Monday, 26 September 2016

(7.1.5) Guru / Shukra Ka Ast Hona/ Tara Doobana / तारा डूबना

Tara Doobana/गुरु शुक्र का अस्त होना / तारा  डूबना / Guru / Shukra Kaa Ast Hona

गुरु तथा शुक्र कब अस्त होते हैं ? तारा डूबना किसे कहा जाता है ? (For English translation click here)
जब कोई ग्रह किसी निश्चित सीमा तक सूर्य के नजदीक आ जाये तो इस स्थिति को उस ग्रह का अस्त होना कहा जाता है।सूर्य के नजदीक की सीमा को डिग्री में नापा जाता है जो भिन्न ग्रह के लिए भिन्न होती है।जब कोई ग्रह अस्त होता है तो उसकी शक्ति और चमक क्षीण हो जाती है जिस से वह ग्रह अपना पूर्ण फल नहीं दे पाता है।
गुरु या शुक्र के अस्त होने पर किन कार्यों  निषेध है ?    
वैदिक ज्योतिष के अनुसार गुरु (बृहस्पति ) तथा शुक्र को शुभ ग्रह  माना जाता है इस लिए इन के अस्त होने के दौरान शुभ कार्य करना निषेध  है।इन के अस्त होने पर तथा इन के बाल - वृद्धत्व( जो  सामान्यतया इन के अस्त होने के तीन दिन पहले तथा उदय होने के तीन दिन बाद तक माना जाता है) की  सम्पूर्ण अवधि में निम्नांकित कार्य नहीं किये जाते हैं - 
कुये या तालाब का खोदना,घर का निर्माण करना,गृह प्रवेश करना,विवाह,सगाई ,नया व्यापार शुरू करना,नया वाहन खरीदना ,मुंडन या किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत करना। 
निम्नांकित कार्य किये जा सकते हैं -
 सीमांत , जातकर्म , नामकरण , अन्नप्राशन आदि में  मलमास तथा गुरु शुक्र के अस्त का दोष नहीं है। अर्थात जिन कार्यों के लिये नाम या दिन नियत कर दिये हैं , जैसे नामकरण ग्यारहवें दिन, न्हावण भी दसवें या ग्यारहवें या तेरहवें दिन कर ही लेना चाहिये। ये गुरु या शुक्र के अस्त कर सकते हैं। (परन्तु जलपूजा (जलवा ) नहीं करें।) 

(8.1.5) Vijaya Dashami / Dashahara Parv विजय दशमी /दशहरा पर्व

Vijaya Dashami / Dashera विजया दशमी/ दशहरा --(आस्था,विश्वास और विजय का पर्व) 

1. विजया दशमी का त्यौहार वर्षा ऋतु  की समाप्ति और शरद ऋतु के आगमन का सूचक है।  आश्विन शुक्ल दशमी के दिन सम्पूर्ण भारत में दशहरे का पर्व धूम धाम से मनाया जाता है।
2. इस दिन क्षत्रिय शस्त्रों की , ब्राह्मण शास्त्रों की तथा वैश्य बही की पूजा करते हैं।
3. दुर्गा प्रतिमा विसर्जन , अपराजिता पूजन , शमी पूजन आदि इस पर्व के मुख्य कर्म हैं।  इस दिन नीलकंठ पक्षी का दर्शन शुभ माना जाता है। 
4. इस दिन तारा  उदय होने के समय ' विजय ' नामक वेला होती है।  इस वेला को सर्वकार्य सिद्धि दायक माना जाता है।
5. इस दिन भगवान राम ने लंका के राजा रावण को मारकर विजय प्राप्त की थी इस लिए इस पर्व को विजया दशमी कहा गया है।  रावण  बुराई  का तथा राम अच्छाई का प्रतीक माने जाते हैं। अत: इसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में भी मनाया जाता है।
6. उत्तर भारत के अधिकांश स्थानों पर रावण , कुम्भकरण व मेघनाथ के पुतले जलाये जाते हैं।
7. बंगाल प्रान्त में दशहरा दुर्गा पूजा, त्यौहार का मुख्य भाग है।  इस दिन दुर्गा प्रतिमाओं को नदी , तालाब , सरोवर आदि में विसर्जित किया जाता है।  अत: यह विसर्जन पर्व भी कहलाता है।
8. हिन्दू मूहुर्तों के अनुसार दशहरा / विजया दशमी साढ़े तीन स्वयं सिद्ध मुहूर्तों में से एक है।  अत: किसी भी शुभ कार्य को शुरू करने के लिए इसे शुभ माना जाता है।  

