Wednesday, 21 September 2016

(8.1.2) Daha Mata Vrat tatha Pooja Vidhi (in Hindi) दशा माता व्रत

Dasha Mata Vrat tatha Pooja Vidhi दशा माता व्रत  तथा पूजा 

चैत्र मास के कृष्ण  पक्ष की दसमी को दशा माता का पूजन एवं व्रत किया जाता है।  होली के अगले दिन से ही इसका पूजा प्रारम्भ हो जाता है, जो दसवें दिन समाप्त होता है।  प्रतिदिन प्रात: स्त्रियां स्नानादि करके पूजन की सामग्री लेकर पूजन करती  है। सर्व प्रथम साठिया या स्वस्तिक का चिन्ह बनाया जाता है।  इसे दीवार पर ही बनाया जाता है।  इसे गणपति या गणेश का  प्रतीक माना जाता है।  इसे मेहँदी या कुमकुम से बनाया जाता है। इसके पास ही मेहंदी या कुमकुम से दस बिंदियाँ बनाई जाती जो दशा माता की प्रतीक हैं। 
स्वस्तिक तथा इन दस बिंदियों की रोली, मौली, चावल, सुपारी, धूप, दीपक, नैवैध्य से पूजन किया जाता है।  
पूजन के बाद  प्रतिदिन कथा कहने तथा सुनने का विधान है।  पहले दिन दशा  माता की दस कथाएं कही जाती है।  दूसरे दिन से नवें दिन तक सात कथाएं कही जाती है।और अंतिम दसवें दिन फिर से दस कथायें , कही जाती हैं।  इस दिन (दसमी ) को एक समय भोजन करके व्रत रखने का विधान है।  
दशा माता व्रत का महत्त्व :-
दशा माता का व्रत तथा पूजन प्रत्येक स्त्री -विधवा - सुहागिन सबको करनी चाहिए क्योंकि यह पूजन एवं व्रत घर की दशा  (स्थिति ) को सुखी समृद्ध रखने के लिए किया जाता है।  
दशा माता की बेल :-
इस पूजन में विशेष बात यह कि  एक धागे को हल्दी  में रंग कर उसके दस गांठे लगाई जाती है जिसे दशा माता की बेल कहा जाता है।  पूजन करते  समय इस बेल को  दशा माता के चढ़ाया जाता है तथा पूजा के बाद पिछले वर्ष पहनी गई बेल को खोल दिया जाता है तथा इस नई बेल को गले में धारण किया जाता है।  इसी प्रकार इस वर्ष धारण की  हुई बेल को अगले वर्ष उतार कर, पूजा करके नयी बेल धारण की  जाती है।

