Monday, 9 October 2023

(6.8.14) Why Shivaratri celebrated on Falgun Krishna Chaturdashi

 फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी को ही शिवरात्रि का पर्व क्यों ? Why Shivaratri celebrated on Falgun Krishna Chaturdashi

भगवान् शिव को प्रसन्न करने व अपनी मनोकामना पूर्ण करने का महोत्सव है , महाशिवरात्रि। इसके ठोस प्रमाण शिव पुराण  व स्कन्द  पुराण  में देखने को मिलते हैं।स्कंद पुराण का कथन है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव जी का पूजन , जागरण व उपवास करने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। विद्येश्वर संहिता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन जो प्राणी निराहार व जितेन्द्रिय रह कर उपवास रखता है, शिव लिंग के दर्शन करता है तथा पूजा करता है, वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर शिवमय हो जाता है। इस दिन भगवान् शिव की पूजा अर्चना करने से साधुओं को मोक्ष प्राप्ति , रोगियों  को रोगों से मुक्ति तथा सभी साधकों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन पूजा करने से गृहस्थ जीवन में चल रहा मत भेद समाप्त हो जाता है, अखंड सौभाग्य की  प्राप्ति होती है और साधक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

 फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी को ही शिवरात्रि का पर्व क्यों ?

भारतीय पंचाग के अनुसार प्रतिपदा से लेकर सोलह तिथियाँ हैं । प्रत्येक तिथि का कोई न कोई स्वामी होता है. जिस तिथि का स्वामी जो देवता होता है, उसी देवता का उस तिथि में व्रत पूजन करने से उसकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान् शिव हैं। इसलिए इस तिथि में भगवान् शिव की पूजा अर्चना करना उतम माना जाता है। यद्यपि प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी शिव रात्रि होती है किन्तु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ ( रात्रि ) में " शिव  लिङ्ग तयोद्भूत: कोटि सूर्य समप्रभ:।“ ईशान संहिता के इस वाक्य के अनुसार ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था, इस कारण यह महा शिव रात्रि मानी जाती है। 

((6.8.13) महाशिवरात्रि /महाशिवरात्रि का महत्व Mahashivaratri and its importance

 महाशिवरात्रि /महाशिवरात्रि का महत्व Mahashivaratri and its importance

शिवरात्रि / महाशिवरात्रि 

भगवान् शिव को प्रसन्न करने व अपनी मनोकामना पूर्ण करने का महोत्सव है , महाशिवरात्रि। इसके ठोस प्रमाण शिव पुराण  व स्कन्द  पुराण  में देखने को मिलते हैं।स्कंद पुराण का कथन है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव जी का पूजन , जागरण व उपवास करने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। विद्येश्वर संहिता के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन जो प्राणी निराहार व जितेन्द्रिय रह कर उपवास रखता है, शिव लिंग के दर्शन करता है तथा पूजा करता है, वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर शिवमय हो जाता है। इस दिन भगवान् शिव की पूजा अर्चना करने से साधुओं को मोक्ष प्राप्ति , रोगियों  को रोगों से मुक्ति तथा सभी साधकों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन पूजा करने से गृहस्थ जीवन में चल रहा मत भेद समाप्त हो जाता है, अखंड सौभाग्य की  प्राप्ति होती है और साधक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।

Sunday, 8 October 2023

(8.1.29) शरद पूर्णिमा व शरद पूर्णिमा व्रत Sharad Poornima tatha Sharad Poornima Vrat Ka Mahatva

 शरद पूर्णिमा व शरद पूर्णिमा व्रत Sharad Poornima tatha Sharad Poornima Vrat Ka Mahatva

आश्विन शुक्ल पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहा जाता है । धर्म शास्त्रों में इस दिन को कोजागर व्रत भी माना जाता है । इसी को कौमुदी व्रत भी कहते हैं। 