(8.9.1) Navratra / Naratri (in Hindi) नवरात्र / नवरात्रा / नवरात्रि

Navratr / Navraatraa / Navraatri  (festival) नवरात्र / नवरात्रा / नवरात्रि ( शक्ति संचय और आराधना का पर्व )

 नवरात्र में प्रयुक्त  'नव' शब्द 'नौ' का और ' रात्र ' शब्द 'रात्रि' का प्रतीक है। नवरात्र का अर्थ नव अहो रात्र के रूप में भी उल्लिखित है। इस प्रकार जो पर्व नौ दिन और नौ रात तक चले वही नवरात्र है।इसे शक्ति संचय और उपासना -आराधना का पर्व भी माना जाता है। ये नौ दिन देवी पार्वती , लक्ष्मी और सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं। जिन्हें नव दुर्गा के नाम से जाना जाता है। पहले तीन दिन पार्वती  के तीन स्वरूपों की, अगले तीन दिन लक्ष्मी के तीन स्वरूपों के और आखिर के तीन दिन सरस्वती के तीन स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन नौ रूपों के नाम हैं :-1 शैल पुत्री 2. ब्रह्म चारिणी 3. चंद्रघंटा 4. कूष्मांडा 5. स्कंदमाता 6. कात्यायनी 7. काल रात्रि 8. महा गौरी 9. सिद्धि दात्री।
वर्ष में चार बार नवरात्र पर्व मनाये जाते हैं 
चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों को प्रकट नवरात्र कहा जाता है और माघ तथा आषाढ़  माह के नवरात्रों को गुप्त नवरात्रा कहा जाता है।
पूजा विधि एवं घट स्थापना या कलश स्थापना :-
नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में घट स्थापना या कलश स्थापना का विधान है। घट स्थापना के लिए मिट्टी  या तांबे के कलश में शुद्ध जल भरें। कलश के मुंह पर नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर अशोक के पत्तों सहित रखें। कलश के नीचे बालू मिट्टी की वेदी बनायें व इसमें जौ के दाने व पानी डाल दें। इस वेदी पर कलश रखदें । कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें । वेदी की रेत में जौ बोने  के बजाय अलग से किसी पात्र में भी मिट्टी डाल कर जौ बोये जाते हैं, जिन्हें जुवारे कहते हैं। घट स्थापना या कलश स्थापना मूल रूप से देवी दुर्गा का आव्हान है।
मूर्ति या तस्वीर स्थापना -
घट या कलश के पास एक पाटे पर लाल वस्त्र बिछा कर माँ भगवती की तस्वीर भगवान राम , हनुमान जी या अपने ईष्ट देव की तस्वीर रखें।
आसन - देवी उपासक लाल या सफेद रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें। पूर्व की तरफ मुँह करके पूजा , मंत्र , हवन एवं अनुष्ठान समाप्त  करें।
नवरात्र के दौरान पाठ- जप आदि :-
साधक अपनी इच्छानुसार दुर्गासप्तशती का पाठ या दुर्गा के किसी मन्त्र का जप करे।
(या ) सुन्दर काण्ड का पाठ
 (या ) राम रक्षा स्त्रोत का पाठ
(या ) रामचरित मानस पाठ
 पाठ या मन्त्र जाप  का  फल - नवरात्रि  का समय वर्ष के श्रेष्ट समय में से एक है अत: इस अवधि में किये गए जप - तप , व्रत, उपवास का फल तुलनात्मक रूप से ज्यादा मिलता है।जप - तप  या पाठ निष्काम भाव से किया जाये या सकाम  भाव से, सभी का सुफल मिलता है, सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। यदि  किसी विशेष उद्देश्य के लिए जप या पाठ किया जाता है तो उस उद्देश्य की अवश्य पूर्ति होती है।
कुमारी पूजन - अपनी कुल परम्परा के अनुसार अष्टमी या नवमी के दिन दो वर्ष से नौ वर्ष तक की उम्र की नौ कन्याओं को अपने घर बुलाकर उनकी पूजा करें, उन्हें भोजन करायें व यथा शक्ति दक्षिणा दें।
हवन -
नवरात्रि  के दौरान जितने मन्त्रों का जप किया जाता है उसके दसवें भाग का हवन दसमी के दिन या नवमी के दिन किया जाता है।(यदि हवन नहीं किया जा सके तो कुल जपे हुये मन्त्रों की संख्या के दसवें भाग का जप और करें।)
नवरात्र उत्थापन -
नवरात्र के नवें या दसवें दिन बोये हुए जवारे उग कर बड़े हो जाते हैं , उन्हें प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। घट के जल का आचमन कर उसे अपने शरीर पर स्पर्श कराया जाता है तथा कुछ जल को अपने घर में भी छिड़का जाता है। फिर विधि विधान पूर्वक पूजा करके समस्त पूजा सामग्री को जलाशय में विसर्जित किया जाता है।     

