Tuesday, 10 March 2015

(3.1.8) Meaning of Gayatri Mantra in Hindi

Gayatri Mantra Ka Hindi Men Arth गायत्री मन्त्र का हिन्दी में अर्थ 

गायत्री मन्त्र का हिन्दी में अर्थ 
गायत्री मन्त्र एक वैदिक मन्त्र है।  ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद में गायत्री मन्त्र का उल्लेख है।  गायत्री मन्त्र गायत्री छन्द में है अतः इसका नाम गायत्री है।  ब्रह्ममुख से निर्गत होने  कारण इसको ब्रह्म गायत्री भी कहते हैं।  गायत्री मन्त्र के देवता सविता हैं और इसके ऋषि विश्वामित्र हैं।  गायत्री मन्त्र में 24 अक्षर हैं। इस मन्त्र में (गायत्री छन्द के अनुसार ) आठ - आठ अक्षरों के तीन चरण हैं।   चरणों के पूर्व तीन व्याहृतियाँ (भूः , भुवः , स्वः ) हैं।  और व्याहृतियों से पूर्व प्रणव अर्थात ॐ लगाया जाता है।  इस मन्त्र का पूरा स्वरुप इस प्रकार है -  
ॐ भूर्भुव: स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात् !!   

गायत्री मन्त्र का अर्थ इस प्रकार है:-
ॐ   - परब्रह्म परमात्मा का नाम है
भूः   - प्राणस्वरुप                 
भुवः - दुःख नाशक
स्वः - सुख स्वरुप                
तत्  - वह ईश्वर
सवितु  - तेजस्वी                
वरेण्यं  - श्रेष्ठ
भर्गो - पापों का नाश करने वाला      
देवस्य - दिव्य, देने वाला
धीमहि - धारण करें               
धियो - बुद्धि
यो - जो                                
नः - हमारी
प्रचोदयात् - प्रेरित करें
भावार्थ:-                                                                                                                              
उस प्राणस्वरूप, दुखनाशक, सुखस्वरूप, तेजस्वी, श्रेष्ठ, पापनाशक, देवस्वरूप को हम अपनी अन्तरात्मा  में धारण करें, वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे।
अर्थ का चिंतन:- ॐ रुपी परमात्मा जो पृथ्वीलोक, अन्तरिक्षलोक और स्वर्गलोक में सूक्ष्म रूप में  व्यापकता के साथ समाया हुआ है वह मेरी गतिविधियों का निरीक्षण भी कर रहा है और संचालन भी कर रहा है। वह ई श्वर मेरे अंतःकरण में प्रविष्ट होकर मुझे तेजस्वी और श्रेष्ठ बना रहा है। मेरे अंतःकरण में ईश्वर के निवास के कारण मेरी बुद्धि निर्मल होती जा रही है। मैं  महान सोच का स्वामी बनता जा रहा हूँ। महानता मेरे जीवन का लक्ष्य बन रहा है। ईश्वर के मेरे अंतःकरण में प्रविष्ट होने से मैं  तेजस्वी, श्रेष्ठ और दिव्य बनता जा रहा हूँ। मैं सद् मार्ग का अनुसरण कर रहा हूँ। विश्व की महानतम शक्ति मुझ पर बरस रही है और मैं मेरे परम लक्ष्य की और बढता जा रहा हूँ।