भगवान श्री कृष्ण ने जगत की भलाई के लिए इस दिन को रास उत्सव का दिन निर्धारित किया था। कहा जाता है कि इस रात्रि में चंद्रमा की किरणों से अमृत बरसता है। इस दिन मंदिरों में विशेष सेवा पूजा की जाती है।  भगवान को रात्रि में नैवेद्य के लिए खीर का भोग लगाया जाता है। चांदनी में भगवान को विराजमान किया जाता है और श्वेत वस्त्र से श्रृंगार किया जाता है। शरद पूर्णिमा से ही कार्तिक स्नान और व्रत प्रारंभ हो जाते हैं।  माताएं अपनी संतान की मंगल कामना के लिए व्रत रखती हैं और देवी देवताओं का पूजन करती हैं। शरद पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पृथ्वी के बहुत नजदीक आ जाता है इसलिए अमृत प्राप्त करने की इच्छा से शरद पूर्णिमा की रात्रि को घर की छत पर खीर रख देते हैं और अगले दिन इस खीर को खाया जाता है। इस दिन चंद्रमा की रोशनी में सुई में धागा पिरोने की भी प्रथा है। कहा जाता है कि इससे आंखों की रोशनी बढ़ती है।

उद्यापन 

यदि कोई शरद पूर्णिमा का व्रत रखें तो वह तेरह पूर्णिमा होने के बाद उद्यापन करे। उद्यापन में एक लोटे में मेवा भरकर रोली, चावल से पूजा करके एक रुपया चढ़ा कर  अपनी सासू के पांव छूकर उसे यानि सासू को दे दिया जाता है।

 

(8.1.28) शरद पूर्णिमा व्रत कथा Sharad Poornima Vrat Katha / Sharad purnima Ki Kahani

 शरद पूर्णिमा व्रत कथा Sharad Poornima Vrat Katha / Sharad purnima Ki Kahani

शरद पूर्णिमा व्रत से जुड़ी एक पौराणिक कथा इस प्रकार है -

किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके दो बेटियां थी जो हर महिने में आने वाली पूर्णिमा का व्रत रखा करती थी। इन दोनों बेटियों में बड़ी बेटी तो पूर्णिमा का व्रत पूरे विधि विधान के साथ करती थीलेकिन छोटी बेटी व्रत के नियमों का सही ढंग से पालन नहीं करती थी। वह व्रत के नाम पर खाना पूर्ति करती थी।

जब साहूकार की दोनों बेटियां विवाह योग्य हुई तो उसने दोनों का विवाह कर दिया। बड़ी बेटी के घर समय पर स्वस्थ संतान ने जन्म लिया। वहीं छोटी बेटी के संतान तो होती थी लेकिन संतान के जन्म लेने के तुरंत बाद वह मर जाया करती थी। इस तरह छोटी बेटी के साथ यह लगातार दो-तीन बार हो गया।  इस पर उसने एक ब्राह्मण को बुलाकर अपनी पूरी गाथा सुनाई और इस समस्या का  उपाय बताने के लिए कहा।  ब्राह्मण ने उसकी सारी बात सुनी और कुछ प्रश्न भी पूछे। फिर कहा कि तुम पूर्णिमा का व्रत तो करती हो  लेकिन हमेशा अधूरा व्रत करती हो इसलिए तुम्हें व्रत का पूरा फल नहीं मिल रहा है। वास्तव में तुम्हें अधूरे व्रत का दोष लग रहा है। ब्राह्मण की बात सुनकर लड़की थोड़ी दुखी हुई फिर उसने पूरी विधि विधान से पूर्णिमा  का व्रत करने का निर्णय किया। लेकिन पूर्णिमा आने से पहले ही उसने एक बेटे को जन्म दिया। लेकिन जन्म लेने के साथ ही उसके बेटे की मृत्यु हो गई। हर बार ऐसी घटना से साहूकार की छोटी बेटी काफी दुखी हुई। उसने अपने बेटे के शव को एक पाटे पर रख दिया और  इसे एक कपड़े से इस तरह ढका कि किसी को पता ना चले। इसके बाद उसने अपनी बड़ी बहन को बुलाया और उसे उसी पाटे पर बैठने के लिए कहा जिस पर उसके बेटे का शव रखा था। जैसे ही बड़ी बहन उसे पाटे पर बैठी तो उसके लहंगे का हिस्सा उस मरे हुए बच्चे को स्पर्श कर गया। लहंगे के स्पर्श करते ही बच्चा जीवित होकर रोने लगा। बच्चों के रोने की आवाज सुनकर बड़ी बहन घबरा गई। फिर बड़ी बहन ने क्रोधित होकर कहा कि यह तुमने क्या किया? क्या तुम मुझ पर तुम्हारे बच्चे  की हत्या का कलंक लगाना चाहती थी ? मेरे इस बच्चे पर बैठने से अगर बच्चे की मृत्यु हो जाती तो मेरे ऊपर कलंक लगता। छोटी बहन ने उत्तर दिया कि यह बच्चा तो मरा हुआ ही थादीदी .  तुम्हारे स्पर्श से तो यह फिर से जीवित हो गया है।  हर पूर्णिमा पर जो तुम व्रत और तप किया करती हो उसके कारण तुम्हें वरदान प्राप्त है और तुम पवित्र हो गई हो। दीदी, अब मैं भी तुम्हारी तरह शरद पूर्णिमा पर विधि विधान से पूजन करूंगी। तभी से साहूकार की छोटी बेटी ने भी पूर्णिमा का व्रत नियम के अनुसार करना शुरू कर दिया और प्रसन्न रहने लगी। 