Sunday, 25 September 2016

(8.5.3) Ekadahi taha unke naam / Names of Ekadashi/ एकादशी के नाम

26 Ekadshi ke naam / एकादशी के नाम /Twenty six Ekadashi and their names

सनातन धर्म के अनुसार एकादशी को पवित्र तिथि मना जाता है।  इस दिन किये गए व्रत का धार्मिक महत्व है।  हिदू पंचांग के अनुसार प्रति माह दो एकादशी आती हैं - एक शुक्ल पक्ष में तथा दूसरी कृष्ण पक्ष में।  इस प्रकार एक वर्ष में चौबीस एकादशी आती हैं।  अधिक मास होने पर उस वर्ष दो अतिरिक्त एकादशी होती हैं।  इस प्रकार छब्बीस एकादशी हो जाती हैं।  प्रत्येक एकादशी का अपना नाम और महत्व होता है।  एकादशी के नाम निम्नानुसार हैं -
1. पापमोचिनी एकादशी - चैत्र कृष्ण पक्ष एकादशी को पापमोचिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
2. कामदा एकादशी - चैत्र शुक्ल पक्ष एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है।
3. वरूथिनी एकादशी - वैशाख कृष्ण पक्ष एकादशी को वरूथिनी  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
4. मोहिनी एकादशी - वैशाख शुक्ल  पक्ष एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
5. अपरा  एकादशी - ज्येष्ठ  कृष्ण पक्ष एकादशी को अपरा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
6. निर्जला  एकादशी - ज्येष्ठ शुक्ल  पक्ष एकादशी को निर्जला  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
7. योगिनी  एकादशी - आषाढ़  कृष्ण पक्ष एकादशी को योगिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है।
8. देवशयनी  एकादशी - आषाढ़ शुक्ल  पक्ष एकादशी को देवशयनी  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
9. कामिका  एकादशी - श्रावण  कृष्ण पक्ष एकादशी को कामिका  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
10. पुत्रदा  एकादशी - श्रावण शुक्ल  पक्ष एकादशी को पुत्रदा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
11. अजा  एकादशी - भाद्रपद  कृष्ण पक्ष एकादशी को अजा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
12. जलझूलनी  एकादशी - भाद्रपद शुक्ल  पक्ष एकादशी को जलझूलनी  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
13. इन्दिरा  एकादशी - आश्विन  कृष्ण पक्ष एकादशी को इन्दिरा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
14. पापाकुंशा  एकादशी - आश्विन शुक्ल  पक्ष एकादशी को पापांकुशा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
15. रमा  एकादशी - कार्तिक  कृष्ण पक्ष एकादशी को रमा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
16. देवउठनी  एकादशी - कार्तिक शुक्ल  पक्ष एकादशी को देवउठनी  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
17. उत्पन्ना  एकादशी - मार्गशीर्ष  कृष्ण पक्ष एकादशी को उत्पन्ना  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
18. मोक्षदा  एकादशी - मार्गशीर्ष शुक्ल  पक्ष एकादशी को मोक्षदा  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
19. सफला  एकादशी - पौष  कृष्ण पक्ष एकादशी को सफला  एकादशी के नाम से जाना जाता है।
20.पौष पुत्रदा  एकादशी - पौष शुक्ल  पक्ष एकादशी को (पौष) पुत्रदा  एकादशी के नाम से जाना जता है।
21. षटतिला  एकादशी - माघ  कृष्ण पक्ष एकादशी को षटतिला एकादशी के नाम से जाना जाता है।
22 .जया एकादशी - माघ  शुक्ल पक्ष  एकादशी को जया  एकादशी के नाम से जाना जता है।
23. विजया  एकादशी - फाल्गुन  कृष्ण पक्ष एकादशी को विजया  एकादशी के नाम से जाना जा  ता है।
24. आमलकी  एकादशी - फाल्गुन शुक्ल  पक्ष एकादशी को पापमोचिनी एकादशी के नाम से जाना जा ता है।
25. परमा  एकादशी - अधिक मास  कृष्ण पक्ष एकादशी को परमा  एकादशी के नाम से जाना जा ता है।
26. पद्मिनी  एकादशी - अधिक मास शुक्ल  पक्ष एकादशी को पद्मिनी  एकादशी के नाम से जाना जा ता है।  