(3.1.7) Gayatri Mantra, Kyon / Why to Jap Gayatri Mantra

Gayatri mantra ka jap kyon karen गायत्री मंत्र का जप क्यों करें 

शब्दों  की  शक्ति को  प्रतिदिन के  जीवन में अनुभव किया जाता रहा हैं। शब्दों  से व्यक्ति को क्रोधित किया जा सकता हैं, व्यथित किया जा सकता हैं, प्रसन्न किया जा सकता हैं। इसी प्रकार मन्त्र एक या एक से अधिक शब्दों का समूह होता हैं जिसका श्रद्धा व निष्ठा के साथ मनन व चिंतन किया जाए तो एक विशिष्ठ वातावरण निर्मित होता हैं। इसका मनन व चिंतन करने वाला व्यक्ति अपने अन्दर व अपने आस-पास इस  को अनुभव कर सकता हैं। जब  व्यक्ति  किसी विचार का बार-बार मनन करता हैं तो उसका उस पर प्रभाव पड़ता हैं। इसलिए मनोवैज्ञानिकों की राय हैं कि व्यक्ति वैसा ही बनता है जैसा वह सोचता हैं और चिंतन करता हैं। उसकी सफलता, आचरण, व्यवहार उसकी सोच व चिंतन से प्रभावित होते हैं। मंत्र इष्ट शक्ति का सूक्ष्म स्वरुप होता हैं। जिसके बार बार मनन करने व इष्ट के स्वरुप का ध्यान करने से साधक की चित्तवृत्तियाँ, स्वभाव आदि उसी मंत्र के गुण धर्म के अनुरूप बन जाते हैं। लेकिन मंत्र का जप शब्दों के बार बार दोहरान तक सीमित नहीं है, यह जप तब प्रभावी होता है जब इसके साथ  भावना जुड़ जाएँ। यह भावना श्रद्धा और विश्वास की होती है। इसी भावना से उस मंत्र जप का फल व प्रभाव देखा जा सकता है। शारीरिक व मानसिक शुद्धता तथा संयम भी मंत्र जप के फल में वृद्धि करतें हैं। मंत्र जप से साधक के  शरीर में एक प्रकार की उर्जा उत्पन्न होती है इस उर्जा को साधक अपने हित में तथा अन्य लोगों के हित में उपयोग कर सकता है। प्राचीनकाल में मंत्र शक्ति से अस्त्र-शस्त्र  चलाये जाते थे।गायत्री मंत्र सद् बुद्धि का मंत्र माना  गया है। इस मंत्र के अक्षरों में ज्ञान-विज्ञान तो भरा हुआ है इसके अतिरिक्त इस महामंत्र की रचना भी ऐसे विलक्षण ढंग से हुई है कि उसका उच्चारण एवं साधना करने से शरीर और मन के सूक्ष्म केन्द्रों में छिपी हुई अत्यंत महत्वपूर्ण शक्तियां जागृत होती हैं जिनके कारण देवी वरदानों की तरह सद् बुद्धि प्राप्त होती है। सद् बुद्धि द्वारा लाभ उठाना भी सरल है परन्तु असद् बुद्धि वाले के लिए यही बड़ा कठिन है कि वह अपने आप कुसंस्कारों को हटाकर सुसंस्कारित सद् बुद्धि का स्वामी बन जाये। इस कठिनाई का हल गायत्री महामंत्र की उपासना द्वारा होता है। जो इस साधना को करतें हैं वे अनुभव करतें हैं कि  कोई अज्ञात शक्ति रहस्यमय ढंग से उनके मन क्षेत्र में नवीन ज्ञान, प्रकाश, नवीन उत्साह आश्चर्यजनक रीति से  बढ़ा रही है।
(1) गायत्री, देवी तत्वों से परिपूर्ण बुद्धि का नाम है जिसकी प्रेरणा से मनुष्य का मष्तिष्क और शरीर कल्याणकारी मार्ग का अनुशरण करता है। जिसके हर कदम पर आनंद का संचार होता है। सात्विक विचार और कार्यों को अपनाने से मनुष्य की प्रत्येक शक्ति की रक्षा और वृद्धि होती है। उसकी प्रत्येक क्रिया उसे अधिक पुष्ट, शशक्त एवं सुदृढ़ बनाती है और वह प्रतिदिन अधिक शक्ति संपन्न बनता चला  जाता  है। मन में अपरिग्रह, परमार्थ, मैत्री, करुणा, नम्रता , धर्म, श्रद्धा, ईश्वर परायणता आदि की भावना विकसित होती  है। यह भावना जहाँ  रहती है वहाँ  के परमाणु सदैव प्रफुल्ल  और चेतन्य रहतें हैं  तथा उनका विकास  होता है। इस प्रकार गायत्री सद् बुद्धि देकर हमारी प्राण रक्षा का सेतु बनती हुई अपने नाम को सार्थक करती है। 
(2) गायत्री एक प्रकाश है, एक आशापूर्ण सन्देश है, एक दिव्य मार्ग हैं जो हमें समस्त भौतिक, आध्यात्मिक, सांसारिक और मानसिक आनंदों की खान तक ले जाता हैं। वह हमारे मूंदे हुए विवेक के तृतीय नेत्र को खोलती हैं। यह हमें सद् विवेकी बऩाती हैं जिससे हम इस संसार को देख सकें। 
(3) आत्मा में अनेक ज्ञान-विज्ञान, साधारण, असाधारण, अद् भुत, आश्चर्यजनक शक्ति के भण्डार छिपे पड़े हैं, गायत्री मंत्र के जप से वे खुल जातें हैं और जपकर्ता अपने को असाधारण शक्ति से भरा हुआ अनुभव करता है। 
(4) सिद्धियाँ प्राप्त करने के लिये बाहर से कुछ नहीं लाना पड़ता है केवल अंतःकरण पर पड़े हुए आवरण को हटाना पड़ता है। गायत्री की सतोगुणी साधना मानसिक अन्धकार के पर्दे को हठा देती है और आत्मा का सहज ईश्वरीय रूप प्रकट हो जाता है। आत्मा का यह  निर्मल रूप सभी रिद्धि सिद्धियों से परिपूर्ण होता है। 
(5) गायत्री साधना द्वारा हुई सतोगुणों की वृद्धि अनेक प्रकार की आध्यात्मिक और सांसारिक समृद्धियों को जन्म देती है। शरीर और मन  को  शुद्ध बनाती  है जिससे सांसारिक जीवन अनेक प्रकार से सुखी व शांतिमय बन जाता है। 
(6) गायत्री मंत्र जप आत्मा में विवेक और आत्मबल को बढाता  है जो अनेक ऐसी कठिनाइयों को जो दूसरों को पर्वत के सामान भारी मालूम पड़ती हैं, उस आत्मवान व्यक्ति के लिए तिनके के समान हल्की बन जाती हैं। उसका कोई कार्य रुका नहीं रहता या तो उसकी इच्छानुसार परिस्थितियाँ बदल जाती हैं या फिर परिस्थितिनुसार उसकी इच्छा बदल जाती है। क्लेश का कारण इच्छा और परिस्थिति के बीच प्रतिकूलता का होना ही तो है। विवेकवान इन दोनों में से किसी एक को अपनाकर उस संघर्ष को टाल  देता है और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। 
(7) गायत्री सद् बुद्धि की देवी है और साधक उससे सद् बुद्धि की प्रार्थना करता है। इस सद् बुद्धि द्वारा सभी प्रकार के दुखों को मिटाया जा सकता है। सद् बुद्धि के प्रकाश में वे सभी उपाय दिखाई देने लगतें हैं जिनको काम में लाने पर दुःख के कारण दूर हो जातें हैं।
(8) गायत्री साधना द्वारा मानसिक परिष्कार, व्यक्तित्व के विकास, दुखों के निवारण और आत्मिक विकास के दिव्य लाभों के अतिरिक्त कई सिद्धियाँ और शक्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। इन शक्तियों को क्रमशः अर्जित करते हुए व्यक्ति अनुपम, अद्वितीय व असाधारण व्यक्तित्व का स्वामी बन जाता है।

