Wednesday, 19 July 2023

(6.11.16) यात्रा की सफलता हेतु रामचरितमानस चौपाई Yatra Ki Safalata Hetu Chaupai Prabisi Nagar Kije Sab Kaja

यात्रा की सफलता हेतु रामचरितमानस चौपाई Yatra Ki Safalata Hetu Chaupai Prabisi Nagar Kije Sab Kaja

यात्रा की सफलता के लिए रामचरितमानस की चौपाई

तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस की चौपाइयाँ और दोहे सिद्ध मन्त्रों की तरह ही काम करते हैं. ऐसी ही एक चौपाई है –

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदयँ राखि कोसलपुर राजा .

जब कभी भी आप किसी स्थान की यात्रा पर जाते हैं या किसी विशेष कार्य के लिए घर से प्रस्थान करते हैं तो, उस समय भगवान् राम का मन ही मन स्मरण करके इस चौपाई को ग्यारह या इक्कीस बार बोलें और मन में विश्वास करें कि भगवान् राम की कृपा से आपकी यात्रा सफल होगी और आपके कार्य में आपको सफलता मिलेगी.

चौपाई एक बार फिर सुनें -   

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा, हृदयँ राखि कोसलपुर राजा .

Tuesday, 18 July 2023

(4.2.1) Hawan Karte Samay 'Swaahaa / Swaha Kyon Bola Jata Hai

 

हवन करते समय ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण क्यों किया जाता है ? Hawan Karte Samay ‘Swahaa’ kyon Bola Jata Hai ?

 

हिंदू मान्यता के अनुसार शुभ कार्य या अनुष्ठान में हवन किया जाता है. हवन करते समयस्वाहा’शब्द का उच्चारण किया जाता है और ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण करते हुए हविष्यान्न यानि हवन सामग्री को हवन कुंड में अर्पित किया जाता है. इस हवन सामग्री का भोग अग्नि के माध्यम से देवताओं तक पहुंचाया जाता है. कोई भी यज्ञ या हवन तब तक सफल नहीं माना जाता है, जब तक अर्पित की गई सामग्री को देवता ग्रहण नहीं कर ले और देवता इस सामग्री को तभी ग्रहण करते हैं जब अग्नि के द्वारा ‘स्वाहा’ के माध्यम से यह सामग्री अर्पित की जाती है.

वास्तव में सनातन धर्म में ‘स्वाहा’ एक देवी का नाम है. यह देवी राजा दक्ष प्रजापति की बेटी थी और इनका विवाह अग्निदेव के साथ किया गया था. स्वाहा देवी को यह वरदान था कि जब कोई व्यक्ति किसी भी सामग्री को अग्नि देव के सहारे हवन करके देवताओं तक पहुंचाना चाहता है, तो वह सामग्री देवताओं के पास तब तक नहीं पहुंचेगी जब तक उस देवी नाम अर्थात ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण न कर लिया जाए. इसी कारण से जब भी किसी मंत्र का उच्चारण किया जाता है तो उस मंत्र के अंत में ‘स्वाहा’ बोलते हुए वह सामग्री अग्नि में अर्पित की जाती है और देवी ‘स्वाहा’ के माध्यम से ही अग्निदेव उस सामग्री के देवताओं तक पहुंचाते हैं.

इसी कारण से अर्पित की गई सामग्री को देवताओं तक पहुंचाने के लिए ‘स्वाहा’ शब्द का उच्चारण किया जाता है.

Sunday, 16 July 2023

(7.1.23) अधिक मास व्रत / अधिक मास व्रत का महत्व - Adhik Maas Vrat And Its Importance

 

अधिक मास व्रत / अधिक मास व्रत का महत्व - Adhik Maas Vrat And Its Importance 

 