Saturday, 24 September 2016

(8.5.2) Ekadshi Vrat Vidhi (in HindI) एकादशी व्रत विधि

Ekadashi Vrat / Ekadshi Vrat Vidhi /एकादशी व्रत विधि - 

एकादशी व्रत विधि -
सनातन धर्म के अनुसार एकादशी का व्रत आत्म कल्याण का साधन है। गृहस्थ धर्म का पालन करते हुए व्यक्ति इसके द्वारा इहलौकिक और पर लौकिक कल्याण प्राप्त कर सकता है। एकादशी व्रत दशमी , एकादशी तथा द्वादशी इन तीन दिन में संपन्न होता है।  
एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को दशमी तिथि के दिन शाम सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए। रात्रि में भगवान में मन लगाते हुए सोना चाहिए।
एकादशी के दिन जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रद्धा और भक्ति सहित भगवान् का पूजन करें। उत्तम प्रकार के गंध , पुष्प ,धूप ,दीप ,नैवेद्य आदि अर्पण करके  नीराजन करें। स्तोत्र पाठ तथा भगवान के स्मरण में दिन व्यतीत करे तथा निराहार रहे।  यदि निराहार नहीं रह सके तो, फलाहार लिया जा सकता है। रात्रि में कथा वार्ता ,स्तोत्र पाठ अथवा भजन आदि के साथ जागरण करे।
द्वादशी के दिन ब्राह्मण को जिमाकर  उपवास कर्ता  को भोजन करना चाहिए। जो ऐसा नहीं कर सके तो उसे ब्राह्मण भोजन योग्य आटा, घी दाल आदि किसी मंदिर में या किसी सुपर को देना चाहिए।
एकादशी के दो भेद हैं - नित्य और काम्य।  निष्काम भाव से की जाने वाली नित्य और धन, पुत्र आदि की प्राप्ति अथवा रोग दोषादि की निवृत्ति के लिए की जाने वाली एकादशी काम्य होती है।
उद्यापन - जब व्यक्ति अधिक उम्र या व्याधि आदि के कारण एकादशी व्रत को निरंतर नहीं रख सके तो एकादशी व्रत का उद्यापन करके इसकी समाप्ति की जा सकती है।  

(8.5.1) Ekadashi /एकादशी / Importance of Ekadashi (in Hindi )