इसके बाद इस व्रत के महत्व और फल का प्रचार पूरे नगर में प्रसिद्ध हो गया। और सभी को पता चल गया कि पूर्णिमा का व्रत अधूरा नहीं करना चाहिए.

जिस प्रकार माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु ने साहूकार की बेटी की कामना पूरी कर सौभाग्य प्रदान किया वैसे ही हम सब पर कृपा बनी रहे।

Friday, 6 October 2023

(6.8.12) शिव अभिषेक Shiva Abhishek / Rudraabhishek

शिव अभिषेक Shiva Abhishek / Rudraabhishek

अभिषेक का तात्पर्य

सामान्य भाषा में अभिषेक का तात्पर्य स्नान कराने से है। शिव अभिषेक का तात्पर्य शिव प्रतिमा या शिवलिंग के ऊपर जल चढ़ाना या जल की धारा प्रवाहित करना है। अभिषेक को शिव पूजा का अभिन्न भाग माना जाता है . इससे भगवान शिव प्रसन्न होते हैं। अभिषेक करते समय साधक को भगवान शिव से सम्बंधित मन्त्र या स्तोत्र का जप करना चाहिए। मुख्य रूप से पंचाक्षर मन्त्र, रूद्र मन्त्र, महामृत्युंजय मन्त्र आदि।

रुद्राभिषेक -

भगवान शिव का अभिषेक करते समय व्यक्ति किसी न किसी मन्त्र का उच्चारण / जप करता है। यदि वह वैदिक रुद्रसूक्त ( रुद्री ) का पाठ / जप करता हुआ अभिषेक करें तो इसे रुद्राभिषेक कहा जाता है। रुद्राभिषेक गंगा जल, गाय के दूध, पंचामृत आदि से किया जा सकता है। रुद्राभिषेक करने से व्यक्ति के दुःख दर्दो का विनाश होता है, बिमारी से मुक्ति मिलती है, संभावित खतरों से रक्षा होती है और जीवन में प्रसन्नता और सम्पन्नता  आती है।

अभिषेक करने के लिए विभिन्न सामग्री / वस्तुएं -

सामान्तया शिव प्रतिमा / शिव लिंग पर जल धारा  प्रवाहित करके अभिषेक किया जाता है। लेकिन जल के अतिरिक्त अन्य पदार्थों से भी अभिषेक किया जाता है। अलग - अलग पदार्थों से किये गए अभिषेक का फल या उद्देश्य अलग - अलग होता है।

1.गंगा का पानी - सभी चारों पुरषार्थों की प्राप्ति व मानसिक शांति के लिए गंगा जल से अभिषेक किया जाता है।

2.घी से अभिषेक करने पर वंश वृद्धि होती है।

3.शुद्ध पानी से अभिषेक करने पर मानसिक शान्ति मिलती है और कामना की पूर्ति होती है।तथा अच्छी वर्षा होती है।

4.दूध से अभिषेक करने पर समस्याओं  से छुटकारा मिलता है और परिवार में सुख शान्ति रहती है।

5.गन्ने के रस से अभिषेक करने पर सम्पन्नता व प्रसन्नता आती है।

6.शहद से अभिषेक करने पर सामान्य इच्छा पूर्ति होती है।

( अभिषेक / रुद्राभिषेक विधि सम्पूर्ण )

  