Thursday, 26 February 2015

(3.1.6) Ganga sagar Mela

 Ganga Sagar Fair
When is Ganga Sagar Fair held /गंगा सागर मेला कब आयोजित किया जाता है ? 
जिस दिन सूर्य धनु राशि को छोड़ कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं, उस दिन को मकर संक्रांति कहा जाता है।  इस मकर संक्रांति के दिन गंगा सागर मेला आयोजित किया जाता है।
Where is Ganga Sagar Fair held /गंगा सागर मेला कहाँ आयोजित किया जाता है ? 
पश्चिमी बंगाल में कोलकता के निकट हुगली नदी के तट पर, उस स्थान पर आयोजित किया जाता है जहा गंगा नदी बंगाल की खाड़ी में मिलती है। 
Importance of Ganga Sagar Fair / गंगा सागर का महत्व - 
पुराणों के अनुसार राजा सगर ने अश्व मेघ यज्ञ लिया था। जिसमें छोड़े गए घोड़े की रक्षा का भार  उसके साठ हजार पुत्रों को दिया था।  इंद्र ने कुटिलता वश उस घोड़े को चुरा लिया और कपिल मुनि के आश्रम पर बांध दिया। राजकुमार उस घोड़े को ढूँढते हुए कपिल मुनि के अाश्रम में पँहुचे और घोड़े को वहाँ  पाकर कपिल मुनि पर घोडा चुराने का आरोप लगाते हुए अपनी नाराजगी प्रकट की। उन की इस उदण्डता  से क्रोधित होकर कपिल मुनि सभी साठ  हजार राजकुमारों  को अपनी क्रोधाग्नि से जल कर भस्म कर दिया। इस पर सगर पुत्र अंशुमन  ने कपिल मुनि से क्षमायाचना  करते हुए राजकुमारों की मुक्ति का उपाय पूछा।  मुनि ने उपाय बताया कि यदि गंगा नदी को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाया जाये तो उसकी जल धारा के स्पर्श से ये मुक्त हो सकते हैं।  अंशुमन ने गंगा को लाने  के लिए तप  किया परतुं वे सफल नहीं हो सके।
भगीरथ ने गहन तपस्या की जिसके परिणाम स्वरूप गंगा पृथ्वी पर अवतरित हुई।  फिर कपिल मुनि के आश्रम पर आई और उसकी धारा ने राजकुमारों  की राख  का स्पर्श किया जिससे वे मोक्ष को प्राप्त हुए वह दिन मकर संक्रांति का दिन था।  अतः उसी दिन से वहाँ प्रतिवर्ष मेला आयोजित किया जाता है।  ऐसा  माना  जाता है कि इस दिन वहाँ किया गए स्नान और दिए गए दान का बहुत अधिक प्रतिफल प्राप्त होता हैं।  गंगा सागर की यात्रा सैंकड़ों तीर्थ यात्राओं  के समान मानी जाती है। इस लिए प्रतिवर्ष इस दिन बड़ी संख्यां में लोग यहाँ आते हैं और स्नान, पूजा-अर्चना करते हैं।