 जिस वर्ष में अधिक मास होता है उस वर्ष में 12 माह के स्थान पर 13 माह हो जाते हैं । चैत्र आदि जो भी अधिक मास होता है उस वर्ष में दोनों महीनों को एक ही नाम से पुकारा जाता है। उन्हें प्रथम मास और द्वितीय मास कहा जाता है। जैसे किसी वर्ष में श्रावण अधिक मास है तो पहले मास का नाम प्रथम श्रवण और दूसरे मास को द्वितीय श्रवण के नाम से पुकारा जाता है। जिस प्रकार प्रत्येक मास में 2 पक्ष होते हैं अर्थात कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष । इसी प्रकार अधिक मास में 4 पक्ष अर्थात कृष्ण पक्ष, शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष होते हैं। इनमें से दूसरे पक्ष अर्थात शुक्ल पक्ष व तीसरे पक्ष यानि कृष्ण पक्ष अधिक मास कहलाता है। इन दोनों पक्षों के कुल 30 दिनों में अधिक मास के निमित्त व्रत करना चाहिए और यथासामर्थ्य दान पुण्य आदि करना चाहिए । यदि पूरे मास व्रत करना संभव नहीं हो तो जितने दिन भी व्रत कर सके उतने दिन ही व्रत करना चाहिए और यथाशक्ति दान देना चाहिए। 

अधिक मास व्रत का महत्व -

अधिक मास व्रत मनुष्य के समस्त पापों को हर लेने वाला व्रत है । इस व्रत के विषय में भगवान श्री कृष्ण ने कहा था कि इसका फल दाताभोक्ता और अधिष्ठाता सब कुछ मैं ही हूँ इसी कारण से इस अधिक मास का नाम पुरुषोत्तम मास भी है।

 इस महीने में केवल ईश्वर प्राप्ति के उद्देश्य से जो व्रत, उपवास, दान, स्नान या पूजन आदि किया जाता है, उनका अक्षय फल मिलता है और व्रत करने वाले के संपूर्ण कष्ट दूर हो जाते हैं।

 इस महीने में दान पुण्य या अन्य निष्काम भाव से किए गए कार्य का अक्षय फल प्राप्त होता है । यदि दान आदि का सामर्थ्य ना हो तो ब्राह्मण और साधुओं की सेवा, असहाय लोगों की सहायता भी सर्वोत्तम है । इससे तीर्थ स्नान आदि के समान फल होता है।

(2.2.8) सफलता पाने के ग्यारह सूत्र Safalata Ke Gyarah Sutra चाणक्य नीति Chankya Quotes

 

सफलता पाने के ग्यारह सूत्र Safalata Ke Gyarah Sutra 

चाणक्य नीति Chankya Quotes

चाणक्य का जन्म एक कुलीन ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनके जन्म का नाम विष्णुगुप्त था. वे मेधावी, विद्वान्, नीतिमान और अत्यंत प्रभावशाली थे. वे महान प्रतिभा के धनी थे. कूटनीतिज्ञ के रूप में चाणक्य का स्थान भारतीय राजनीति में सर्वोपरि माना जाता है. उनके द्वारा एक साधारण युवक चन्द्रगुप्त मौर्य को विशाल मगध साम्राज्य का अधिपति बना देना कोई साधारण बात नहीं थी. उन्होंने मगध साम्राज्य की राज्य व्यवस्था का बौद्धिक संचालन इतनी कुशलता से किया कि चन्द्रगुप्त का शासन सुदृढ़ से सुदृढ़तर होता चला गया. चन्द्रगुप्त को एक सफल सम्राट बनाने का श्रेय चाणक्य को ही जाता है.

आइये, ऐसे ही सफल राजनीतिज्ञ और कूटनीतिज्ञ के सफलता दिलाने वाले सुन्दर विचारों को जाने -  

पहला –

अपने  व्यवहार में बहुत अधिक सरल मत रहो। जंगल  में सीधे पेड़ों को पहले  काटा जाता है और टेढ़े पेड़ों को छोड़ दिया जाता है।  

दूसरा -  

संतुलित मतिष्क के समान कोई आत्म संयम नहीं है , संतोष के समान कोई सुख नहीं है , लालच के समान कोई व्याधि नहीं है , और दया के समान कोई गुण नहीं है।   

तीसरा -      

 दूसरों की गलतियों से सीखो।आप का जीवन इतना लम्बा नहीं होता  है कि हर बात को सीखने के लिए आप गलती करें।  

चौथा –

सबसे बड़ा गुरु मन्त्र है,"अपने रहस्यों को कभी भी प्रकट मत करो ,यह (प्रकट करना )आप का विनाश कर देगा।  

पाँचवा -   

प्रत्येक कार्य को शुरू करने से पहले, अपने आपसे हमेशा तीन प्रश्न पूछो ,- मैं इसे क्यों कर रहा हूँ , इसके संभावित परिणाम क्या हो सकते हैं और क्या मैं इसमें सफल हो जाऊंगा ?जब आप