(8.1.1) Makar Sankranti /मकरसंक्रांति

Makar Sankranti मकरसंक्रांति / मकर संक्रांति का महत्व

मकर संक्रांति क्या है ?
सूर्य जिस राशि में स्थित हो , उसे छोड़कर जब वह दूसरी राशि में प्रवेश करे तो उस समय का नाम संक्रांति है। कुल बारह राशियाँ हैं इस लिए बारह संक्रान्तियाँ होती है। ऐसी बारह संक्रांतियों में मकरादि छ: और कर्क आदि छ: राशियों के योग काल में क्रमश: उत्तरायण और दक्षिणायण - ये दो अयन होते हैं । इस प्रकार सूर्य का धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करना मकर संक्रांति कहलाता है। इसी समय से सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण गति शील होते हैं। मकर संक्रांति के इस त्यौहार को थोड़े बहुत अंतर के साथ लगभग पूरे भारत में मनाया जाता है। उत्तर प्रदेश के कुछ भागों और बिहार में इसे 'खिचड़ी' के नाम से जाना जाता है। कर्नाटक , केरल और आन्ध्र प्रदेश में इसे 'संक्रांति' कहा जाता है। तमिलनाडु  में इसे पोंगल नामक उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
मकर संक्रांति की महत्वपूर्ण बातें / मकर संक्रांति का महत्व 
1.भारतीय पंचांग में तिथि आदि की गणना चन्द्रमा की स्थिति के आधार पर की जाती है जब कि संक्रांति का सम्बन्ध सूर्य से है इस लिए अन्य  त्यौहारों की दिनांक बदल जाती है लेकिन मकर संक्रांति  की दिनांक 14 जनवरी होती है।
2.मकर संक्रांति से सूर्य उत्तरायण हो जाता है जो छ माह तक रहता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन माना जाता है तथा दक्षिणायण  को देवताओं की रात्रि मानी जाती है। इसलिए कई धार्मिक कार्य उत्तरायण में ही किये जाते है।
3.मकर संक्रांति के बाद दिन बड़े होने लगते हैं  और रात्रि छोटी होने लगती हैं।
4.महाभारत के प्रमुख पात्र भीष्म पितामह को इच्छा मृत्यु का वरदान प्राप्त था। उन्होंने अपने सांसारिक शरीर को त्यागने के लिए उत्तरायण की प्रतीक्षा की और उत्तरायण काल  पर ही अपने प्राण त्यागे।
5.महाराज सगर के साठ हजार पुत्रों को मुक्ति प्रदान कराने हेतु महाराज  भागीरथ ने गहन तपस्या की और गंगा नदी को पृथ्वी पर लाये। मकर संक्रांति के दिन महाराज भागीरथ ने गंगा के पानी से तर्पण किया और अपने पूर्वजों को मुक्ति दिलाई। आज भी गंगा सागर में लोग स्नान करते हैं और अपने पूर्वजों  के लिए तर्पण करते हैं।
6.इस दिन लोग नदियों  और तालाबों में स्नान करते हैं और मंदिरों में अपने इष्ट देव के दर्शन व पूजा करते हैं।
7.इस दिन किये गए जप , तप , स्नान , दान ,तर्पण आदि का बहुत महत्त्व है। नदी के तट या सरोवर के तट पर दिए गए दान को ज्यादा अच्छा माना जाता है। 
8.इस दिन तिल के दान को अच्छा माना जाता है। लोग अपने सम्बन्धियों व मित्रों को तिल व गुड से बने हुए लड्डू देते हैं।

Tuesday, 20 September 2016

(8.6.1) Amavasya Kab Hai ? Amavasya dates (for this year)

Amavasya Kab Hai ? अमावस्या कब है ? Amavasya dates (this year) When is Amavasya ?

अमावस्या तथा पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व है।  ये दोनों तिथियाँ पर्व तिथियाँ हैं। इन दोनों तिथियों में किये गए दान - पुण्य आदि कर्मों का बहुत महत्व है। अमावस्या दो प्रकार की होती हैं - सिनीवाली और कुहू।
व्रत में परविद्धा अमावस्या अर्थात प्रतिपदा युक्त अमावस्या लेनी चाहिए। पूर्वविद्धा अमावस्या अर्थात चतुर्दशी युक्त अमावस्या को ग्राह्य नहीं माना जता है।
इस वर्ष स्नान - दानार्थ अमावस्या के लिए दिन तथा दिनांक जानने हेतु -
यहाँ क्लिक करें 

Monday, 19 September 2016

(7.3.1) Gaudhuli Vela kya hai (in Hindi) /गौधूलि वेला

Gau Dhuli Vela / गौ धूलि वेला / गौ धूलि वेला की अवधि / गौ धूलि वेला की शुभता 

गौ धूलि वेला क्या है 
गो धूलि वेला  से तात्पर्य उस  काल से है जब सूर्यास्त नहीं हुआ हो और गोचर भूमि से  चर कर लौटते हुए धेनु आदि पशुओं के पैरों से  रज  उछल कर आकाश में छा गई हो।
गो धूलि वेला  की शुभता :- गो धूलि बेला  को विवाह आदि  मांगलिक  कार्य के लिए श्रेष्ठ माना जाता है अत: यह बेला  विवाह आदि मांगलिक  कार्यों में लग्न, ग्रह , नवांश , मुहूर्त , लत्ता , पात , अष्टम  भाव तथा जामित्र आदि दोषों को नष्ट प्राय: कर देती है।
गो धूलि वेला  की अवधि :- भिन्न -भिन्न मतों के अनुसार गो धूलि वेला  का मान  इस प्रकार है -
1. सूर्य आधा अस्त हो जाये तब से पहले की आधी घटी और सूर्य अस्त होने के बाद की आधी घटी को गो धूलि वेला  लग्न माना  जाता है। कुल एक घटी अर्थात सूर्यास्त काल से बारह मिनट पूर्व व बारह  मिनट बाद तक का समय गो धूलि वेला होता है। गो धूलि वेला  का सम्बन्ध सूर्य के अस्त होने के समय से है अत: भिन्न - भिन्न स्थानों पर गो धूलि वेला लग्न अलग - अलग हो सकता है। इसलिए गो धूलि बेला  को जानने का सबसे अच्छा तरीका है - पंचांग में स्थानीय सूर्य के अस्त होने का समय देखकर , उसके बारह मिनट पहले और बारह मिनिट बाद तक का गो धूलि काल होता है।अधिकांश विद्वान इसी मत को मान्यता देते हैं।
2. कुछ अन्य विद्वान सूर्यास्त से चौबीस मिनट पहले व चौबीस मिनट बाद तक का दो घटी अर्थात अड़तालीस मिनट का समय गो धूलि काल मानते हैं।   गौधूलि वेला 
3. कुछ विद्वानों के अनुसार हेमंत ऋतु में  संध्या समय पूर्व जब सूर्य गोलाकार हो जाये , गर्मी में जब सूर्य आधा अस्त हो जाये तथा वर्षा ऋतु में सूर्य सम्पूर्ण अस्त हो जाने पर गो धूलि वेला  होती है।
गो धूलि वेला  की सीमा -
1.गुरुवार को सूर्यास्त के बाद तथा शनिवार को सूर्यास्त के पूर्व गो धूलि लग्न शुभ होता है।
2. यदि विवाह का शुद्ध लग्न मिल रहा हो तो उसका त्याग कर गो धूलि वेला को लेना उचित नहीं है।   