(3.1.5) Dwadash Jyotirling

द्वादश ज्योतिर्लिंग  Dwadash jyotirling
हिन्दू धर्मानुसार भगवान् शिव को प्रमुख देवताओं में गिना जाता है। भगवान् शिव अनादिकालीन वैदिक देवता हैं और इनकी लिंग पूजा भी सनातन है। लिंग का अर्थ है "चिह्न"।  शिवलिंग की आकृति ब्रह्माण्ड की ही आकृति है व ब्रह्माण्ड का एक मानचित्र है। चर चरात्मक सम्पूर्ण जगत ब्रह्मांड रूप शिवलिंग में है। एक शिवलिंग के पूजन से ही सूर्य, चन्द्रमा, विष्णु तथा लक्ष्मी इन सबकी पूजा हो जाती है। जैसे भगवान् विष्णु के अव्यक्त ईश्वर रूप की प्रतीक शालग्राम पिण्डी है वैसे ही भगवान् शिव के अव्यक्त ईश्वर रूप की प्रतिमा लिंग रूप पिण्डी है। मुख्य रूप से बारह ज्योतिर्लिंग है जिनके नाम निम्नानुसार है:- सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल्पर में  मल्लिकार्जुन, उज्जैन में महाकाल, ओंकारतीर्थ में परमेश्वर, हिमालय के शिखर पर केदार, डाकिनी में भीमशंकर, वाराणशी में विश्वनाथ,गोदावरी के तट पर त्रयम्बक, चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुकावन में नागेश, सेतुबंध में रामेश्वर तथा शिवालय में घुश्मेश्वर।
इनका विवरण निम्नानुसार है:-
1. सोमनाथ :- गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में स्थित है।
2. मल्लिकार्जुन:- आंध्र प्रदेश प्रान्त के कृष्णा जिले में कृष्णा नदी के तट पर श्री शैल पर्वत पर             श्री  मल्लिकार्जुन स्थित हैं।
3. महाकालेश्वर:- मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में शिप्रा नदी के तट पर उज्जैन में स्थित है।
4. ॐकारेश्वर:- मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में नर्मदा नदी के बीच द्वीप पर स्थित है।
5. केदारनाथ:- हिमालय के केदार नामक शिखर के पश्चिम की और मन्दाकिनी तट पर स्थित है।
6. भीमशंकर:- पूना से उत्तर की और भीमा नदी के तट पर सह्याद्री पर्वत स्थित है जिसके एक शिखर का नाम डाकिनी है जहाँ पर भीमशंकर ज्योतिर्लिंग स्थित है,  शिव पुराण की एक कथा के अनुसार भीमशंकर ज्योतिर्लिंग आसाम के कामरूप जिले में गोहाटी के पास ब्रह्मपुर पहाड़ी पर स्थित बताया जाता है, कुछ लोग  कहते है की नैनीताल जिले के उज्जनक नमक स्थान में एक विशाल शिव मंदिर है वही भीमशंकर का स्थान है।
7. काशी विश्वनाथ:- उत्तरप्रदेश के वाराणासी(काशी) में स्थित है।
8.  त्रयम्बकेश्वर:- महाराष्ट्र के नासिक जिले में ब्रह्मगिरी के निकट गोदावरी के तट पर स्थित है।
9. वैद्यनाथ:- झारखण्ड के संथाल परगाना क्षेत्र में देवघर(वैद्यनाथ धाम) पर स्थित है।
10. नागेश्वर:- गुजरात में बडौदा क्षेत्र में गोमती द्वारका से 12-13 मील की दूरी पर है तथा दारुकावन इसी का नाम है।
11. रामेश्वर:- तमिलनाडु के रमनद जिले में स्थित है।
12. घुश्मेश्वर:- महाराष्ट्र के दौलताबाद क्षेत्र में बेरुल गाँव के पास है जिसको शिवालय के नाम से भी जाना जाता है .

Thursday, 18 December 2014

(2.1.1) Vyavasaay aur Nishtha

व्यवसाय  के प्रति निष्ठा

कार्य संसार को गतिमान बनाये रखता है। परिवार, समाज, राष्ट्र और संसार की उन्नति व्यक्तियों द्वारा किये गए कार्य पर ही निर्भर करती है। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा किये गए कार्य का अपना अलग महत्त्व होता है। कार्य छोटा या बड़ा नहीं होता, कार्य के प्रति व्यक्ति का सोच छोटा या बड़ा हो सकता है-कार्य नहीं। किसी नगर का मेयर उस नगर का प्रथम व्यक्ति होता है जिसका कार्य नगर का विकास करना होता है परन्तु कल्पना करिये उस नगर के सफाई कर्मचारी अपना कार्य नहीं करें तो पूरा नगर दुर्गन्ध से भर जाएगा और यही स्थिति कुछ दिनों और चलती रहे तो कैसा लगेगा। यह स्थिति यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि सफाई कर्मचारियों का कार्य किसी भी अन्य कार्यों से कम महत्वपूर्ण नहीं होता है। यही बात प्रत्येक व्यवसाय पर लागू होती है।      
अतः व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने व्यवसाय के साथ सही भावना जोड़े। उसे दिव्य निर्देश मानकर करें। व्यवसाय के प्रति श्रेष्ठ भावना चमत्कारी परिणाम प्रकट करती है। यही भावना व्यक्ति को जीवन में आगे बढाती है और उसे ज्यादा जिम्मेदारी का निर्वहन करने के लिये पृष्ठभूमि निर्मित करती है तथ अन्य व्यक्तियों के मन में सम्मान की भावना उत्पन्न होती है।
एक बार पहाड़ी पर रहने वाला एक पंद्रह वर्षीय बालक अपने भाई को कपडे में पीठ पर बांधकर पहाड़ी के ऊपर बने हुए उसके घर ले जा रहा था। मार्ग में मिले पर्यटक ने आगे झुककर चलते हुए उस बालक को देखा और पूछा  "तुम इस बोझ को कहाँ ले जा रहे हो ?" बालक ने उत्तर दिया "यह बोझ नहीं, मेरा भाई है।" घटना बहुत छोटी है परन्तु इसमें बड़ा सन्देश है कि हम किसी भी कार्य को बोझ समझकर नहीं करें। यह बात हमारी सफलता का मापदंड बनती है तथा कार्य को पूर्णता तक पहुंचती है।
कुछ कार्य ऐसे हो सकते है जो हमें उबाने वाले प्रतीत हों परन्तु उसी कार्य को उत्साह और उल्लास की भावना के साथ करें तो वही कार्य सरस बन जाता है। राजस्थान में, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं,  जब खेत पर कार्य करती हैं तो कार्य को सरस  बनाने के लिए सामूहिक रूप से गीत गाती हैं। इससे श्रम से भरा कार्य पिकनिक की तरह लगाने लगता है।
जब कोई व्यक्ति किसी कार्य को प्रसन्नता, निष्ठा और ईमानदारी से करता है तो उस कार्य के साथ गरिमा  और बड़प्पन जुड़ जाता है तथा कार्य करने वाले का महत्त्व बढ़ जाता है क्योकि महत्त्व का सम्बन्ध कार्यप्रणाली से होता है। कार्य चाहे कितना भी बड़ा या छोटा हो उसे जिस शक्ति , भावना और उत्साह के साथ किया जाता है इसी से व्यक्ति के उद्देश्य  की श्रेष्टता निर्धारित होती है। यही श्रेष्टता व्यक्ति के कार्य को उच्चता प्रदान करती है जिससे वह सामान्य व्यक्ति से अलग दिखने लगता है। इसके विपरीत कार्य चाहे कितना ही बड़ा हो यदि उसे हीन भावना और घटिया उद्देश्य के साथ किया जाए तो वह घटिया और गौरवहीन बन जाएगा और यही स्थिति उस कार्य के कर्ता की भी  होती है।

