Saturday, 26 December 2015

(5.1.6) Surya Grahan /Solal Eclipse

सूर्य ग्रहण - संभावना,सूतक, पुण्य काल आदि

सूर्य ग्रहण क्या होता है –
सूर्य ग्रहण एक खगोलीय और प्राकृतिक घटना है. पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और चन्द्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है.इस प्रक्रिया में चन्द्रमा, सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है, जिससे सूर्य की चमकती हुई सतह आंशिक या पूर्ण रूप से ढक जाती है, इस स्थिति को सूर्य ग्रहण कहा जाता है .सूर्य ग्रहण की संभावना कब होती है
सूर्य ग्रहण सदैव अमावस्या को ही होता है, परन्तु प्रत्येक अमावस्या को सूर्य ग्रहण नही होता है. यह चन्द्रमा की गति व पृथ्वी की गति तथा पात अर्थात राहु –केतु पर निर्भर करता है.
सूर्य ग्रहण के लिए आवश्यक स्थितियाँ इस प्रकार हैं -
अमावस्या तिथि होनी चाहिए.
चन्द्रमा क्षीणतम होना चाहिए.
चन्द्रमा और राहु या केतु के रेखांश बहुत निकट होने चाहिये.
चन्द्रमा के अक्षांश लगभग शून्य होने चाहिए.
सूर्य ग्रहण कितने प्रकार का होता है – सूर्य ग्रहण तीन प्रकार का होता है –
(1)पूर्ण सूर्य ग्रहण – जब चन्द्रमा सूर्य को पूर्ण रूप से ढक लेता है तो, इस अवस्था को पूर्ण सूर्य ग्रहण कहा जाता है.
(2)खंड या आंशिक सूर्य ग्रहण – जब चन्द्रमा सूर्य के कुछ भाग को ढके तो, इस स्थिति को खंड सूर्य ग्रहण कहा जाता है.
(3)वलयाकार सूर्य ग्रहण – जब चन्द्रमा सूर्य को इस प्रकार ढके कि सूर्य बीच में से ढका हुआ दिखाई दे और उसके किनारों पर प्रकाश  का छल्ला बना हुआ दिखाई दे तो इस प्रकार के सूर्य ग्रहण को वलयाकार सूर्य ग्रहण कहा जाता है.
चूड़ामणि योग किसे कहते हैं – जब सूर्य ग्रहण रविवार में हो तो उसे चूड़ामणि योग कहा जाता है. सूर्य पुराण के अनुसार इस योग में सूर्य ग्रहण का फल बहुत अधिक होता है.
सूर्य ग्रहण का पुण्य काल –
जहाँ और जिस क्षेत्र में सूर्य ग्रहण दिखाई पड़े, वहीँ पुण्य काल होता है तथा उस क्षेत्र में  ही स्नान – दान, जप, पुण्य आदि करने का विधान है. जिस स्थान पर ग्रहण दिखाई नहीं दे तो, वहाँ धार्मिक दृष्टि से सूतक, स्नान, दान,पुण्य आदि नियम लागू नहीं होते हैं,
सूतक क्या होता है –
सूतक अशुभ काल होता है. यह सूतक ग्रहण स्पर्श के समय से बारह घन्टे पूर्व लग जाता है और ग्रहण के मोक्ष यानि समाप्ति के साथ ही सूतक समाप्त हो जाता है. सूतक लगने के पहले ही पानी, आटा,आदि खाद्य पदार्थों में कुशा (एक प्रकार की पवित्र घास) के तिनके रख देने चाहिए.
ग्रहण के पहले, ग्रहण के मध्य और ग्रहण समाप्ति पर क्या करें –
ग्रहण शुरू होने से पहले स्नान, ग्रहण के मध्य में हवन, पूजा पाठ, देवार्चन, और ग्रहण की समाप्ति के समय दान और ग्रहण समाप्त होने पर फिर स्नान करने से प्राणी शुद्ध होता है.
ग्रहण का धार्मिक महत्व –
ग्रहण के समय साफ़ जल चाहे कहीं से भी लिया गया हो, गंगाजल के समान पवित्र होता है. सभी द्विजाचार्य व्यासजी के समान कहे गए गये हैं और दान सर्वभूमि दान के समान होता है.
ग्रहण के दौरान क्या करें –
ग्रहण के समय गायत्री मन्त्र, विष्णु सहस्त्र नाम स्तोत्र पाठ, आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ, इष्ट मन्त्र या नव ग्रहमन्त्र का जप करना चाहिए. धार्मिक पुस्तकें पढ़नी चाहिए. .
हवन करना चाहिए.
दान देना चाहिये.
गर्भवती महिलाओं को शांत भाव से ईश्वर व अपने इष्ट देव का ध्यान करना चाहिए.
ग्रहण के दौरान क्या नहीं करें –
ग्रहण काल में किसी भी प्रकार का शुभ कार्य प्रारंभ नहीं करना चाहिए.
भोजन पकाना, भोजन करना, शयन करना, आदि कार्य नहीं करना चाहिए. लेकिन यह बात बालक, वृद्ध और रोगी के लिए लागू नहीं होती है.
ग्रहण काल में देवता की प्रतिमा को नहीं छूना चाहिए.
ग्रहण के समय सूर्य की तरफ नंगी आँखों से नहीं देखना चाहिए.
गर्भवती महिलाओं को सूर्य की तरफ नहीं देखना चाहिए.
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Friday, 25 December 2015