(6.4.1)Raksha pane hetu Hanuman Mantra (in Hindi) / Anjana garbh sambhoot

Hanuman Mantra for safety or protection / रक्षा पाने के लिए हनुमान मंत्र /Raksha hetu Hanuman Mantra / अंजना गर्भसंभूत 

हनुमान जी भगवान् राम के भक्त थे। यदि कोई व्यक्ति हनुमान जी से प्रार्थना करे तो वे उसकी प्रार्थना सुनते हैं और उसकी सहायता तथा रक्षा करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। निम्नाकित प्रार्थना का बार बार दोहरान  करने से व्यक्ति के संकट दूर होते हैं -    
अंजना गर्भसम्भूत कपीन्द्र सचिवोत्तम। 
राम प्रिय नमस्तुभ्यं हनुमन् रक्ष सर्वदा। 
अर्थ :- 'हे अञ्जना के गर्भ से उत्पन्न हुये , सुग्रीव के श्रेष्ठ मन्त्री , श्री राम के प्यारे हनुमान , आपको प्रणाम है। आप सर्वदा मेरी रक्षा करें। 

Sunday, 18 September 2016

(6.3.2) Durga ke 9 Roop / Nine forms of Durga (in Hindi)

Devi Durga ke 9 Roop / Nine forms of goddesses of Durga (in Hindi ) देवी दुर्गा के नौ रूप 

देवी दुर्गा के नौ रूप कौनसे हैं?
नवरात्रि के नौ दिनों में प्रतिदिन शक्तिस्वरूपा माँ दुर्गा के अलग - अलग नौ रूपों की पूजा की जाती है। इस पूजा से विशेष फल की प्राप्ति है। ये नौ रूप इस प्रकार हैं - 
(१) शैलपुत्री - माँ दुर्गा अपने पहले स्वरुप में शैलपुत्री के नाम से जानी जाती है। नवरात्र के प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा - अर्चना की जाती है। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इसका नाम शैलपुत्री पड़ा। 
(२) ब्रह्मचारिणी - नवरात्र पर्व के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा - अर्चना की जाती है। ब्रह्म का अर्थ है 'तपस्या ' और चारिणी का अर्थ होता है 'आचरण करने वाली '। वह अपने भक्तों को ज्ञान और बुद्धि प्रदान करती है।  
(३) चन्द्रघंटा - नवरात्र के तीसरे दिन माँ चन्द्रघंटा की पूजा-अर्चना की जाती है। इस देवी की आराधना से वीरता व निर्भयता के साथ सौम्यता व विनम्रता का विकास होता है। 
(४) कूष्माण्डा - नवरात्र के चौथे दिन माँ कूष्माण्डा की पूजा अर्चना की जाती है। 
(५) स्कंदमाता - नवरात्र के पाँचवें दिन माँ स्कंदमाता की पूजा अर्चना की जाती है। मोक्ष के द्वार खोलने वाली परम सुखदायी माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती है। 
(६) कात्यायनी - नवरात्र के छठे दिन माँ कात्यायनी की पूजा अर्चना की जाती है।देवी का यह रूप व्यक्ति में योग साधना उत्पन्न करता है।  
(७) कालरात्रि - नवरात्र के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा अर्चना की जाती है।वह राक्षसों और दुष्टों का नाश करती है और अपने भक्तों में निडरता उत्पन्न करती है।  
(८) महागौरी - नवरात्र के आठवें दिन माँ महागौरी की पूजा अर्चना की जाती है।महागौरी की उपासना से शक्ति और ऊर्जा प्राप्त होती है और समस्त पापों का नाश होता है।  
(९) सिद्धिदात्री -  नवरात्र के नवें दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा अर्चना की जाती है। इसकी उपासना से सभी प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं और लौकिक व पारलौकिक कामनाओं की पूर्ति होती है।
Related Posts -