(3.1.4) Hanuman ji aur Sindur

हनुमान जी के तेल - सिंदूर क्यों लगाया जाता है?

हनुमान जी के  सिंदूर क्यों लगाया जाता है इसकेलिए दो कथाएं प्रचिलित हैं -
(1) एक दिन हनुमान जी को भूख लगी तो वे सीधे माता जानकी के समीप गये  और बोले, "माँ मुझे भूख लगी है।  मुझे खाने के लिए  कुछ दीजिए।  " " मैं स्नान करके तुम्हे मोदक देती हूँ।"
माता के वचन सुन कर हनुमान जी राम नाम का जप करते हुए जानकी के स्नान कर लेने की प्रतीक्षा करने लगे।  स्नान जे बाद जानकी ने अपनी मांग में सिंदूर लगाया। हनुमान जी ने पूछा , " माता जी आपने यह सिंदूर क्यों लगाया है ? " जानकी ने उत्तर दिया , " इस सिंदूर के लगाने से तुम्हारे स्वामी की आयु वृद्धि होती है।" "सिंदूर लगाने से मेरे स्वामी की आयु बढ़ती है।" हनुमान जी मन ही मन सोचने लगे। फिर वे अचानक उठे और अपने  शरीर पर तेल लगा कर सिंदूर पोत  लिया।  हनुमान जी बड़े खुश थे कि इस सिंदूर लेप से मेरे प्रभु  की आयु वृद्धि हो जाएगी। इसी स्थिति में हनुमान जी प्रभु श्री राम की राज सभा में पहुंच गए। उन्हें सिंदूर लेपा  हुआ देख कर वहां  जोर का अट्टहास हुआ। भगवान श्री राम भी मुस्कुरा उठे।  उन्होंने हनुमान जी से पूछा, "हनुमान, आज तुमने अपने  शरीर पर सिंदूर क्यों लेप रखा है ?"
हनुमान जी ने हाथ जोड़कर उत्तर दिया, "प्रभो, माता सीता (जानकी) के तनिक सा सिंदूर लगाने मात्र से ही आपकी आयु में वृद्धि होती है, यह  जानकर आपकी अत्यधिक आयु वृद्धि  के लिए मैंने समूचे शरीर पर  सिंदूर लगाना प्रारम्भ कर दिया है।"  भगवान राम हनुमान जी के सरल भाव पर मुग्ध हो गए। उन्होंने घोषणा की, "आज मंगलवार है। इस दिन मेरे प्रिय  भक्त हनुमान जी को जो भी तेल और सिंदूर लगायेगा  उसे मेरी प्रसन्नता प्राप्त होगी और उसकी समस्त मनो कामनाओं की पूर्ति होगी।  "  (हनुमान अंक पेज 256 )
दूसरी कथा -
(2)  लंका विजय के बाद जब रामचन्द्र जी ने सुग्रीव आदि को पारितोषिक दिया था , उस समय सीता जी ने हनुमान जी  को  एक बहुमूल्य मणियों की माला दी थी।  परन्तु उस माला में श्री राम नाम नहीं होने से वे उदासीन ही रहे।  तब सीता जी ने उन्हें अपने सीमन्त का "सिंदूर" देकर कहा कि यह मेरा सौभाग्य चिन्ह है, इसको मैं  धन- धाम और रत्न आदि से भी अधिक प्रिय मानती हूँ , अतः तुम इसे स्वीकार करो।  " तब से हनुमान जी ने सिंदूर को अंगीकार कर लिया। इसी हेतु उपासक हनुमान जी की प्रतिमा के तेल मिश्रित सिंदूर का लेप करते हैं।   (हनुमान अंक पेज 487 )