(3.1.22) Ek Shloki Ramayan in Hindi

Ek Shloki Ramayan with Sanskrit Shlok / एक श्लोकी रामायण (हिंदी में ) एक श्लोकी रामायण पाठ का फल 

(For English translation / version  CLICK HERE)
एक श्लोकी रामायण में सम्पूर्ण रामायण का सार  एक श्लोक में शामिल किया गया है। इस का पठन,जप  व मनन व्यक्ति के पापों को दूर कर के उसे प्रसन्नता तथा उत्साह  से भर देता है,सही मार्ग दिखाता है,भौतिक औरआध्यात्मिक रूप से संपन्न बनाता है और उसके परिवार में स्नेह का वातावरण निर्मित करता है।
पठन या जप प्रक्रिया :- सुबह स्नान के बाद ऊनी आसन पर पूर्व या उत्तर की तरफ मुख करके बैठ जाएँ और अपने समक्ष भगवान राम का चित्र रखें।अपनी आखें बंद करें व ध्यान करें कि भगवान् राम सम्पूर्ण संसार की रक्षा करने वाले हैं।वे उन सभी गुणों के प्रतीक हैं जो  किसी श्रेष्ठ व्यक्ति में होने चाहिए।वे पुरुषोत्तम हैं।मैं उनके कमल रुपी चरणों में बार बार नमन करता हूँ। फिर नीचे लिखे श्लोक का प्रतिदिन 11 या  21 बार जप / पठन करें।
आदौ  रामतपोवनादिगमनं हत्वा मृगं काञ्चनं
वैदेहीहरणं जटायुमरणं सुग्रीवसम्भाषणम्।
बालीनिग्रहणं समुद्रतरणं लंकापुरी दाहनं
पश्चाद्रावण कुम्भकर्ण हनन मेतद्धि रामायणम्।।  
इस प्रकार इस श्लोक का पठन करने के बाद भगवान राम के दिव्य स्नेह पर मनन -चिंतन करें और भावना करें कि भगवान् राम की कृपा से आपके जीवन में प्रतिदिन नया उत्साह,उमंग आते जा रहे हैं।आपका जीवन प्रसन्नता से भरता जा रहा है,आप ज्यादा अच्छा जीवन जी रहे हैं और आपके परिवार का प्रत्येक सदस्य प्रसन्न आशा वादी ,सहयोगी और आज्ञाकारी है।    

Thursday, 24 December 2015

(1.1.13) Vidur Neeti in Hindi / Vidur ke Quotations in Hindi

Vidur Neeti  विदुर नीति / विदुर के कॉटेसन (हिंदी में )

