Thursday, 30 June 2016

(3.1.28) Favourite flowers of Lord Ganesh / Ganesh ji ke Priya Pushp

What are the favourite flowers of Lord Ganesh? Dear flowers to Ganesh Ji गणेश जी के लिए विहित पुष्प 

गणेश जी को तुलसी के अतिरिक्त सभी पुष्प प्रिय हैं।
गणेश जी को दूर्वा अधिक प्रिय है।  इसलिए इन्हें सफ़ेद या हरी दूर्वा चढ़ानी चाहिये।  दूर्वा की फुनगी में तीन या पाँच पत्ती होनी चाहिये।
गणेश को तुलसी अर्पित नहीं करनी चाहिये। पद्म पुराण , आचार रत्न के अनुसार "न तुलस्या गणाधिपम" तुलसी से गणेश जी की पूजा कभी नहीं करनी चाहिए।  कार्तिक माहात्म्य के अनुसार - गणेश जी की तुलसी पत्र से और दुर्गा की दूर्वा से पूजा न करें।
गणपति को नैवेद्य में लड्डू अधिक प्रिय हैं।
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(14.1.1) Lord Ganesh, Ganesh Mantras and Ganesh Stotras

Tuesday, 24 May 2016

(3.1.27) ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं Om Poonarnadah Poornamidam

Om Poornamadah Poornamidam "ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण

शान्ति पाठ -
"ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्ण मुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः। "
शब्दार्थ - 
ॐ = सच्चिदानन्दघनः। अदः = वह परब्रह्म। पूर्णम् = सब प्रकार से पूर्ण है।  इदम = यह (जगत भी)
पूर्णम् = पूर्ण (ही) है। पूर्णात् = उस पूर्ण (पर ब्रह्म ) से ही। पूर्णम् =यह पूर्ण।  उदच्यते = उत्पन्न हुआ है।
पूर्णस्य = पूर्ण के।  पूर्णम् = पूर्ण को। आदाय = निकाल देने पर भी।  पूर्णम् = पूर्ण। एव = ही।
अवशिष्यते = शेष रहता है।
अर्थ - वह (परब्रह्म ) सब प्रकार से पूर्ण है।  यह  (जगत ) भी पूर्ण ही है ; क्योंकि यह उस पूर्ण (परब्रह्म ) से ही उत्पन्न  हुआ है।  पूर्ण से पूर्ण को निकाल देने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है।
त्रिविध ताप की शांति हो। (for English translation click here

Sunday, 22 May 2016

(2.2.4) Rigved ki Sooktiyan

Rig ved ki sooktiyan ऋग वेदीय सूक्तियाँ 

> परिश्रम किये बिना देवता भी सहायक नहीं होते हैं।
> जो जाग्रत रहता है, उसे ऋचाएँ चाहती हैं।
> इस लोक में कर्मशील रहते हुए ही सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें।
> मेरे दाहिने हाथ में कर्म है, तो बायें हाथ पर सफलता रखी है।
> सभी दिशाएँ हमारे लिए मित्र हो।
> सौ हाथों से संग्रह करो तथा हजार हाथों से दान दो।
> क्या उचित है और क्या अनुचित है, यह विचार कर जरूरी कार्य पहले कीजिये।
> मानव जीवन श्रेष्ठ और बड़ा बनने के लिए है। हमें चाहिये की हम सदा उन्नति और प्रगति की ओर कदम रखें, ऊँचे उठते रहें।
> कायर मत बनो। उठो, होश संभालो।

Saturday, 21 May 2016

(3.1.26) Importance of Mahashiva Ratri (Mahashivratri ka Mahatva)

Maha Shivaratri ka Mahatva / Shivaratri Vrat / Phalgun Krishna Chaturdashi and Shiva Ratri महा शिवरात्रि का महत्व 