(3.1.33) Kumari Poojan in Navratra / Kumari pooja ka Mahatva (in Hindi)

Kumari Poojan in Navratra / Navratri and Kumari Puja / कुमारी पूजन / नवरात्र में कुमारी पूजा 

कुमारी पूजा क्यों तथा कैसे
देवी व्रतों में कुमारी पूजन आवश्यक माना गया है। नवरात्र में कन्याओं को देवी का स्वरूप मान कर उनकी पूजा करना तथा श्रद्धा के साथ सामर्थ्य अनुसार उन्हें भोजन कराना और दक्षिणा देना अत्यंत शुभ और श्रेष्ठ माना जाता है।यदि सामर्थ्य हो तो नवरात्र पर्यन्त नौ दिन तक अथवा अष्टमी या नवमी को किसी एक दिन कन्याओं की पूजा करनी चाहिये। सर्व प्रथम कन्याओं के पैर धोकर उनकी गंध ,पुष्प आदि से पूजा करें फिर उन्हें मिष्ठान्न भोजन कराएं और दक्षिणा दें।
कन्याओं की संख्या एक से नौ तक हो सकती है। एक कन्या के पूजन से ऐश्वर्य की, दो से भोग और मोक्ष की, तीन से धर्म,अर्थ,काम की, चार से राज्य पद की पाँच से विद्या की , छः से षट्कर्म सिद्धि की, सात से राज्य की, आठ से सम्पदा की,और नौ से पृथ्वी के प्रभुत्व की प्राप्ति होती है।
कन्याओं की उम्र दो वर्ष से दस वर्ष तक की होनी चाहिये। दो वर्ष की लड़की - कुमारी, तीन की त्रिमूर्तिनी , चार की कल्याणी , पाँच की रोहिणी , छः की काली , सात की चण्डिका ,आठ की शाम्भवी , नौ की दुर्गा और दस की सुभद्रा स्वरुप होती है।  इससे अधिक उम्र की कन्या को कुमारी - पूजा में सम्मिलित नहीं करना चाहिये।
Related Posts -
(3.1.21) Navratra / Navratri 
=====
(3.1.32) Navratra men Ghat sthapana 
===
( 3.1.33) Kumari Poojan in Navratra
====

(3.1.32) Ghat Sthapana in Navratra / Kalash sthapana Vidhi in Navratra (in Hindi)