 छठा -

इन पर गहनता से विचार कर लें और प्रश्नों का संतोष जनक उत्तर मिल जाये ,तो आप उस कार्य के लिए आगे  बढ़िये।

सातवाँ -

जो कुछ भी पहले  हो चुका है उसके लिए उद्विग्न नहीं होना चाहिए न ही भविष्य के लिए चिंतित होना चाहिए। विवेकी व्यक्ति केवल वर्तमान पर अपना ध्यान केन्द्रित करते हैं।     

आठवाँ - 

ज्योंही भय आपके नजदीक आये , उस पर आक्रमण करके उसे नष्ट कर दो।      

नवां –

आप से उच्च या निम्न श्रेणी के व्यक्तियों  से मित्रता मत करो। ऐसी मित्रता से आप को कोई लाभ नहीं मिलेगा।

दसवाँ

जब आप किसी कार्य को शुरू  कर देते हो , तो असफलता से मत डरो और न ही उसे बीच में छोडो। निष्ठा पूर्वक कार्य करने वाले लोग ही सफल होते हैं और  प्रसन्न रहते हैं।  

ग्यारहवाँ -      

किसी भी चीज के बाहरी रूप को देख कर आप उसके बारे में निर्णय नहीं करें।जो कुछ बाहर से दिखाई देता है, जरूरी नहीं कि अंदर से भी वैसा ही हो।

Friday, 14 July 2023

(6.11.15) नजर उतारने हेतु रामचरितमानस की चौपाई Najar Utarane ke Liye Ramcharitmanas Chaupai

 

नजर उतारने हेतु रामचरितमानस की चौपाई Najar Utarane ke Liye Ramcharitmanas Chaupai

नजर उतारनेके लिए रामचरितमानस की चौपाई

तुलसीदासजी द्वारा रचित रामचरितमानस की चौपाइयाँ और दोहे सिद्ध मन्त्रों की तरह ही काम करते हैं. ऐसी ही एक चौपाई है –

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी, निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी.

यदि किसी बच्चे को किसी की बुरी नजर लग गयी हो और जिसके कारण उस बच्चे के स्वाथ्य पर बुरा असर पड़ रहा हो तो, रामचरितमानस की इस चौपाई से बुरी नजर के प्रभाव से बचा जा सकता है.

इसके लिए किसी साफ़ बर्तन में थोडा पानी लेलें. इस बर्तन को अपने सामने रखें और इस चौपाई का 108 बार पाठ करें. ऐसा करने से यह जल अभिमन्त्रित हो जायेगा. इस अभिमन्त्रित जल को उस बच्चे को पिला दे. इस अभिमन्त्रित जल के प्रभाव से बच्चे को लगी बुरी नजर का असर समाप्त हो जायेगा. 

या उस बच्चे को अपने सामने बैठा कर भगवान् राम का ध्यान करें और इस चौपाई को ग्यारह या इक्कीस बार बोलें और भावना करें कि इस चौपाई के प्रभाव से उस बच्चे को लगी बुरी नजर का बुरा प्रभाव समाप्त हो जायेगा और बच्चा फिर से स्वस्थ हो जायेगा.

इसी प्रकार यदि बुरी नजर के कारण आपके व्यवसाय पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा हो तो भी इस चौपाई का प्रयोग कर सकते हैं. इसके लिए इकतालीस दिन तक इस चौपाई का प्रतिदिन 108 बार पाठ करें और पाठ समाप्ति के बाद भावना करें कि आपके व्यवसाय पर बुरी नजर के कारण पड़ा बुरा प्रभाव समाप्त हो रहा है और आपका व्यवसाय फिर से गति पकड़ रहा है.  

चौपाई एक बार फिर सुने –

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी, निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी.

Wednesday, 12 July 2023

(7.1.22) Adhik Maas Ka Mahatva /Importance of Adhik Maas, Purushottam Maas

 अधिक मास का महत्व ? Importance Of Adhik Maas / Purushottam Maas

अधिक मास का महत्त्व

अधिक मास में सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं. प्राचीन समय से ही काल गणना में अधिक मास का तिरस्कार किया जाने लगा. इस मास में शुभ कार्यों के वर्जित होने से इसे मल मास कहा जाने लगा इसके कारण यह यानि अधिक मास बहुत उदास हो गया.