महा शिव रात्रि व्रत का महत्व -
भगवान् शिव को प्रसन्न करने व अपनी मनोकामना पूर्ण करने का महोत्सव है , महा शिव रात्रि। इसके ठोस प्रमाण शिव पुराण  व स्कन्द  पुराण  में देखने को मिलते हैं।स्कंद पुराण का कथन है कि फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को शिव जी का पूजन , जागरण व उपवास करने वाले व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं होता है। उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। विद्येश्वर संहिता के अनुसार महा शिव रात्रि के दिन जो प्राणी निराहार व जितेन्द्रिय रह कर उपवास रखता है, शिव लिंग के दर्शन , स्पर्श करता है वह जन्म मरण के बंधन से मुक्त होकर शिवमय हो जाता है। इस दिन भगवान् शिव की पूजा अर्चना करने से साधुओं को मोक्ष प्राप्ति , रोगियों  को रोगों से मुक्ति तथा सभी साधकों को मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस दिन पूजा करने से गृहस्थ जीवन में चल रहा मत भेद समाप्त हो जाता है, अखंड सौभाग्य की  प्राप्ति होती है और साधक को शुभ फलों की प्राप्ति होती है।
 फाल्गुन कृष्णा चतुर्दशी को ही शिवरात्रि का पर्व क्यों ?
भारतीय पंचाग के अनुसार प्रतिपदा से लेकर सोलह तिथियाँ हैं । जिस तिथि का स्वामी जो देवता होता है , उसी देवता का उस तिथि में व्रत पूजन करने से उसकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। चतुर्दशी तिथि के स्वामी भगवान् शिव हैं। इस लिए इस तिथि में भगवान् शिव की पूजा अर्चना करना उतम माना जाता है। यदपि प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी शिव रात्रि होती है किन्तु फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के निशीथ ( रात्रि ) में " शिव  लिङ्ग तयोद्भूत: कोटि सूर्य समप्रभ:। ईशान संहिता के इस वाक्य के अनुसार ज्योतिर्लिंग का प्रादुर्भाव हुआ था, इस कारण यह महा शिव रात्रि मानी जाती है। 
 महाशिवरात्रि व्रत विधि -
महा शिव रात्रि के दिन प्रात: काल स्नान करके व्रत का संकल्प लें और भगवान् शिव की विधि विधान पूर्वक पूजा करें तथा सायं काल शिव मंदिर में जाकर , गंध , पुष्प , बिल्व पात्र , धतूरे के फूल , घृत मिश्रित गुग्गल की धूप , दीप, नैवैद्य और नीराजनादि आवश्यक सामग्री समीप रख कर रात्रि के प्रथम प्रहर में 'पहली', द्वितीय प्रहर में 'दूसरी', तृतीय प्रहर में 'तीसरी' और चतुर्थ प्रहार में 'चौथी' पूजा करें। चारों पूजा पञ्च- पोचार या षोडशोपचार , जिस विधि से बन सके समान रूप से करें और साथ में रूद्र पाठ आदि भी करें। इस प्रकार करने से पाठ , पूजा , जागरण व उपवास सभी संपन्न हो सकते हैं। शिव रात्रि के व्रत में कठिनाई तो इतनी है कि वेद पाठी विद्वान् ही यथा विधि संपन्न कर सकते हैं और सरलता इतनी है कि पढ़ा हुआ अथवा अनपढ़ , धनी  या निर्धन सभी अपनी - अपनी सुविधा व सामर्थ्य के अनुसार भारी समारोह के साथ  या थोड़े से गाजर , बेर , मूली आदि सर्व सुलभ फल फूल से भी पूजन किया जा सकता है और दयालु भगवान् छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी सभी पूजा से प्रसन्न हो जाते हैं। 

Wednesday, 30 March 2016

(1.1.15) Yaksh Ke Prashna aur Yudhishtir ke Uttar (in Hindi )

Yaksh Prashna यक्ष के प्रश्न और युधिष्ठिर के उत्तर 

पांडवों के वनवास की अवधि पूरी होने वाली थी।  एक दिन पांचों भाई ( युधिष्ठिर , अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव ) एक पेड़ के नीचे बैठे हुए थे।  उन्हें प्यास लगी। युधिष्ठिर ने  एक-एक करके सभी भाइयों को पास के जलाशय से पीने का पानी लाने हेतु भेजा।  लेकिन उनमें से कोई भी लौट कर नहीं आया।  युधिष्ठिर स्वयं सरोवर तक गये. उन्होंने वहां अपने भाइयों को मरे हुए देखा। तीव्र प्यास के कारण वे पानी पीने के लिए तालाब में उतरे. तभी उन्हें किसी की चेतावनी से भरी हुई वाणी  सुनाई दी - " यह सरोवर मेरा है।  मेरे प्रश्नों के उत्तर दिए बिना पानी मत पीओ।" युधिष्ठिर ने स्थिति को समझ लिया और प्रश्नों के उत्तर देने के लिए सहमत हो गए। तब यक्ष ने निम्नांकित  प्रश्न पूछे - 