Navratri me Ghat Sthapana / Ghat Sthapana Vidhi /नवरात्र में घट स्थापना 

घट स्थापना कब की जाये - 
घट स्थापना या कलश स्थापना नवरात्र के प्रथम दिन की जाती है।घट स्थापना का समय प्रातः काल ही श्रेठ रहता है।  परन्तु उस दिन चित्रा नक्षत्र या वैधृति योग रात्रि तक रहे तो या तो वैधृति आदि के आद्य तीन अंश त्याग कर घट स्थापना करें या मध्यान्ह के समय अभिजीत मुहूर्त में घट स्थापना करें।
घट स्थापना कहाँ करें -
अपने घर के ईशान कोण ( उत्तर-पूर्व के बीच के कौने ) में करना सबसे श्रेष्ठ है। यदि ऐसा स्थान अपने घर या आवास में नहीं हो तो घट स्थापना ऐसे स्थान पर की जाये ताकि देवी का पूजन करते समय व्यक्ति का मुँह पूर्व की तरफ रहे।
घट  स्थापना / कलश स्थापना कैसे करें -
जब कलश स्थापना के स्थान का निश्चय हो जाए तब नवरात्रि के प्रथम दिन उस स्थान को साफ़ करें। नदी या झील की रेत या मिट्टी अथवा स्वच्छ स्थान की मिट्टी में जल मिलाकर वेदी का निर्माण करें।वेदी के ऊपर मिटटी या ताम्बे या चांदी के कलश को गंगा जल या साफ़ जल से भरकर स्थापित कर दें। कलश के मुँह पर श्री फल को लाल वस्त्र में लपेटकर अशोक के पत्तों सहित रख दें।  कलश पर स्वस्तिक  का चिन्ह बनाएं ,अक्षत व पुष्प अर्पित करें।  कलश के चारों ऒर जौ  के दाने बो दें। नौ दिन में ये जौ  के दाने चार या पांच इंच के पौधे  के रूप ले लेते हैं। इन पौधों को जवारा  कहा जाता है, जिनको नवरात्रि समाप्ति के दिन परिवार के लोगों तथा भक्तों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।  कलश को यथा विधि स्थापित करके गणेश आदि का पूजन किया जाता है।
मूर्ति / तस्वीर स्थापना -
माँ भगवती तथा श्री राम एवं श्री हनुमान जी की मूर्ति अथवा तस्वीर को घट  के पास चौकी पर लाल वस्त्र या आसन बिछाकर उसके ऊपर स्थापित करें। तस्वीर को चन्दन रोली का तिलक लगाकर अक्षत चढ़ाएं ,धूप ,दीप प्रज्वलित करे। 

(8.8.1) Navratra Vrat / Navratri Vrat / Navratri vrat vidhi (in Hindi)

Navratri vrat / Navratra Vrat  / Navratri Vrat Vidhi / नवरात्रि  व्रत/ नवरात्र व्रत  विधि / नवरात्र व्रत का फल (हिंदी में )

नवरात्र व्रत
हिन्दू धर्म के अनुसार नव रात्र की नौ दिन की अवधि बहुत ही शुभ और पवित्र मानी जाती है। एक वर्ष में चार बार नवरात्र आते हैं - चैत्र व आश्विन तथा आषाढ़ व माघ। इन चार में से प्रथम दो को प्रकट नवरात्र और शेष दो को गुप्त नवरात्र के रूप में जाना जाता है। परन्तु चैत्र और आश्विन के नवरात्र ही मुख्य माने जाते हैं। नवरात्र प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त होते हैं।
नवरात्र व्रत विधि तथा नवरात्र व्रत की मुख्य बातें :- 
(१) प्रतिपदा से नवमी पर्यन्त नवरात्रियों तक व्रत करने से 'नवरात्र ' व्रत पूर्ण होते हैं , तिथि के घटने या बढ़ने का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।
(२) वैसे तो चैत्र (वासंती ) नवरात्रों में विष्णु की और आश्विन (शारदीय ) नवरात्रों में शक्ति की उपासना का प्राधान्य है परन्तु ये दोंनों ही बहुत व्यापक हैं, अतः दोनों में दोनों की उपासना होती है।
(३) यदि कोई व्यक्ति नवरात्र पर्यन्त अर्थात प्रतिपदा से नवमी तक व्रत नहीं रख सके तो वह प्रतिपदा के सप्तमी तक 'सप्तरात्र'  या पंचमी से नवमी तक 'पञ्चरात्र' या सप्तमी,अष्टमी , नवमी तक 'त्रिरात्र' या प्रतिपदा व नवमी ,दो व्रतों से 'युग्म रात्र' या प्रतिपदा अथवा नवमी के एक व्रत से 'एकरात्र' के रूप में, जो भी किये जाएँ , उन्हीं से अभीष्ट की सिद्धि होती है।
(४) नवरात्र व्रत प्रारम्भ करते समय सर्व प्रथम गणपति , मातृका , लोकपाल , नवग्रह और वरुण का पूजन , स्वस्ति वाचन और मधुपर्क ग्रहण करके प्रधान मूर्ति की - जो राम, कृष्ण,लक्ष्मी ,शक्ति,भगवती, देवी आदि किसी भीअभीष्ट देव की हो,पूजा करें।
(५) कुमारी पूजन - देवी व्रतों में कुमारी पूजन आवश्यक माना गया है।  यदि सामर्थ्य हो तो नवरात्र पर्यन्त और न हो तो कुमारी के चरण धोकर उसकी गंध-पुष्प आदि से पूजा करके मिष्टान्न भोजन कराना चाहिये।
नवरात्र व्रत का फल - नवरात्र की नौ दिन की अवधि को आध्यात्मिक और नैतिक उन्नति की अवधि माना जाता है। नवरात्र व्रत, व्रती की आकांक्षाओं की पूर्ति करता है तथा इससे उसके कष्ट दूर होते हैं, और मानसिक बल और आत्म बल बढता है।