एक बार अधिक मास ग्लानि से भरकर भगवान् विष्णु के पास गया और बोला, “ भगवान् , मैं अधिक मास हूँ, इस में मेरा क्या दोष है ? मुझे मल मास कहकर तिरस्कृत किया जाता है. इसके अतिरिक्त नक्षत्र, तिथि, वार और मास सभी का कोई न कोई स्वामी है परन्तु मेरा कोई स्वामी नहीं है. इससे मैं बहुत उदास और दुखी हूँ. मैं आप की शरण में आया हूँ.

मल मास को उदास देख कर भगवान् विष्णु ने कहा, “ हे अधिक मास,  मैं तुमारी पीड़ा समझता हूँ. आज से मैं तुम्हें मेरा नाम देता हूँ. अब से तुम पुरुषोत्तम मास के नाम से जाने जाओगे और मैं ही तुम्हारा अधिष्ठाता होऊंगा. मैं तुम्हे वरदान देता हूँ कि जो भी इस अधिक मास में कीर्तन, भजन, पूजन, दान, पुण्य किया जायेगा, वह अमोघ फलदायी होगा.

श्री हरि विष्णु ने आगे कहा कि तुम्हारे इस मास में जो भी प्राणी पुरुषसूक्त का पाठ, वेद मन्त्रों और भागवत महापुराण का पाठ या श्रवण करेगा, उसे उत्तम गति प्राप्त होगी. यह सुनकर अधिक मास संतुष्ट और प्रसन्न हुआ. तब से ही इस अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा और इसका महत्व दूसरे सभी महीनों से अधिक हो गया. इसलिए लोग इस माह में धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं, व्रत उपवास करते हैं, जप, तप, हवन आदि करते है और दान देते हैं.  

 

 

 

 

(7.1.21) Purushottam Maas Ki Kahani / Adhik Maas Ki Kahani

 पुरुषोत्तम मास /अधिक मास को पुरुषोत्तम मास क्यों कहते हैं Purushottam Maas Ka Mahatv/ Adhik Maas Ki Kahani

अधिक मास पुरुषोत्तम मास कैसे बना

अधिक मास में सभी शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं. प्राचीन समय से ही काल गणना में अधिक मास का तिरस्कार किया जाने लगा. इस मास में शुभ कार्यों के वर्जित होने से इसे मल मास कहा जाने लगा इसके कारण यह यानि अधिक मास बहुत उदास हो गया.

एक बार अधिक मास ग्लानि से भरकर भगवान् विष्णु के पास गया और बोला, “ भगवान् , मैं अधिक मास हूँ, इस में मेरा क्या दोष है ? मुझे मल मास कहकर तिरस्कृत किया जाता है. इसके अतिरिक्त नक्षत्र, तिथि, वार और मास सभी का कोई न कोई स्वामी है परन्तु मेरा कोई स्वामी नहीं है. इससे मैं बहुत उदास और दुखी हूँ. मैं आप की शरण में आया हूँ.

मल मास को उदास देख कर भगवान् विष्णु ने कहा, “ हे अधिक मास,  मैं तुमारी पीड़ा समझता हूँ. आज से मैं तुम्हें मेरा नाम देता हूँ. अब से तुम पुरुषोत्तम मास के नाम से जाने जाओगे और मैं ही तुम्हारा अधिष्ठाता होऊंगा. मैं तुम्हे वरदान देता हूँ कि जो भी इस अधिक मास में कीर्तन, भजन, पूजन, दान, पुण्य किया जायेगा, वह अमोघ फलदायी होगा.

श्री हरि विष्णु ने आगे कहा कि तुम्हारे इस मास में जो भी प्राणी पुरुषसूक्त का पाठ, वेद मन्त्रों और भागवत महापुराण का पाठ या श्रवण करेगा, उसे उत्तम गति प्राप्त होगी. यह सुनकर अधिक मास संतुष्ट और प्रसन्न हुआ. तब से ही इस अधिक मास को पुरुषोत्तम मास कहा जाने लगा और इसका महत्व दूसरे सभी महीनों से अधिक हो गया. इसलिए लोग इस माह में धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं, व्रत उपवास करते हैं, जप, तप, हवन आदि करते है और दान देते हैं.  