1.  "मनुष्य को खतरे से कौन बचाता  है?' 
" साहस मनुष्य को खतरे से बचाता है।"
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2. "किस विज्ञानं के अध्ययन से व्यक्ति बुद्धिमान बनता है ?" 
"किसी विज्ञान या शास्त्र के अध्ययन से व्यक्ति बुद्धिमान  नहीं बनता है। व्यक्ति, बुद्धिमान व्यक्तियों के संसर्ग में रहकर बुद्धि प्राप्त करता हैऔर बुद्धिमान बनता है।"
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3. "भूमि से अधिक भार को सहन करने वाला कौन है ?"

"संतान को कोख में धरने वाली माता पृथ्वी से भी अधिक भार वहन  करती है।"
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4.  "आकाश से ऊँचा क्या है ?
  
"पिता।"  
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5.  "हवा से भी तीव्र चलने वाला कौन है ?"
"मन।"
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 6.  "यात्री का साथी कौन होता है ?"   
 "ज्ञान।"
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7. "घर में रहने पर मनुष्य का साथी कौन होता है ?"  

"उसकी पत्नी।"  
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8. "मृत्यु के बाद व्यक्ति के साथ कौन जाता है ?" 
"केवल धर्म  ही मृत्यु के बाद मनुष्य के साथ जाता है।"
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9. "प्रसन्नता क्या है ?" 

"प्रसन्नता सुआचरण का प्रतिफल है।"
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10. "किस के छूट जाने पर मनुष्य सर्वप्रिय बनता है ?"  

"अहं भाव से उत्पन्न गर्व के छूट जाने से मनुष्य सर्वप्रिय बनता है।"
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11. "किस वस्तु  के खो देने से व्यक्ति प्रसन्न होता है, न कि दुखी ?"  
  
"क्रोध के खो जाने से मनुष्य प्रसन्न व सुखी होता है।"
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12. " किस वस्तु के त्यागने से व्यक्ति धनवान बनता है ?"   

"लालच या लालसा के त्यागने से व्यक्ति धनवान बनता है।" 

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13. "किसी का ब्राह्मण होना किस बात पर निर्भर करता है ? उसके जन्म पर , उसके सद आचरण पर या विद्या पर ?"  

"जन्म या विद्या के कारण ब्राह्मणत्व प्राप्त नहीं होता है। ब्राह्मणत्व तो सदआचरण ( शील स्वभाव) पर ही निर्भर करता है।"   

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14. "इस संसार में सबसे बड़े आश्चर्य की बात क्या है ?" 

"प्रति दिन आँखों के सामने कितने ही प्राणियों को मृत्यु के मुँह में जाते देख कर भी बचे हुए प्राणी चाहते हैं कि वे अमर रहें ,यही महान आश्चर्य की बात है।"  
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युधिष्ठिर के द्वारा दिए गए प्रश्नों से यक्ष प्रसन्न हुआ और उसने सभी भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया।  

Saturday, 26 March 2016

(2.1.11) Chankya ka Safalta Mantra

 Safalata ka chankya sootra सफलता के लिए चाणक्य सूत्र :-


सिंहादेकं बकादेकं शिक्षेच्चत्वारि कुक्कुटात। 
वायसात्पंच शिक्षेच्च षट शुनस्त्रीणि गर्दभात। ( चाणक्य नीति 6/14)