(6.8.11) शिव गायत्री मंत्र (Shiva Gayatri Mantra) Benefits of Shiva Gayatri Mantra

 शिव गायत्री मंत्र (Shiva Gayatri Mantra) Benefits of Shiva Gayatri Mantra

भगवान् शिव से सम्बंधित अन्य मन्त्रों की तरह ही शिव गायत्री मंत्र भी शक्तिशाली और महामंत्र है. पवित्र भाव, भगवान् शिव के प्रति निष्ठा व विश्वास के साथ शिव गायत्री मंत्र का जप करने से जपकरता का मन निर्मल हो जाता है. जीवन में सुख, समृद्धि , मानसिक शान्ति, यश, धन लाभ, पारिवारिक सुख आदि प्राप्त होते हैं. यह इसके जपकर्ता के मनोरथों को सिद्ध करने वाला मंत्र है. शिव गायत्री मंत्र के जप से असामयिक मृत्यु तथा गंभीर बीमारी का भय नहीं रहता है . जन्म कुंडली में राहु, केतु अथवा शनि पीड़ाकारक हो, तो शिव गायत्री मंत्र से राहत मिलाती है. इस मंत्र की जप विधि इस प्राकार है -

दैनिक कार्य से निवृत होकर किसी शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊनी आसन पर बैठ जाएँ। भगवान् शिव का चित्र अपने सामने रखें।घी का दीपक  तथा धूपबत्ती जलाएं।  अपनी आखें बंद करके अपना ध्यान भगवान् शिव पर केन्द्रित करें।तथा भावना करें कि भगवान् शिव इस संसार का स्रोत हैं और सम्पूर्ण प्राणियों के स्वामी हैं।वे  बहुत दयालु हैं जो अपनी कृपा से उनके भक्तों का उद्धार  करते हैं।  मैं ऐसे  भगवान् शिव से प्रार्थना  करता हूँ कि वे मुझे आशीर्वाद प्रदान करें।इस तरह की प्रार्थना के बाद इस मंत्र का 108 बार अर्थात एक माला का जप करें | मंत्र इस प्रकार है  :-  

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् I

मंत्र जप समाप्त हो जाये तो उस स्थान को तुरंत नहीं छोड़ें।मंत्र जप के बाद थोड़े समय के लिए शांत बैठ जाये। अपनी आखें बंद कर लें और भगवान् शिव के असीम स्नेह का मनन करें।मन में भावना करें कि भगवान् शिव ने आपकी प्रार्थना को सुन लिया है।वे उनका आशीर्वाद आपको प्रदान कर रहे हैं।उनकी कृपा से जिस भी कामना से आपने मंत्र का जप किया है, वह कामना पूर्ण हो रही है.

इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान् शिव के प्रति सम्मान प्रकट करें और पूजा का स्थान छोड़कर अपने दैनिक कार्य में लग जाएँ।

 

Saturday, 23 September 2023

(6.8.10 भगवान् शिव के बारह नाम अर्थात श्री शिव द्वादश नामावली Shivaji Ke Baarah Naam

भगवान् शिव के बारह नाम अर्थात श्री शिव द्वादश नामावली Shivaji Ke Baarah Naam

Shiva Dwadash Naamaawali 

भगवान् शिव के ये बारह नाम उनके बारह ज्योतिर्लिंगों के नाम हैं . जो व्यक्ति इन द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नामों का स्मरण, उच्चारण, जप या पाठ करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होते हैं. उसे मानसिक शांति मिलती है और आर्थिक संकट से मुक्ति मिलती है. जो निष्काम भाव से इन नामों का जप करता है, वह मोक्ष गति को प्राप्त होता है. यह द्वादश नामावली इस प्रकार हैं –

ॐ सोमनाथाय नमः

ॐ मल्लिकार्जुनाय  नमः

ॐ महाकालेश्वराय  नमः

ॐ ॐकारेश्वराय  नमः

ॐ वैद्यनाथाय  नमः

ॐ भीमशंकराय  नमः

ॐ रामेश्वराय नमः

ॐ नागेश्वराय  नमः

ॐ विश्वनाथाय  नमः

ॐ त्र्यम्ब्केश्वराय नमः

ॐ केदारनाथाय  नमः

ॐ घुश्मेश्वराय नमः

श्री शिव द्वादशनामावली सम्पूर्ण

 