Sunday, 30 November 2014

(1.1.2) Aprapt ki Chahat

अप्राप्त की चाहत                           

(For English translation click here)
व्यक्ति प्राप्त वस्तु से संतुष्ट  नहीं रहता है। वह अप्राप्त वास्तु को पाना चाहता है। इसी चाहत से मानव-जाति ने प्रगति भी की है। परन्तु पाने की चाहत अनियंत्रित हो जाए तो यह विपरीत प्रभाव डालती है और दुःख का कारण बनती है। संसार अनन्त सुन्दर वस्तुओं से भरा पड़ा है। जब व्यक्ति किसी एक वस्तु को प्राप्त कर लेता है तो उसे किसी दूसरी वस्तु की कमी का अनुभव होने लगता है। यही क्रम निरंतर चलता रहता है। परिणामस्वरूप व्यक्ति दुःख और निराशा का अनुभव करता है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि किसी नयी वस्तु को पाने का प्रयास ही नहीं किया जाए बल्कि तात्पर्य यह है कि जो वस्तु पहले से ही हमारे पास है उसका श्रेष्ठ उपयोग करें।
 यदि  हम अपनी स्थिति पर विचार करें तो हमें अनुभव होगा कि हमारे पास जितना भी है उससे हमें संतोष नहीं है, बल्कि जो हमारे पास नहीं है उसे पाने के प्रयास में हम दुखी होते है और प्राप्त का सही उपयोग, उपभोग नहीं  करते   हैं । परन्तु यह आवश्यक नहीं है कि अप्राप्त वस्तु को पाने के बाद हम सुखी हो जायेंगे और नयी वस्तु को पाने की इच्छा नहीं रह जायेगी। अतः अपनी स्थिति पर संतोष करना ही सुखी होने का सर्वोत्तम उपाय है। व्यक्ति सुख पाने के प्रयास में अपने आप को धोखा देता है। वह सुख को अनावश्यक ही उलझन और ज टिलता से भरी हुई वस्तु बना देता है। जब कि सच्चा सुख सरलता, सादगी, मन की सहज और सकारात्मक भावनाओ में है।
"हम दूसरोंकी तुलना में ज्यादा अच्छी स्थिति में रहें" यही भावना हमारे मन में क्लेश और दुःख उत्पन्न करने वाली होती है। इसी भावना के कार ण  हमारा मन बैचेन और उदास रहने लगता है। हम हमारे पास बहुत कुछ होते हुए भी दूसरों से ज्यादा पाने या अच्छा करने की लालसा में अशांति और असंतुष्टि का अनुभव करते हैं। यही भावना ईर्ष्या और द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाओ की जन्मदायिनी बन जाती है।  इसके अतिरिक्त हम कित ना  भी प्राप्त कर ले फिर भी किसी न किसी वस्तु का अभाव हमेशा रहेगा और यह स्थिति हमारे दुःख का कारण बनती है। अतः सुखी होने के लिए श्रेष्ठ यही है कि हम अपनी प्राप्त वस्तुओ का उत्तम से उत्तम उपयोग करें और उन्ही से संतुष्ट रहें न कि अप्राप्त वस्तुओं की चाहत में दुखी होवें ।

Saturday, 29 November 2014

(3.1.3) Hanuman ji ka Janm ( Birth of Hanuman)


The Birth of Hanuman ji. / हनुमान जी का जन्म 

कपिराज केसरी अपनी पत्नी अंजना के साथ सुमेरू पर्वत पर निवास करते थे।  अंजना ने पुत्र की प्राप्ति के लिए सात सहस्त्र वर्षों तक भगवान् शिव की उपासना की।  प्रसन्न होकर आशुतोष ने अंजना से वर मांगने  के लिए कहा।  अंजना ने भगवान् शिव के चरणों में प्रणाम कर अत्यंत विनयपूर्वक याचना की - "करूणामय शम्भो, मैं समस्त गुणों से संपन्न योग्यतम पुत्र चाहती  हूँ। "
भगवान् भोले नाथ ने कहा, " एकादश रूद्र के रूप में मेरा अंश ग्यारहवां रूद्र रूप ही तुम्हारे पुत्र के रूप में प्रकट होगा। तुम मंत्र ग्रहण करो।  पवन देवता तुम्हे प्रसाद देंगे।  पवन के उस प्रसाद से ही तुम्हे सर्वगुण संपन्न पुत्र की प्राप्ति होगी।  भगवान् शिव अंतर्ध्यान हो गये और भगवती अंजना अंजली पसारे शिव प्रदत्त मंत्र का जप करने लगी।  उसी समय एक गृध्री कैकयी के भाग का पायस लिए आकाश में उड़ती जा रही थी।  सहसा झंझावात आया, गृध्री का अंग सिकुड़ने लगा और पायस उसकी चोंच से नीचे गिर गया। पवन देव ने उसे अंजना की अंजलि में डाल दिया।  भगवन शंकर पहले ही यह सब बता चुके थे। इसलिए अंजना ने तुरंत पवन प्रदत्त चरु अत्यंत आदरपूर्वक ग्रहण कर लिया और वे गर्भवती हो गयी।  
चैत्र शुक्ल पूर्णिमा मंगलवार को भगवान् शिव अपने  आराध्या देव श्री राम की मुनि-महमोहिनी अवतार लीला के दर्शन एवं उसमें सहायता प्रदान करने के  लिए अपने अंश ग्यारहवें रूद्र से इस शुभ तिथि और शुभ मुहूर्त में माता अंजना के गर्भ से पवन पुत्र महावीर हनुमान के रूप में धरती पर अवतरित हुए।  
कल्प भेद से कुछ लोग इनका प्राकट्य काल चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन मघा नक्षत्र में मानते है , कुछ कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को और कुछ कार्तिकी पूर्णिमा को पवन पुत्र का जन्म  मानते है। कोई मंगलवार तो कोई शनिवार उनका जन्म  दिन स्वीकार करतें है।  
भाग्यवती धरित्री पर हनुमान जी के चरण रखते ही माता अंजना और कपिराज केसरी के आनंद की तो सीमा नहीं रही।  देवगण ,ऋषिगण, कपिगण, पर्वत, प्रपात, सर, सरिता, समुद्र, पशु-पक्षी और जड़-चेतन ही नहीं, स्वयं माता वसुंधरा पुलकित हो उठी। सवत्र हर्ष एवं उल्लास फैला हुआ था।  चतुर्दिक  आनंद का साम्राज्य व्याप्त हो गया था।