भागवत धर्म को जानने वालों में महात्मा विदुर जी कास्थान सर्वोपरि है। वे परम बुद्धिमान , प्रज्ञा शक्ति से संपन्न तथा महान योग बल से प्रतिष्ठित थे। महामति विदुर धृतराष्ट्र और पाण्डु के लघु भ्राता थे। इनके द्वारा रचित 'विदुरनीति' एक प्रामाणिक नीति ग्रन्थ माना जाता है।
(1) जलती हुई आग से सोने की पहचान होती है , सदाचार से सत्पुरुष की , व्यवहार से साधु की , भय आने पर शूर की , आर्थिक कठिनाई में धीर की, और कठिन  आपत्ति में शत्रु और मित्र की परीक्षा (पहचान) होती है।(3/49)
(2 ) शुभ कर्मों से लक्ष्मी की उत्पत्ति होती है , प्रगल्भता से वह बढती है ,चतुरता से जड़ जमा लेती है और संयम से सुरक्षित रहती है।(3/51)
(3) ये आठ गुण पुरुष की शोभा बढ़ाते हैं :- बुद्धि , कुलीनता , दम ,शास्त्र ज्ञान, पराक्रम , बहुत नहीं बोलना , यथा शक्ति दान देना और कृतज्ञ होना। (3/52)
(4) देवता चरवाहों की तरह डण्डा लेकर पहरा नहीं देते हैं। वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं,उसे उत्तम बुद्धि से युक्त कर देते हैं। (3 /40)
(5) घोर जंगल में ,दुर्गम मार्ग में ,कठिन आपत्ति के समय , घबराहट में और प्रहार के लिए शस्त्र उठे रहने पर भी मनोबल सम्पन्न पुरुष को कोई भय नहीं होता है। (7 /67)
(6) उद्योग , संयम , दक्षता , सावधानी , धैर्य , स्मृति और सोच विचारकर कार्य आरम्भ करना -इन्हें उन्नति का मूल मन्त्र समझिये। (7 /68 )
(7) बोलने से नहीं बोलना अच्छा बताया गया है किन्तु सत्य बोलना वाणी की दूसरी विशेषता है, यानि मौन की अपेक्षा भी दुगना लाभप्रद है। सत्य भी यदि प्रिय बोला जाये तो यह तीसरी विशेषता है और वह भी यदि धर्म सम्मत कहा जाये तो वह वचन की चौथी विशेषता है। (4 /12)
(8) जो सबका कल्याण चाहता है , किसी के अकल्याण की बात मन में नहीं लाता है , जो सत्य वादी है , कोमल और जितेन्द्रिय है , वह उत्तम पुरुष माना गया है। (4 / 16)
(9) जो झूठी सांत्वना नहीं देता है , देने की प्रतिज्ञा करके दे ही डालता है , दूसरों के दोषों को जानता है , वह मध्यम श्रेणी का पुरुष है। (4 / 17 )
(10) जो अपने ही ऊपर संदेह होने के कारण दूसरों से भी कल्याण होंने  का विश्वास नहीं करता है , मित्रों को भी दूर रखता है , अवश्य ही वह अधम पुरुष है। (4 /19)

Monday, 30 November 2015

(1.1.12) Brahamakumaris Quotations in Hindi

 Brahamakumaris Quotations ब्रह्मा कुमारीज कोट्स (हिन्दी में )

(1) संतुष्टता व ख़ुशी साथ - साथ रहते हैं। इन गुणों से दूसरे ( गुण व व्यक्ति ) आपकी ओर स्वत: ही आकर्षित होंगें।
(2) जीवन एक नाटक है, यदि हम इसके कथानक को समझ लें तो सदैव प्रसन्न रह सकते हैं।

(3) यदि मैं एक क्षण खुश रहता हूँ, तो इससे मेरे अगले क्षण में भी खुश होने की सम्भावना बढ़ जाती है।

(4) दुखों से भरी इस दुनियां में वास्तविक सम्पत्ति , धन नहीं, संतुष्टता है।

(5) विकट समस्याओं का आसान हल ढूंढ़ निकलना सबसे मुश्किल काम है।

(6) अगर आप हर कार्य ख़ुशी से करें तो कोई भी कार्य मुश्किल नहीं लगेगा।

(7) जो भविष्य है ,  वह अब हो रहा है, और जो अब हो रहा है वह अतीत बनता जा रहा है, तो चिंता किस लिए की जाये।

(8) यदि मैं अपने प्रयासों का फल प्राप्त करने के लिए बेचैन  हूँ, तो यह कच्चा फल खाने की इच्छा के समान है।

(9) यदि आप दूसरों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करते हैं कि आप वह हैं , जो कि  आप नहीं हैं, तो मूर्ख कौन बना ?

(10) सफलता मन की शीतलता से उत्पन्न होती है। ठंडा लोहा ही गर्म लोहे को काट  व मोड़  सकता है।

(11) जन्म का अंत है मृत्यु , और मृत्यु का अंत है जन्म।

(12) यदि आप को अपने ही अन्दर शांति नहीं मिल पाती,  तो भला इस विश्व में कहीं और कैसे पा  सकते हैं।

(13) जब हम क्रोध की अग्नि में जलते हैं, तो इसका धुँआ हमारी ही आँखों में जाता है।

(14) जहाँ बुद्धि प्रयोग करने की आवश्यकता है ,वहाँ  बल प्रयोग करने से कोई लाभ नहीं होता है।

(15) मूर्ख व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो सकता, जबकि बुद्धिमान व्यक्ति की सबसे बड़ी पूँजी संतुष्टता  ही है।