(6.8.9)पंचाक्षर मंत्र / Panchakshar Mantra (Om Namah Shivay)

पंचाक्षर मंत्र / Panchakshar Mantra (Om Namah Shivay)

Om Namah Shivay

जिस प्रकार भगवान् शिव देवादिदेव हैं, उसी प्रकार सब मन्त्रों में भगवान् शिव का पंचाक्षर मंत्र “ नमः शिवाय “ श्रेष्ठ मन्त्र है . इस मंत्र के शुरू में प्रणव अर्थात  “ ॐ “ जोड़ देने से यह षडाक्षर मंत्र “ॐ नमः शिवाय “ हो जाता है . इस मंत्र में अक्षर तो कम हैं, परन्तु यह महान अर्थ से संपन्न है. यह मोक्ष देने वाला है , भगवान् शिव की आज्ञा से सिद्ध है , संदेह रहित है तथा शिव स्वरुप वाक्य है. यह अनेक प्रकार की सिद्धियों से युक्त और दिव्य है. यह इसके जपकर्ता के मनोरथों को सिद्ध करने वाला है . इस मंत्र की जप प्रक्रिया इस प्रकार है - 

दैनिक कार्य से निवृत होकर किसी शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊनी आसन पर बैठ जाएँ। भगवान् शिव का चित्र अपने सामने रखें।घी का दीपक  तथा धूपबत्ती जलाएं।  अपनी आखें बंद करके अपना ध्यान भगवान् शिव पर केन्द्रित करें।तथा भावना करें कि भगवान् शिव इस संसार का स्रोत हैं और सम्पूर्ण प्राणियों के स्वामी हैं।वे  बहुत दयालु हैं जो अपनी कृपा से उनके भक्तों का उद्धार  करते हैं।  मैं ऐसे  भगवान् शिव से प्रार्थना  करता हूँ कि वे मुझे आशीर्वाद प्रदान करें।इस तरह की प्रार्थना के बाद इस मंत्र का 108 बार अर्थात एक माला का जप करें . प्रणव सहित मंत्र इस प्रकार है  :-  

“ॐ नमः शिवाय “ 

मंत्र जप समाप्त हो जाये तो उस स्थान को तुरंत नहीं छोड़ें।मंत्र जप के बाद थोड़े समय के लिए शांत बैठ जाये। अपनी आखें बंद कर लें और भगवान् शिव के असीम स्नेह का मनन करें।मन में भावना करें कि भगवान् शिव ने आपकी प्रार्थना को सुन लिया है।वे उनका आशीर्वाद आपको प्रदान कर रहे हैं।उनकी कृपा से जिस भी कामना से आपने मंत्र का जप किया है, वह कामना पूर्ण हो रही है.

इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान् शिव के प्रति सम्मान प्रकट करें और पूजा का स्थान छोड़कर अपने दैनिक कार्य में लग जाएँ।

(पंचाक्षर मंत्र जप विधि समाप्त ) 

Friday, 22 September 2023

(6.8.8) त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र Tryakshar Mrityunjay Mantra /Om Joom Sah Tryakshar Mrityunjay Mantra

त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र Tryakshar Mrityunjay Mantra /Om Joom Sah Tryakshar Mrityunjay Mantra

त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र का जप जीवन को उल्लास से भर देता है ।जिस घर में त्र्यक्षर मृत्युंजय मंत्र का जप किया जाता है ,उस घर के सदस्यों को बीमारीआकस्मिक या असामयिक  मृत्यु का  भय नहीं रहता है।यह मंत्र स्वास्थ्य और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है। इस मंत्र के जप से नकारात्मक भावना दूर होती है. यह व्यक्ति को उसकी कठिनाईयों और बाधाओं पर विजय पाने में सहायता करता है। इसके प्रभाव से ग्रह दोष दूर हो जाता है.