सिंह (शेर) और बगुले से एक - एक, गधे से तीन, मुर्गे से चार, कौए से पाँच गुण और कुत्ते से छ: गुण सीखे जा सकते हैं। 
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1. कार्य छोटा हो या बड़ा, उसे एक बार हाथ में लेने के बाद पूरी शक्ति लगाकर करना चाहिए। यह  बात शेर से सीखी जा सकती है।  
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2. बुद्धिमान व्यक्ति को अपनी इन्द्रियों को वश  में करके देश, काल और अपने सामर्थ्य को अच्छी प्रकार समझ कर  एकाग्रता के साथ अपना कार्य करे, तो सफलता अवश्य प्राप्त होती है अर्थात  कार्य की सफलता के लिए कार्य को करते समय अपना सारा ध्यान उसी  ओर लगाना चाहिए। यह बात बगुले से सीखी जा सकती है।
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3. ब्रह्म मुहूर्त में जागना, रण में पीछे नहीं  हटना, बंधुओं में किसी वस्तु का बराबर वितरण करना और चढाई करके किसी से अपना भक्ष्य छीन लेना, ये चार बातें मुर्गे से सीखनी चाहिए। 
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4. एकांत में प्रणय करना, निर्भीकता, उपयोगी वस्तुओं का संग्रह करना, निरंतर सावधान रहना और दूसरों पर आसानी से विश्वास नहीं करना, ये पांच बातें कौए से सीखनी  चाहिए। 
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5. जब कुते को खाने को मिलता है, तो वह अधिक खा लेता है और उसे खाने के लिए कुछ भी नहीं मिले, तो भी वह संतोष कर लेता है। वह अच्छी और गहरी नींद सोता है परन्तु थोड़ी सी आहट  होने पर  भी वह एक दम जाग जाता है। स्वामी के प्रति वफादार रहता है और लड़ने में जरा भी नहीं घबराता है। ये छ गुण कुत्ते से सीखे जा सकते हैं। 
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6.अत्यंत थक जाने पर भी बोझ को ढोना, ठण्डे - गर्म मौसम की अनदेखी  करना, सदा संतोष पूर्वक अपने कार्य को  करना, ये तीन बातें गधे सीखी जा सकती है। 
जो व्यक्ति इन बीस गुणों को सीख लेता है, इन्हें अपने आचरण में ले आता है और उसी के अनुसार कार्य करता है वह सभी कार्यों और अवस्थाओं में विजयी होता है।

(1.1.14) Giridhar ki Kundaliyan (with Hindi translation)

Giridhar ki Kudaliyan in Hindi with meaning गिरिधर की कुण्डलियाँ हिंदी अर्थ सहित 

गिरिधर  की कुण्डलियाँ  और अन्योक्तियॉ लोक की कण्ठहार है।   इनमें सम्यक् जीवन - यापनके गुर , कंटकाकीर्ण जीवन - यात्राको सफल बनानेके विधि - निषेध सटीक दृष्टांतों सहित लक्षित होते हैँ । इनकी लोकनीतिपरक ये कुण्डलियाँ व्यक्तिको प्रमाद स्खलन और जगत - व्यवहार के कुचालों  के विरुद्ध सावधान करती हैं  और उसे सत्पथका निर्देश भी करती हैं।  जीवन में क्या काम्य - अकाम्य , वांछनीय - अवांछनीय , श्रेयस्कर एव त्याज्य है; गिरिधर की कुंड़लियाँ इनकी निर्दशिका है।  उदाहरणार्थ कुछ कुण्डलिया प्रस्तुत हैँ  -
साईं बैर न कीजिये , गुरू पंडित कवि यार।
बेटा बनिता पवरिया , यज्ञ करावनहार।
यज्ञ करावनहार राजमंत्री जो होई ।
विप्र , परोसी , वैद्य  आपको तपै  रसोई।
कह गिरिधर कविराय , युगनते यह चलि आई।
इन तेरह सों  तरह दिये बनि आवै साईं।
अर्थ - कवि गिरिधर के अनुसार  इन तेरह लोगोंसे कभी वैर नही बाँधना चाहिये - गुरु , विद्वान् , कवि , संगी - साथी , पुत्र , पत्नी , द्वारपाल , यज्ञ करानेवाला पुरोहित , राजमंत्री , ब्राह्मण , पडोसी , वैद्य और रसोई बनाने वाला।
साईं सब संसार में मतलब का व्यवहार।
जब लग पैसा गाँठ में, तब लग ताको यार।
तब लग ताको यार संगही संग में डोलें।
पैसा रहा न पास , यार मुख से नहिं बोलें।
कह गिरिधर कवि राय जगत यहि लेखा भाई।
बिनु बेगरजी प्रीति यार विरला कोई साईं।
अर्थ - कवि गिरिधर कहते हैं - दुनियाँ का सारा व्यवहार मतलब का है।  मित्र तभी तक साथ देता है और पीछे -पीछे घूमता है, जब तक उसका मतलब सधता है।  पैसा पास नहीं रहने पर वह मुँह से भी नहीं बोलता है।  दुनियाँ का यही नियम है।  निस्वार्थ प्रीति करने वाला तो कोई विरला ही देखा गया है। 