(16)  दूसरों की सफलता के प्रति भी उतना ही उत्साह दिखाएँ, जितना आप अपनी सफलता के प्रति दिखातें हैं।

(17) महान  कार्य करने के लिए उमंग और उत्साह को अपना साथी बनाइये।

(18) यदि हम भविष्य के बारे में भय भीत हो जायेंगें , तो वर्तमान में प्राप्त अवसरों को खो देंगे।

(19) दूसरों की गलती सहन करना एक बात है, परन्तु उन्हें माफ़ कर देना और भी महान बात है।

(20) यदि हम अपनी प्रशंसा व ख्याति सुनकर फूले नहीं समाते, तो निंदा व अपमान में भी  हम संतुलित नहीं रह सकेंगें।

(21) दो बातें हैं - कर्म तथा कर्म का प्रभाव। कर्म भले ही साधारण हो परन्तु इसका प्रभाव सकारात्मक, उत्पादक व रचनात्मक होना चाहिए।

(22) यदि मन में दृढ निश्चय व विश्वास है तो विजय निश्चित है। अगर संकल्प कमजोर है तो पराजय होगी।

(23) अपने मार्ग में आने वाले किसी भी विघ्न  से घबरायें नहीं। हर विघ्न को उन्नति की ओर ले जाने वाली सीढ़ी समझें।

(24) आपकी नियंत्रण शक्ति इतनी सशक्त होनी चाहिए कि एक समय में आप के मन में सिर्फ वही संकल्प उत्पन्न हों जो आप चाहते हैं, न अधिक, न कम।

(25)  हम सभी को समस्याओं का सामना करना पड़ता है परन्तु महत्वपूर्ण बात यह है कि हम सभी इनका सामना किस ढंग से करते हैं।

(26) जो मैं अब अनुभव कर रहा हूँ, वह अतीत का फल है, भविष्य में जो अनुभव करूँगा वह इस बात पर निर्भर करता है कि मैं अब क्या कर रहा हूँ।

(27)  कुछ लोग इसलिए परिपक्व नहीं बन पाते क्योंकि उन्हें भय होता है कि कहीं वे वृद्ध न हो जायें, और कुछ इसलिए क्योंकि वे जिम्मेदारी लेने से मना कर देते हैं।

(28) पहाड़ जैसी विपत्ति को दूर करने के लिए सिर्फ थोडा सा साहस ही पर्याप्त है।

(29) विपत्ति आने पर हिम्मत बनाये रखना ही सब से अच्छा उपाय है।

(30) जीवन में सबसे बड़ा प्रश्न है - मृत्यु। और मृत्यु का उत्तर है - जीवन।

(31) यदि आप को दूसरों की प्रतीक्षा करने की आदत है, तो आप अवश्य ही पीछे रह जायेंगें।

(32) ज्ञान सबसे बड़ा धन है। स्वयं से पूछें - " मैं कितना धनवान हूँ ? "

(33) अधिक सांसारिक ज्ञान अर्जित करने से आप में अहंकार आ सकता है परन्तु आध्यात्मिक ज्ञान जितना अधिक अर्जित करते हैं, उतनी ही नम्रता आती है।

(34) यदि आतंरिक स्थिति अशांति की होगी, तो सभी बाह्य चीजों में गड़बड़ी मालूम पड़ती है।

(35) यदि आप गलती करके स्वयं को सही सिद्ध करने का प्रयास  करते हैं तो समय आपकी मूर्खता पर हँसा करेगा।

(36) अपने सहज स्वाभाविक स्वरूप में रहिये, यह कुछ और होने का स्वांग करने से कहीं अधिक अच्छा है।

(37)यदि आप के संकल्प शुद्ध हैं, तो जो आप सोचते हैं , वह कहना तथा जो आप कहते हैं, वह करना, सरल हो जाता है।

(38) यदि आप गपोड़ शंख लोगों के साथ सहमत हो जाते हैं, तो उनकी निंदा के अगले पात्र आप ही होंगे।