Importancre of Ekadashi Ekadashi ka Mahatva/ एकादशी / एकादशी का महत्व  

हिन्दू पंचांग के अनुसार एक मास  में दो पक्ष होते हैं -यथा कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष।  प्रत्येक पक्ष में पन्द्र्ह तिथियाँ होती हैं। इस प्रकार एक मास में दो एकादशी होती है और एक वर्ष में 24  एकादशी होती हैं। अधिक मास  हो तो उसमें भी दो एकादशी होती हैं। इस प्रकार अधिक मास की एकादशी सहित 26  एकादशी हो जाती हैं। इन 26 एकादशी के अपने अपने नाम होते हैं।   
एकादशी का महत्व - 
सनातन धर्म में आत्म कल्याण के कई साधन हैं। उनमें से व्रत तथा उपवास भी मुख्य हैं। उपवास शारीरिक तप हैं। गृहस्थ में रहते हुए मानव इनके द्वारा इहलौकिक और परलौकिक कल्याण प्राप्त कर सकता है। एक समय भोजन करना व्रत और दिनभर अन्न का त्याग करना उपवास कहलाता है। एकादशी का व्रत तीन दिन में समाप्त होता है।  एकादशी को हिन्दू संस्कृति के अनुसार एक पवित्र तिथि माना जाता है।  एकादशी व्रत करने से जाने - अनजाने हुए पापों से मुक्ति मिलती है तथा मोक्ष प्राप्त होता है।  एकादशी व्रत सुख और धन देने वाला व्रत है। इस व्रत को करने वाला अगले जन्म में धनी कुल में पैदा होता है। एकादशी व्रत से व्यक्ति की  इन्द्रियां नियंत्रित होती हैं , भक्ति का भाव जागृत होता है और ह्रदय की  पवित्रता बढ़ती है। 
एकादशी व्रत विधि - 
एकादशी का व्रत करने वाले व्यक्ति को दशमी तिथि के दिन शाम सूर्यास्त के बाद भोजन नहीं करना चाहिए।  रात्रि में भगवान में मन लगाते हुए सोना चाहिए।  एकादशी के दिन जल्दी उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर श्रद्धा और भक्ति सहित भगवान् का पूजन करें। उत्तम प्रकार के गंध , पुष्प ,धूप ,दीप ,नैवेद्य आदि अर्पण करके  नीराजन करें। स्तोत्र पाठ तथा भगवान के स्मरण में दिन व्यतीत करे तथा निराहार रहे।  यदि निराहार नहीं रह सके तो, फलाहार लिया जा सकता है। रात्रि में कथा वार्ता ,स्तोत्र पाठ अथवा भजन आदि के साथ जागरण करे। द्वादशी के दिन ब्राह्मण को जिमाकर  उपवास कर्ता  को भोजन करना चाहिए।  

Friday, 23 September 2016

(8.1.4) Kokila Vrat (in Hindi / Kokila Vrat vidhi /कोकिला व्रत

Kokila Vrat / Kokila Vrat Kab Hai ? Kokila Vrat Vidhi / Kokila Vrat ka Mahatva / कोकिला व्रत / कोकिला व्रत विधि / कोकिला व्रत का महत्व 

कोकिला व्रत कब किया जाता है ? 
यह व्रत आषाढ़ माह की पूर्णिमा से प्रारम्भ करके श्रावण माह की पूर्णिमा तक किया जाता है। ( इस वर्ष की दिनांक व दिन जानने के लिए यहां क्लिक करें )
कोकिला व्रत की विधि - 
पीठी के द्वारा निर्मित की हुई कोयल की  प्रतिमा का प्रतिदिन पूजन किया जाता है।श्रावण माह की पूर्णिमा के दिन  मिट्टी की बनाईं हुयी कोयल की प्रतिमा को पुरोहित अथवा कथा वाचक को भेंट करने से व्रत करने वाली स्त्री इस जन्म में प्रीति पूर्वक पोषण करने वाले पति के साथ सुख सौभाग्य आदि भोग कर अन्त में गौरी (पार्वती) की पुरी में जातीं है। (विस्तृत जानकारी हेतु यहाँ क्लिक करें ) 
विशेष  - इस व्रत में गौरी का कोकिला के रुप में पूजां किया जाता है। 
कोकिला व्रत का महत्व - अविवाहित लड़कियों द्वारा इस व्रत को करने से उपयुक्त वर मिलता है और सुखमय वैवाहिक जीवन व्यतीत होता है। विवाहित महिलाओँ द्वारा इस व्रत को करने से सौभाग्य , सुपुत्र तथा वैभव प्राप्त होता है ।  (विस्तृत जानकारी हेतु क्लिक करें) 
कोकिला व्रत कथा - दक्ष प्रजापति की पुत्री सती  का विवाह  भगवान् शिव के साथ हुआ था। बाद में दक्ष प्रजापति द्वारा किये गए यज्ञ के आयोजन में उन्होंने अपने जँवाई भगवान् शिव को निमंत्रित नहीं किया। भगवान् शिव ने सती को वहाँ जाने से मना परंतु सती ने बिना निमन्त्रण के भी अपने पिता द्वारा आयोजित यज्ञ में जाने का निश्चय किया। 
जब सती अपने पिता के घर पहुँची तो किसी ने भी उसका स्वागत नहीं किया।  इस अपमान से दुःखी होकर उसने अपने आप को अग्नि में भस्म कर लिया। भगवान् शिव इस घटना को सुनकर वहाँ पहुँचे।  दक्ष के सिर  को उसकी धड़ से अलग कर दिया।  बिना अनुमति के सती के वहाँ जाने के कारण भगवान् शिव ने उसे दस हजार वर्ष तक कोकिला बनी हुई वन में घूमती रहने का शाप दिया।  दस हजार वर्ष बाद सती  ने पार्वती के रूप में जन्म लिया । 
ऋषियों की सलाह पर उसने यह एक माह का व्रत किया तथा पूजा की। शिव जी ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उससे विवाह किया।  इस लिए इस व्रत का नाम 'कोकिला व्रत' हुआ। 
(कहानी को विस्तृत रूप में पढने के लिए यहाँ क्लिक करें ) 
(For English translation click here) 