(3.1.2) Aarti / Aarti Kya Hai

आरती / आरती क्या है ? (What is Aarti )


आरती शब्द का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है।  १. हिन्दू पूजा के भाग के रूप में, २. गायन के रूप में। 
हिन्दू पूजा विधि में सोलह उपचार होतें है।  आरती भी उनमे से एक है।  किसी देवता के प्रति सम्मान व श्रृद्धा प्रकट करने के लिए लय बद्ध  गायन  के लिए भी 'आरती ' शब्द का प्रयोग किया जाता है।  आरती को 'आरात्रिका' या 'आरार्तिका' या 'नीराजन ' भी कहा  जाता है । 
Why is Aarti Performed ? (आरती क्यों की जाती है?)
आरती षोड्शोपचार पूजा का एक भाग है।  ऐसा मना माना जाता है कि किसी देवता की पूजा विधि पूर्वक करने के उपरान्त भी कोई त्रुटि रह सकती है। आरती से उस रही हुई त्रुटि की पूर्ति हो जाती है।  
स्कन्द पुराण के अनुसार -
"मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत् पूजन हरे:।
सर्वे संपूर्णतामेति कृते नीराजने शिवे।।
अर्थात मंत्र हींन  और क्रियाहीन  होने पर भी नीराजन  (आरती ) कर लेने से उसमे सारी पूर्णता आ जाती है। 
How is Aarti Performed ? (आरती कैसे की जाती है ?)
ढ़ोल, नगाड़े, शंख, घड़ियाल, आदि महावाद्यो तथा जय-जय कार शब्द के साथ घी से या कपूर से विषम संख्या में बत्तियां जलाकर आरती करनी चाहिए।  सामान्यतया पाँच बत्तियों से आरती की जाती है।  इसे "पंच प्रदीप "  कहते है। एक, सात या इससे अधिक बत्तियां जलाकर भी आरती की जा सकती है।  आरती के पांच अंग होते है।  प्रथम दीपमाला के द्वारा, दूसरे जलयुक्त शंख से, तीसरे धुले हुऐ वस्त्र से, चौथे आम या पीपल आदि के पत्ते से और पांचवे साष्टाँग दण्डवत से आरती की जाती है। आरती करते समय सर्व प्रथम भगवान की प्रतिमा के चरणों में उसे चार बार घुमाएं, दो बार नाभि देश में, एक बार मुख मंडल पर और सात बार समस्त अंगो पर घुमाएं।यथार्थ में आरती पूजा के अंत में इष्ट देव की प्रसन्नता हेतु की जाती है। इसमें इष्ट देव को  दीपक दिखाने के साथ ही उनका  स्तवन और गुणगान भी किया जाता है।
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(3.1.1) Prarthana (Prayer)

Prarthana Kya Hai (प्रार्थना क्या है ?)
प्रार्थना का लाभ क्या है ?