 

 

 

(7.1.20)अधिक मास में कौनसे कार्य नहीं करने चाहिए Adhik Maas Me Kya Nahin Karen

 

अधिक मास में कौनसे कार्य नहीं करने चाहिए Adhik Maas Me Kya Nahin Karen

अधिक मास में क्या नहीं करें

सनातन पंचांग के अनुसार जब किसी वर्ष में अधिक मास होता है तो उस वर्ष में  बारह माह के स्थान पर तेरह महीनें हो जाते हैं. यह तेरहवाँ महीना ही अधिक मास कहलाता है. इस अधिक मास को मल मास, अधि मास, पुरुषोत्तम मास आदि के नाम से भी जाना जाता है. अधिक मास प्रति तीसरे वर्ष आता है.

धार्मिक ग्रंथों के अनुसार कुछ कार्य ऐसे हैं जो अधिक मास के दौरान नहीं किये जाते हैं. अधिक मास में फल प्राप्ति की कामना से कोई भी कार्य करना वर्जित है. इसके अतिरिक्त अन्य कार्य जिनको अधिक मास में नहीं किया जाना चाहिए वे इस प्रकार हैं –

किसी भी उद्देश्य के लिए भवन का निर्माण करना.

गृह प्रवेश करना.

सगाई अथवा विवाह करना.

वाहन क्रय करना.

कुआ, जलाशय आदि खुदवाना,

मुंडन संस्कार करना.

किसी भी व्रत का आरम्भ और उद्यापन करना.

नव विवाहिता वधु का प्रवेश.

देव प्रतिमा की स्थापना करना.

यज्ञोपवीत संस्कार.

मन्त्र दीक्षा लेना.

कर्ण वेध.

आदि कार्य नहीं करने चाहिए.

लेकिन जो कार्य पहले शुरू किये जा चुके हैं, उन कार्यों को जारी रखा जा सकता है. नित्य एवं नैमित्तिक कर्म किये जा सकते हैं. 

इसके अतिरिक्त रोग आदि की निवृत्ति के लिए महामृत्युन्जय मन्त्र व रूद्रजपादि अनुष्ठान, अनावृष्टि के समय वर्षा करने के लिए पुरुश्चरण,  ग्रहण सम्बन्धी श्राद्ध, दान, जप आदि, पितृ श्राद्ध, संतान जन्म के कृत्य जैसे पुंसवन, जातकर्म, नाम कर्म, सीमन्त आदि कार्य किये जा सकते हैं.  

 

(7.1.19) अधिक मास में क्या करें, कौन से कार्य करें /पुरुषोत्तम मास में क्या करें/ Adhik Maas Me Kya Kare

 

अधिक मास में क्या करें, कौन से कार्य करें /पुरुषोत्तम मास में क्या करें/ Adhik Maas Me Kya Kare  

अधिक मास में कौन से कार्य करें

सनातन पंचांग के अनुसार जब किसी वर्ष में अधिक मास होता है तो उस वर्ष में  बारह माह के स्थान पर तेरह महीनें हो जाते हैं. यह तेरहवाँ महीना ही अधिक मास कहलाता है. इस अधिक मास को मल मास, अधि मास, पुरुषोत्तम मास आदि के नाम से भी जाना जाता है. अधिक मास प्रति तीसरे वर्ष आता है.

हिन्दू मान्यता के अनुसार अधिक मास विशेष महत्त्व का महिना है. भगवान् विष्णु ने स्वयं ने इसको पुरुषोत्तम मास का नाम दिया है. इस मास में जो भी धार्मिक कार्य किये जायें, वे निष्काम और निस्वार्थ भाव से किये जाने चाहिए. अधिक मास में किये जाने वाले मुख्य – मुख्य कार्य इस प्रकार हैं –

देवी भागवत, श्री विष्णु पुराण, श्रीमदभागवत, हरिवंश पुराण, रामायण आदि धार्मिक पुस्तकों को पढ़ना या उनका श्रवण करना चाहिए.

अधिक मास में “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”, विष्णु स्तोत्र, गायत्री मन्त्र या गुरु मन्त्र का जप करना चाहिए.

अधिक मास के अधिष्ठाता भगवान् विष्णु हैं, इसलिए इस मास में भगवान् विष्णु के मन्त्रो, स्तोत्रों आदि का जप करना चाहिए.

अधिक मास में व्रत – उपवास किये जाने का विशेष महत्त्व है. इस महिने में किये गए व्रत, उपवास, स्नान, पूजन आदि का का अक्षय फल होता है. इसलिए व्रत- उपवास करने चाहिए.