Monday, 15 February 2016

(3.1.25) Manas Pooja (in Hindi) Manas pooja kya hai

मानस पूजा / Manas Puja / What is Manas Pooja / Manas Pooja Vidhi 

ईष्ट देव अथवा किसी भी देवता की मन ही मन पूजा करना ही मानस पूजा कहलाती है   इसमें साधक अपने मन में पूजा करने की भावना करता है।  मानस पूजा में वास्तविक रूप में कुछ भी अर्पित नहीं किया जाता है।  केवल उस वस्तु को देवता को अर्पित करने की  भावना पूरी निष्ठा पूर्वक की जाती है।  जैसे ईष्ट देवता को पुष्प अर्पित करने के लिए , वास्तविक रूप से पुष्प अर्पित करने के स्थान पर , पुष्प चढाने या अर्पित करने की भावना मात्र की जाती है।  वस्तुतः भगवान को किसी वस्तु की आवश्यकता नहीं , वे तो साधक के भाव को महत्त्व देते हैं।
मानस पूजा विधि :- 
किसी शांत स्थान पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुँह करके बैठ जाएँ। जिस भी देवता की मानस पूजा करनी हो उस देवता का मन ही मन ध्यान करें तथा निम्नांकित उपचारों से मानस पूजा करें -
(१) ॐ लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि।
( प्रभो, मैं पृथ्वी रुपी गन्ध ( चन्दन) आपको अर्पित करता हूँ।)
(२) ॐ हं आकाशात्मकं पुष्पं  परिकल्पयामि।
( प्रभो, मैं आकाश रुपी पुष्प आपको अर्पित करता हूँ।)
(३) ॐ यं वाय्वात्मक धूपं परिकल्पयामि।
( प्रभो, मैं वायु देव के रूप में धूप  आपको अर्पित करता हूँ।)
(४) ॐ रं वह्नयात्मकं दीपं दर्शयामि।
( प्रभो, मैं अग्नि देव के रूप में दीपक  आपको प्रदान  करता हूँ।)
(५) ॐ वं अमृतात्मकं नैवेद्यं निवेदयामि।
( प्रभो, मैं अमृत के समान नैवेद्य आपको निवेदन करता हूँ।)
(६) ॐ सौं सर्वात्मकं सर्वोपचारं समर्पयामि।
( प्रभो, मैं सर्वात्मा के रूप में संसार के सभी उपचारों को आपके चरणों में समर्पित करता हूँ।)
इन मन्त्रों से भावना पूर्वक मानस पूजा की जा सकती है।
(For English translation Click here.)

Thursday, 28 January 2016

(3.1.24) Surya ke Barah naam (in Hindi) / Twelve names of sun in Hindi

Twelve names of sun god in Hindi / Dwadash Aaditya/ सूर्य के बारह नाम / द्वादश आदित्य 

सूर्यदेव पंच देवों में सम्मिलित हैं। सूर्यदेव ईश्वर का साक्षात स्वरुप हैं. सूर्य अन्धकार को दूर करके प्रकाश प्रदान करता है।  सूर्य  को अन्तःकरण  ज्ञान का प्रकाश प्रदान करने वाले और कर्म की प्रेरणा देने वाले देवता के रूप में माना जाता है।  सूर्य देव के कई नाम हैं।  सभी का अपना - अपना महत्व है।
सूर्य देव के बारह नाम इस प्रकार हैं -
(१) ॐ मित्राय नमः (२) ॐ रवये नमः (३) ॐ सूर्याय नमः  (४) ॐ भानवे नमः (५) ॐ खगाय नमः (६) ॐ पूष्णे नमः (७) ॐ हिरण्य गर्भाय नमः (८) ॐ मरीचये नमः (९) ॐ आदित्याय नमः (१०) ॐ सवित्रे नमः (११) ॐ अर्काय नमः (१२) ॐ भास्कराय नमः
इन बारह नामों का प्रतिदिन पाठ किया जा सकता है। इन्ही नामों को बोलकर सूर्य को अर्घ्य  भी दिया जा सकता है।  इन्ही बारह नामों से सूर्य नमस्कार भी किया जा सकता है। 
इन बारह नामों का पाठ करने, सूर्य को अर्घ्य देने या सूर्य नमस्कार करने से - आँखों की दृष्टि तीव्र होती है, आत्म बल बढ़ता है , शत्रु बाधा  से मुक्ति मिलती है, विद्या प्राप्त होती है और व्यवसाय में उन्नति होती है।  
महाभारत में वर्णित बारह आदित्य -
(१) इन्द्र (२) अर्यमा (३) धाता (४) त्वष्टा (५) पूषा (६) विवस्वान (७) सविता (८) मित्र (९) वरुण (१०) अंशु (११) भग (१२) विष्णु
अन्य ग्रंथो में वर्णित बारह आदित्य -
(१) इन्द्र
(२) धाता
(३) त्वष्टा
(४) पूषा
(५) अर्यमा
(६) भग
(७) विवस्वान
(८) विष्णु
(९) अंशुमान
(१०) पर्जन्य
(११) वरुण
(१२) मित्र