प्रार्थना  ईश्वर  के प्रति अंतर आत्मा   से निकली हुई पुकार है . इस पुकार में बनावटीपन  नहीं होता है . हृदय   की गहराई  से निकली  हुई पुकार कभी भी निष्फल नहीं होती क्योकि इसमें गहन आस्था और प्रबल विश्वास होता है . इसका परिणाम हमेशा सकारात्मक होता है . हमारे प्राचीन ग्रंथो में भक्तो के द्वारा  की गयीअंतर आत्मा  की पुकार और  ईश्वर द्वारा उस पुकार के प्रत्युतर के कई उदाहरण  है . जब ये पुकार द्रोपदी ,मीरा ,प्रहलाद , आदि के श्रद्धा ,आस्था व विश्वास  से भरे हृदय  से निकली तो भगवान ने उनकी सहायता की।
  जब व्यक्ति मन और वाणी को एक करके विश्वास के साथ किसी सकारात्मक  मनोकामना  के लिए प्रार्थना करता है तो ईश्वर  उस पवित्र ह्रदय से निकली हुई प्राथर्ना को स्वीकार करता है . प्रार्थना के माध्यम से व्यक्ति पर ईश्वरीय प्रेम और कृपा की  वृष्टि   होती है . यह कृपा वृष्टि  व्यक्ति को कष्टों से छुटकारा दिलाती है और सही मार्गदर्शन प्रदान करती है .
  यह सार्वभोमिक तथ्य है की जब व्यक्ति के लिए संपूर्ण मार्ग बंद हो जाते है तो केवल प्राथर्ना का मार्ग ही बचा रहता है .एशिया में ही नहीं बल्कि यूरोप और अमेरिका में भी प्राथर्ना को लेकर शोध किये गए है . जिन बीमार व्यक्तियों के लिए प्रार्थना की गयी उनकी शारीरिक और मानसिक व्याधिया तुलनात्मक रूप से शीघ्र दूर हुई है .
 प्रार्थना व्यक्ति की समस्याओ का विधेयात्मक   समाधान है।  प्रार्थना व्यक्ति के मन को नियंत्रित करती है। उसके चित्त की शुद्धि करती है, चेतना परिष्कृत और विकसित होती है। प्रार्थना देवत्व की अनुभूति का श्रेष्ठ माध्यम है। सच्ची श्रद्धा तथा विश्वास से युक्त प्रार्थना करने से ह्रदय में शान्ति की  धारा  प्रवाहित होती है तथा आत्मा में आनंद की वृष्टि होती है। व्यक्ति की शुभ और कल्याणकारी कामना अवश्य पूर्ण होती है। अंतःकरण को मलीन बनाने वाली कुत्सित भावनाओ तथा स्वार्थ एवं संकीर्णताओं से छुटकारा मिलता है। शरीर स्वस्थ तथा परिपुष्ट, मन सूक्ष्म तथा उन्नत और आत्मा पवित्र तथा निर्मल हो जाती है। दुःख के स्थान पर सुख का आनंद प्राप्त होता है। प्रार्थना व्यक्ति में यह भाव उत्पन्न करती है कि वह समस्या का सामना करने के लिए अकेला नहीं है बल्कि उसके साथ दिव्य शक्ति भी है।
भिन्न-भिन्न धर्म के अनुयायी भिन्न-भिन्न तरीकों से प्रार्थना करते हैं परन्तु सभी धर्मो में प्रार्थना का एक ही लक्ष्य है ईश्वर से निकटता, उसका सानिध्य, उसकी कृपा दृष्टि और उसका मार्गदर्शन प्राप्त करना। प्रार्थना करने के लिए किसी निश्चित औपचारिकता की आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना के लिए कुछ समय तक शांत होकर बैठे, अपने मन को ईश्वरीय सत्ता पर केन्द्रित कीजिये। सहज भाव से ईश्वर के अस्तित्व के बारे में सोचिये। ईश्वर से  सरल और स्वाभाविक तरीके से बात करिए क्योंकि उससे बात करने के लिए औपचारिक शब्दों की आवश्यकता नहीं है। प्रार्थना करते समय आश्वस्त होइए कि ईश्वर आपके साथ है और वह आपकी सहायता कर रहा है। वह आपकी ओर दिव्य शक्ति प्रवाहित कर रहा है, शुभाशीष दे रहा है तथा आपकी कल्याणकारी प्रार्थना को स्वीकार कर रहा है।
प्रार्थना का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल है। प्रार्थना से दिन की शुरुआत करने से व्यक्ति के मन में उत्साह, उल्लास व आत्मविश्वास भर जाता है। लेकिन ईश वंदना करने का सबसे अच्छा समय होता है जब व्यक्ति का मन प्रार्थना करने का होता है। इस स्थिति में व्यक्ति ईश्वर के निकट होता है। दिन रात में किसी भी समय चाहे आप यात्रा कर रहे हो, अपना कार्य प्रारंभ कर रहे हो, कुछ क्षणों के लिए आप अपनी आँखें बंद कर लो और ईश्वर से सहज शब्दों में प्रार्थना करो इससे आपको ईश्वर की समीपता का आभास होगा और दिव्य ज्योति आपको सही मार्ग दिखाती हुई प्रतीत होगी। विशेष रूप से जब आप विपदा में हो और कोई अन्य उपाय नहीं सूझ रहा हो तो ईश्वर से की गयी प्रार्थना के परिणामस्वरूप दिव्यज्योति से निकली हुई आशा की किरण दिखाई देगी। इस किरण में सन्देश होगा कि जो मनुष्य के लिए असंभव है वह ईश्वर के लिए संभव है।
प्रार्थना के बारे में महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आप किसी कार्य के लिए प्रार्थना कर रहे है और ईश्वर आपकी प्रार्थना को स्वीकार कर रहा है लेकिन साथ ही  यह  संदेह या भय आपके मन में उत्पन्न हो जाए कि आपकी प्रार्थना अनसुनी रह जायेगी या इस प्रार्थना के अनुरूप कार्य नहीं होगा या प्रार्थना से कुछ भी नहीं होने वाला है तो निश्चित मानिए कुछ नहीं होगा तथा आपकी प्रार्थना व्यर्थ जायेगी। प्रार्थना का फल इस बात पर निर्भर करता है कि आप प्रार्थना के अनुरूप कितने फल की आशा करते है। आपमें स्वयं पर, प्रार्थना पर और आराध्यदेव पर जितना ज्यादा विश्वास होगा प्रतिफल उतना ही ज्यादा  मिलेगा।