Saturday, 17 September 2016

(1.1.18) Kavi Ghagh ki Kahavaten / Ghagh Kavi (in Hindi )

Ghagh ki kahavate / Kavi Ghagh / घाघ कवि / घाघ की कहावतें 

* जेकर ऊँचा बैठना, जेकर खेत नीचान। 

ओकर बैरी का करै, जेकर मीत दीवान। 
अर्थ - जो ऊँचे लोगों के साथ उठता-बैठता हो, जिसका खेत निचान में हो और जिसके साथी बड़े लोग हों तो दुश्मन उसका क्या बिगाड़ सकेगा।

=============
* बाढ़ै पूत पिता के धर्मा, खेती उपजै अपने कर्मा। 
अर्थ - पुत्र पिता के धर्म से बढ़ता है और खेती अपने कर्म (परिश्रम) से होती है।
============
* जोइगर बँसगर बुझगर भाइ, तिय सतवन्ती नीक सुहाइ। 
धन पुत हो मन होइ विचार, कहैं घाघ ई 'सुक्ख अपार'।।  
 अर्थ - जिस घर में विवाहित, बलवान और समझदार भाई हो, सुन्दर और सती स्त्री हो। स्वयं पुत्रवान और सद्विचारवान हो तो, उस घर में अपार सुख प्राप्त होता है।
=========
* निहपछ राजा, मन हो हाथ। साधु परोसी, नीमन साथ। 
हुक्मी पूत, धिया सतवार। तिरिया भाई रखे विचार। 
कहै घाघ हम करत विचार।  बड़े भाग से दे करतार।।
अर्थ - राज्य का राजा न्यायी हो, मन अपने वश में हो, पडोसी सज्जन हो,उत्तम जनों का साथ हो, पुत्र आज्ञा पालक हो, पुत्री सचरित्रा हो, पत्नी और भाई उत्तम विचार के हों, ये सब बड़े भाग्य से मिलते हैं।
=========
* पूत न मानै आपन डॉँट, भाई लड़ै चहै नित बाँट। 
तिरिया कलही करकस होइ, नियरे बसल दुष्ट सब कोइ। 
मालिक नाहिंन करै विचार, घाघ कहैं ये विपति अपार। 
अर्थ - पुत्र आज्ञा कारी नहीं हो, सगा भाई अपना हिस्सा बाँटने हेतु झगड़ता हो, पत्नी कर्कशा और झगड़ालू  हो, पास- पड़ोस में दुष्टजन बसते हों, गृह स्वामी न्याय- अन्याय का विचार न करके कार्य करता हो तो उस घर में विपत्ति का डेरा समझना चाहिए।
======== 
* नसकट खटिया दुलकन घोर, कहैं घाघ यह बिपत क ओर। 
अर्थ- सोने के लिए अपनी लम्बाई से छोटी खाट हो और घोडा सीधी चाल न चलने वाला हो तो, जीवन में संकट ही संकट हैं।
========
ओछे बैठक, ओछे काम, ओछी बातें आठों जाम। 
घाघ बताये तीन निकाम, भूलि न लीजौ इनको नाम। 
. अर्थ - ओछे (हलके /नीच) स्तर  के लोगों के साथ उठना - बैठना, ओछे कार्य करना, और हमेशा ओछी बातें करना।  घाघ कवि के अनुसार ये तीनों ठीक नहीं हैं, इनको नहीं करना चाहिए।
=========
* एक तो बसो सड़क पर गाँव, दूजे बड़े बड़ेन में नाँव। 
तीजे परे  दरब से हीन, घग्घा हको विपता तीन। 
अर्थ - घाघ के अनुसार  सड़क पर का निवास, बड़े लोगों का साथ और धनहीनता - तीनों विपत्ति के कारण हैं।
========
* खेती पाती बीनती औ घोड़े की तंग। 
अपने आप संवारिए लाख लोग हो संग। 
अर्थ - घाघ कवि कहते हैं कि खेती का संचालन, पत्र लिखना, विनती करना तथा सवारी वाले घोड़े की सेवा-  ये सभी काम अपने हाथों ही करने चाहिए तभी इनमें सफलता मिलती है।
======