देवी भागवत के अनुसार अधिक मास में किये गए दान – पुण्य विशेष फलदायी होते हैं.

अधिक मास में सात्विक जीवन और सदाचरण का विशेष महत्व है.  

 

 

(7.1.18) Adhik Maas / Purushottam Maas / Adhik Maas kab Aata Hai ,kyon aata hai

 

अधिक मास क्या है? कब आता है? क्यों आता है? Adhik Maas Kya Hai, Kab Aata Hai

अधिक मास क्या है? कब आता है? क्यों आता है?

अधिक मास क्या है

अधिक मास से तात्पर्य है एक अतिरिक्त माह या महिना. जब किसी वर्ष में अधिक मास होता है तो उस वर्ष में बारह महीनों के स्थान पर तेरह महिनें होते हैं. यह तेरहवाँ मास ही अधिक मास कहा जाता है. अधिक मास को अधिमास, मल मास, मलिम्लुछ मास या पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है.

अधिक मास क्यों और कब आता है  

अधिक मास की अवधारण को समझने से पहले हमें यह जान लेना चाहिए कि सनातन पंचांग की काल गणना के अनुसार माह दो प्रकार के होते हैं. जिनके नाम हैं चन्द्र मास और सौर मास. चन्द्र मास चन्द्रमा की गति पर आधारित है और सौर मास सूर्य की गति पर आधारित होता है. प्रत्येक चन्द्र माह में दो पक्ष होते हैं – शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष. चन्द्र मास कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से शुरू होकर शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा  को समाप्त होता है. जबकि सौर मास उस अवधि को दिखाता है जो सूर्य द्वारा एक राशि को पार करने से बनती है अर्थात सूर्य की एक संक्रांति से दूसरी संक्रांति तक का समय सौर मास कहलाता है. सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में जाना अर्थात राशि परिवर्तन करना संक्रांति कहलाता है.

जिस प्रकार महीने दो प्रकार के अर्थात चन्द्र मास और सौर मास होते हैं वैसे ही वर्ष भी दो प्रकार के होते हैं जिनको चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष कहा जाता है. बारह चन्द्र मासों का एक चन्द्र वर्ष होता है और बारह सौर मासों का एक सौर वर्ष  होता है. एक चन्द्र वर्ष में लगभग 354 दिन होते हैं और एक सौर वर्ष में लगभग 365 दिन होते हैं. इस प्रकार चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष में लगभग 11 दिन का अंतर आ जाता है, जो हर तीन वर्ष में लगभग 30 दिन के बराबर हो जाता है. चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष के बीच आये इस अंतर में समानता लाने के लिए ही प्रति तीसरे वर्ष चन्द्र मास में एक अतिरिक्त मास जोड़ दिया जाता है यानि चन्द्र वर्ष 12 मासों के बजाय 13 मास का हो जाता है. इस अतिरिक्त मास को ही अधिक मास कहा जाता है. वास्तव में यह स्थिति स्वयं ही उत्पन हो जाती है, जिस चन्द्र मास में सूर्य की संक्रांति नहीं पड़ती, उसी मास को अधिक मास की संज्ञा दे दी जाती है.

इस प्रकार दो चन्द्र मासों को एक ही नाम से पुकारा जाता है और उन्हें प्रथम मास और द्वितीय मास कहा जाता है. जैसे किसी वर्ष में आश्विन मास अधिक मास है तो पहले मास को प्रथम आश्विन और दूसरे मास को द्वितीय आश्विन के नाम से पुकारा जाता है. जिस प्रकार प्रत्येक चन्द्र मास में दो पक्ष होते अर्थात शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं, इसी प्रकार अधिक मास में चार पक्ष अर्थात क्रमशः कृष्ण पक्ष – शुक्ल पक्ष – कृष्ण पक्ष –शुक्ल पक्ष होते हैं. इनमें से पहला पक्ष कृष्ण पक्ष और चौथा पक्ष शुक्ल पक्ष शुद्ध मास कहलाता हैं. सभी पर्व – त्यौहार आदि इस शुद्ध मास में ही आयोजित किये जाते हैं. तथा द्वितीय पक्ष और तृतीय पक्ष अशुद्ध मास कहलाता है. इस अशुद्ध मास में कोई शुभ कार्य नहीं किये जाते हैं.