप गणपति को नमस्कार है. जो विश्व के मूल कारण, कल्याण स्वरुप, संसार की सृष्टि करने वाले, सत्यरूप, सत्यपूर्ण और शुण्डधारी हैं, उन आप गणेश्वर को बारम्बार नमस्कार है.

जिनके एक दांत और सुन्दर मुख है, जो शरणागत भक्तजनों के रक्षक तथा प्रणतजनों की पीड़ा का नाश करने वाले हैं, उन शुद्धस्वरुप आप गणपति को बारम्बार नमस्कार है. देवेश्वर, आप मेरे लिए शरणदाता हों. मेरी संतान परम्परा को सुदृढ़ करें. गणनायक, मेरे कुल में जो पुत्र हों, वे सब आपकी पूजा के लिए सदा तत्पर हों, यह वर प्राप्त करना मुझे इष्ट है. यह पुत्र दायक स्तोत्र समस्त सिद्धियों को देने वाला है.