मंत्र जप प्रक्रिया इस प्रकार है :-

दैनिक कार्य से निवृत होकर किसी शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊनी आसन पर बैठ जाएँ।भगवान् शिव का चित्र अपने सामने रखें।घी का दीपक  तथा अगरबत्ती जलाएं।  अपनी आखें बंद करके अपना ध्यान भगवान् शिव पर केन्द्रित करें।तथा भावना करें कि भगवान् शिव इस संसार का स्रोत हैं और सम्पूर्ण प्राणियों के स्वामी हैं।वे  बहुत दयालु हैं जो अपनी कृपा से उनके भक्तों का उद्धार  करते हैं।  मैं ऐसे  भगवान् शिव से प्रार्थना  करता हूँ कि वे मुझे स्वस्थ रहने का आशीर्वाद प्रदान करें।इस तरह की प्रार्थना के बाद इस मंत्र का 108 बार अर्थात एक माला का जप करें . मंत्र इस प्रकार है  :-   

ॐ जूं सः

मंत्र जप समाप्त हो जाये तो उस स्थान को तुरंत नहीं छोड़ें।मंत्र जप के बाद थोड़े समय के लिए शांत बैठ जाये। अपनी आखें बंद कर लें और भगवान् शिव के असीम स्नेह का मनन करें।मन में भावना करें कि भगवान् शिव ने आपकी प्रार्थना को सुन लिया है।वे उनका आशीर्वाद आपको प्रदान कर रहे हैं।उनकी कृपा से जिस भी कामना से आपने मंत्र का जप किया है, वह कामना पूर्ण हो रही है.

इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान् शिव के प्रति सम्मान प्रकट करें और पूजा का स्थान छोड़कर अपने दैनिक कार्य में लग जाएँ।

  

Wednesday, 20 September 2023

(6.8.7) महामृत्युंजय मंत्र Mahamrityunjay Mantra Benefits of Mahamrityunjay Mantra

महामृत्युंजय मंत्र Mahamrityunjay Mantra Benefits of Mahamrityunjay Mantra

महामृत्यंजय मंत्र एक महामंत्र है. इस मंत्र का जप जीवन की  अवधि को दीर्घ बनाता है,बीमारी का उन्मूलन करता है और मृत्यु भय को मिटाता है।जिस घर में महामृत्युंजय मंत्र का जप किया जाता है ,उस घर के सदस्यों को बीमारी ,आकस्मिक या असामयिक  मृत्यु का  भय नहीं रहता है।यह मंत्र स्वास्थ्य और प्रसन्नता प्रदान करने वाला है। इस मंत्र के जप से नकारात्मक भावना दूर होती है. यह व्यक्ति को उसकी कठिनाईयों और बाधाओं पर विजय पाने में सहायता करता है। इसके प्रभाव से ग्रह दोष दूर हो जाता है.

मंत्र जप प्रक्रिया इस प्रकार है :-

दैनिक कार्य से निवृत होकर किसी शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके ऊनी आसन पर बैठ जाएँ।भगवान् शिव का चित्र अपने सामने रखें।घी का दीपक  तथा अगरबत्ती जलाएं।  अपनी आखें बंद करके अपना ध्यान भगवान् शिव पर केन्द्रित करें।तथा भावना करें कि भगवान् शिव इस संसार का स्रोत हैं और सम्पूर्ण प्राणियों के स्वामी हैं।वे  बहुत दयालु हैं जो अपनी कृपा से उनके भक्तों का उद्धार  करते हैं।  मैं ऐसे  भगवान् शिव से प्रार्थना  करता हूँ कि वे मुझे स्वस्थ रहने का आशीर्वाद प्रदान करें।इस तरह की प्रार्थना के बाद इस मंत्र का 108 बार अर्थात एक माला का जप करें . मंत्र इस प्रकार है  :-   

ॐ त्र्यम्बकं  यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् |

  उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माSमृतात् |

मंत्र जप समाप्त हो जाये तो उस स्थान को तुरंत नहीं छोड़ें।मंत्र जप के बाद थोड़े समय के लिए शांत बैठ जाये। अपनी आखें बंद कर लें और भगवान् शिव के असीम स्नेह का मनन करें।मन में भावना करें कि भगवान् शिव ने आपकी प्रार्थना को सुन लिया है।वे उनका आशीर्वाद आपको प्रदान कर रहे हैं।उनकी कृपा से जिस भी कामना से आपने मंत्र का जप किया है, वह कामना पूर्ण हो रही है.

इसके बाद हाथ जोड़कर भगवान् शिव के प्रति सम्मान प्रकट करें और पूजा का स्थान छोड़कर अपने दैनिक कार्य में लग जाएँ।