Thursday, 22 September 2016

(6.8.1) Dwadash Jyotirling Stotra ( with Hindi Meaning)

Dwadash Jyotirling Stotra / Benefits of reciting Dwadash jyotiling Stotra / द्वादश ज्योतिलिंग स्तोत्र / द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र के पाठ  करने के लाभ 

नीचे द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र दिया गया है जिसमें  बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम तथा वे कहाँ स्थित हैं उन स्थानों का उल्लेख है । जो व्यक्ति प्रातःकाल और सांय काल इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसके पाप नष्ट हो जाते हैं -
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। 
उज्जयिन्यां  महाकालमोंकारममलेश्वरम्।।१।। 

परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरम्। 
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने।।२।।

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमी तटे। 
हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये।।३।। 

एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः। 
सप्तजन्मकृतं  पापं स्मरणेन विनश्यति।।४।। 

अर्थ - सौराष्ट्र प्रदेश में श्रीसोमनाथ , श्रीशैल पर श्रीमल्लिकार्जुन, उज्जैन में श्रीमहाकाल, ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर। परली में वैद्यनाथ, डाकिनी नामक स्थान में श्री भीमशंकर, सेतुबन्ध पर श्री रामेश्वर, दारुकावन में श्री नागेश्वर। वाराणसी में श्री विश्वनाथ, गौतमी (गोदावरी) के तट पर श्री त्र्यम्बकेश्वर, हिमालय पर केदारख़ण्ड में श्रीकेदारनाथ और शिवालय में श्री घुश्मेश्वर को स्मरण करे। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल इन बराह ज्योतिर्लिंगों का नाम लेता है, उसके सात जन्मों का किया हुआ पाप इन लिंगों स्मरण मात्र से मिट जाता है।

(7.2.4) Yagyopaveet Muhurat / Upnayan Sanskaar Muhurat (in Hindi)

Janeo Muhurat / Yagyopaveet Sanskar Muhurat / Muhurat for Yagyopaveet / Upnayan Sanskaar Muhurat / उपनयन संस्कार के लिए मुहूर्त / जनेव के लिए मुहूर्त /

पनयन संस्कार सोलह संस्कारों में से एक है। इसके मुहूर्त हेतु निम्नांकित बातों को ध्यान में रखा जाता है - 
1. उम्र / आयु - शिशु के जन्म से ब्राह्मण को पांचवें या आठवें वर्ष में, क्षत्रिय को छठे या ग्यारहवें वर्ष में, वैश्यों को आठवें या बारहवें वर्ष में उप नयन संस्कार करना चाहिए। यदि इन वर्षों में यह संस्कार नहीं हो सके तो ब्राह्मणों को सोलहवें वर्ष तक , क्षत्रियों को बाइसवें वर्ष तक  तथा वैश्यों को चौबीसवें वर्ष तक उपनयन संस्कार करा सकते हैं।  
2. माह - उत्तरायण में देवशयन से पूर्व उपनयन या जनेऊ संस्कार करना शुभ रहता है।  
3. तिथियाँ - शुक्ल पक्ष की 2,3,5, 10, 11, 12 तथा कृष्ण पक्ष की 1, 2, 3, 5 तिथियों में। 
4.  वार - रविवार, सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार। 
5.  नक्षत्र - अश्विनी, रोहिणी,मृगशिरा, पुनर्वसु, आर्द्रा, पुष्य, अश्लेषा, तीनों पूर्वा, तीनों उत्तरा, हस्त, चित्रा , स्वाति, अनुराधा, मूल, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, रेवती। 
6. समय - संक्रांति दिन, गुरु- शुक्र के अस्तकाल को छोड़ कर मध्यान्ह के पहले अभिजित शुभ है। चैत्र में मीन के सूर्य में यज्ञोपवीत संस्कार  श्रेष्ठ है।