Monday, 25 January 2016

(3.1.23) Hanuman ji ke barah naam (Twelve names of Hanuman ji )in Hindi

हनुमान जी के  बारह नाम - भय  मुक्ति तथा कार्य  में सफलता हेतु ( Twelve names of Hanumanji - for getting rid of fear and getting success) 

(For English version Click here) 
महाबली  हनुमान जी  स्तुति सम्बंधित बारह नाम हैं , जिनके द्वारा उनकी स्तुति की जाती है।  इन  नामों के जप से व्यक्ति के समस्त भय दूर हो जाते हैं और हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है। (आनन्द रामायण ८/१३/८-११ )
हनुमानञ्जनीसूनुर्वायुपुत्रो  महाबलः। 
रामेष्ठः फाल्गुनसखः पिङ्गाक्षोSमितविक्रमः। 
उदधिक्रमणश्चैव सीताशोकविनाशनः। 
लक्ष्मणप्राणदाता च दशग्रीवस्य दर्पहा। 
एवं द्वादश नामानि कपीन्द्रस्य महात्मनः। 
स्वापकाले प्रबोधे च  यात्राकाले च यः पठेत्। 
तस्य सर्व भयं नास्ति रणे च विजयी भवेत्। 
राजद्वारे गह्वरे च भयं नास्ति कदाचनः। 
(आनन्द रामायण ८/१३/८-११ )
हिन्दी अर्थ - उपर्युक्त श्लोक के अनुसार हनुमान जी के निम्नांकित बारह नाम हैं -

(१) हनुमान  (२) अंजनी सूनु  (अंजनी सुत )(३) वायु पुत्र  (४) महाबल (५) रामेष्ठ  (राम जी के प्रिय ) (६) फाल्गुन सख (अर्जुन के मित्र )  (७) पिंगाक्ष (भूरे नैत्र वाले) (८) अमित विक्रम (९) उदधि क्रमण (समुद्र को अतिक्रमण करने वाले )(१०) सीता शोकविनाशन (सीता जी के शोक का नाश करने वाले ) (११ ) लक्ष्मण प्राणदाता (लक्ष्मण जी को संजीवनी बूटी द्वारा जीवित करने वाले ) (१२) दशग्रीव दर्पहा (रावण के घमंड को दूर करने वाले )
ये बारह नाम हनुमान जी के गुणों को प्रकट करते हैं। जो व्यक्ति इन बारह नाम वाले श्लोक का रात्रि  में सोने से पहले या प्रातः काल उठने पर अथवा यात्रा के समय पाठ करता है , उस व्यक्ति के समस्त भय दूर हो जाते हैं।  वह व्यक्ति युद्ध के मैदान में, राज दरबार में, या भीषण संकट  जहाँ कहीं भी हो, उसे कोई भय नहीं होता है.
यदि उपर्युक्त श्लोक का पाठ नहीं किया जा सके तो निम्नांकित नामों का जप किया जा सकता है -
(१) ॐ हनुमान  (२) ॐ अंजनी सूनु  (अंजनी सुत ) (३) ॐ वायु पुत्र  (४) ॐ महाबल (५) ॐ रामेष्ठ   (६) ॐ फाल्गुन सख   (७) ॐ पिंगाक्ष (८) ॐ अमित विक्रम (९) ॐ उदधि क्रमण (१०) ॐ सीता शोकविनाशन   (११ ) ॐ लक्ष्मण प्राणदाता  (१२) ॐ दशग्रीव दर्पहा
Note - (For English version Click here)