(8.1.3) Jagannath Rath Yatra /जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा

Rath Yatra / Jagannath Puri Rath Yatra (in Hindi) / जगन्नाथ पुरी रथ यात्रा 

रथ यात्रा उत्सव आषाढ़ शुक्ल द्वितीय को आयोजित किया जाता है।  यह उत्सव मुख्य रूप से पुरी में आयोजित किया जाता है। इस रथ यात्रा उत्सव के बारे में महत्वपूर्ण बातें निम्नानुसार हैं - (For English translation click here)  
1. भारत के उड़ीसा प्रान्त में समुद्र के किनारे भगवान जगन्नाथ का मंदिर है। भगवान जगन्नाथ को हिन्दुओं  के प्रमुख देवता के रूप में माना जाता है। पुरी के इस भव्य मंदिर में तीन प्रतिमाएं हैं।ये प्रतिमाएं भगवान जगन्नाथ , उनके भाई बलभद्र व उनकी बहिन सुभद्रा की हैं। ये सभी प्रतिमाएं लकड़ी की बनी हुई हैं। माना जाता है कि इन प्रतिमाओं की प्राण प्रतिष्ठा महाराज इंद्र द्युम्न ने की थी।
2. भगवान जगन्नाथ का रथोत्सव आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है। इस दिन उड़ीसा के पुरी  नामक स्थान पर यह बड़ी धूमधाम और श्रद्धा से मनाया जाता है। उस दिन भगवान जगन्नाथ  ,सुभद्रा जी व बलभद्र जी की प्रतिमाओं  को विशाल रथ पर आरूढ़ करके समस्त नगरी के प्रमुख मार्गों पर भ्रमण करते हैं।
3. भगवान  के रथ को पशु नहीं अपितु श्रद्धालु जन खींचते हैं ,जो हज़ारों की संख्या में होते हैं।
4. प्रतिवर्ष नया रथ निर्मित किया जाता है।
5. रथ यात्रा ,भगवान  जगन्नाथ की गुंडीचा माता मंदिर के वार्षिक भ्रमण के रूप में आयोजित की जाती है। इसलिए  इसे गुण्डीच यात्रा भी कहा जाता है।
6.  इस रथ यात्रा के लिए तीन रथ बनाये जाते हैं। ये रथ बलभद्र ,भगवान जगन्नाथ और सुभद्रा के लिए होते हैं।
7. रथ यात्रा में सबसे आगे बलभद्र जी का रथ रहता है , बीच में सुभद्रा जी का ,और सबसे पीछे भगवान  जगन्नाथ जी का रथ रहता है।
8. बलभद्र जी के रथ का रंग लाल तथा हरा होता है ,सुभद्रा जी के रथ का रंग लाल तथा नीला होता है, भगवान  जगन्नाथ जी के रथ का रंग लाल तथा पीला होता है।
9. बलभद्र जी के रथ को पाल ध्वज ,सुभद्रा जी के रथ को दर्पदलन या देवी रथ तथा जगन्नाथ जी के रथ को नंदी घोष कहा जाता है।
10. यह रथ यात्रा प्रतिवर्ष आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को शुभ मुहूर्त में प्रारम्भ होती है और भक्तगण इन रथों को खीचते हुए गुंडीचा मंदिर तक ले जाते हैं, जहाँ ये रथ सात दिन तक रुकते हैं।
11. आषाढ़ शुक्ल दशमी को मुख्य मंदिर के लिए वापसी यात्रा प्रारम्भ होती है, जिसे 'बहुदा यात्रा' कहा जाता है।
12. रथों को मुख्य मंदिर के पास लाकर प्रतिमाओं को एक दिन रथ में ही रखा जाता है तथा आषाढ़ शुक्ल एकादशी को मंदिर में रखा जाता है।  इसके साथ ही भगवान  जगन्नाथ की दस दिवसीय यात्रा समाप्त होती है।
(For English translation click here)