(39) आप समस्या स्वरुप नहीं , समाधान स्वरूप बनो और बनाओ।

(40)जो सदा संतुष्ट है , वही सदा हर्षित एवं आकर्षण मूर्त हैं।

(41) यह संसार हार जीत का खेल है, इसे नाटक समझ कर खेलो।
oooooooo

Friday, 20 November 2015

(1.1.11) Geeta ki Shiksha गीता की शिक्षा Teachings of Geeta / Geeta saar

Geeta kee Shiksha गीता की शिक्षा Teachings of Geeta

1. संदेह नकारात्मक भाव उत्पन्न करता है। जो व्यक्ति संशय रखता है , वह सुखी नहीं हो सकता है।
2. आत्मा अमर है। आत्मा न मारती है , न ही मारी जाती है।  (आत्मा न मरती है , न किसी को मारती है )
जिस प्रकार व्यक्ति पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र पहनता है , उसी प्रकार शरीर धारण की हुई आत्मा शरीररूपी पुराने वस्त्र को त्याग देती है और नया शरीर धारण कर लेती है।
यदि कोई व्यक्ति यह मानता है कि आत्मा जन्म लेती है और फिर मर जाती है तब भी उसे शोक नहीं करना चाहिए। क्योंकि जिसने जन्म लिया है , उसकी  मृत्यु निश्चित है। इसलिए हमें इस अपरिहार्य स्थिति पर शोक नहीं करना चाहिए।
(3) कार्य संसार को चलायमान रखता है , बिना कार्य किये नहीं रहा जा सकता है। हमारा निर्धारित कार्य करना हमारा कर्तव्य है , परन्तु साथ ही हमें इस किये गए कार्य के फल की आशा भी नहीं रखनी चाहिए क्योंकि किसी भी कार्य का फल हमारे अधीन नहीं है। साथ ही निर्धारित कर्म न करने की इच्छा रखना भी उचित नहीं है क्योंकि कर्म अपरिहार्य है।
(4) जिसका मन दुःख की स्थिति में भी क्षुब्ध नहीं होता है , जो प्रसन्नता की कामना नहीं करता है , जो आसक्ति , भय और क्रोध से मुक्त है , हर चीज़ से आसक्ति रहित है , जिसे अच्छाई और बुराई की स्थिति में न तो प्रसन्नता होती है और न ही अप्रसन्नता होती है , वह स्थिर बुद्धि वाला है।
(5) जो व्यक्ति कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है अर्थात जो कर्म और अकर्म के प्रति आसक्ति रहित है  वही बुद्धिमान है , और वह योगी सम्पूर्ण कर्मो को करने वाला  है।
(6) जो व्यक्ति जो कुछ भी प्राप्त हो , उससे संतुष्ट रहने वाला है , (और) जो इर्ष्या  रहित है , द्वंद्वो से मुक्त है , जो सफलता तथा असफलता में संतुलित है , कर्मों को करता हुआ भी उनसे बंधा हुआ नहीं है वही व्यक्ति सम्पूर्ण कर्म का वास्तव में कर्ता  है।
(7) जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की  आकांक्षा करता है , तथा न ही कार्य के फल की आशा करता है , वही हमेशा सन्यासी ( त्यागी ) समझने योग्य है , क्योंकि राग- द्वेष आदि द्वद्वों  से रहित हुआ पुरुष सुख पूर्वक संसार रूपी बंधन से मुक्त हो जाता है। 
(8) जो पुरुष न कभी हर्षित होता है , न द्वेष करता है , न शोक  करता है , न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों के फल के प्रति उदासीन है ( फल को त्यागता है ) वही भक्ति युक्त पुरुष ईश्वर को प्रिय है।
(9) जो पुरुष शत्रु व् मित्र के प्रति समान भाव रखता है , जो मान व अपमान को समान समझता है , जो सर्दी-गर्मी , प्रसन्नता-अप्रसन्नता में संतुलित रहता है , जो आसक्ति रहित है , वह व्यक्ति जो निंदा-स्तुति को समान समझता है , जो बोलने से पूर्व मननशील है , स्वतः प्राप्त वस्तुओं से संतुष्ट रहता है , जो रहने के स्थान और जीवन के प्रति आसक्ति नहीं रखता है , अपने निश्चय में द्रढ़ रहता है , भक्ति युक्त कार्यों में लगा रहता है  , ऐसा व्यक्ति ईश्वर  को अति प्रिय है।
(10) बुद्धिमान ( गुणातीत ) पुरुष वह है जो सभी स्थितियों में समान रहता है और समभाव रखता है। यदि उसके सामने विपदा भी आती है तो वह हतोत्साहित नहीं होता है और यदि वह सम्पन्नता को प्राप्त करले तो भी गर्वित नहीं होता है। वह प्रिय और अप्रिय के प्रति समभाव रखता है। वह किसी भी कार्य के कर्तापन की भावना से मुक्त रहता है , ऐसा व्यक्ति कामना रहित होता है अतः उसे कुछ भी बाधित नहीं कर सकता है।
(11) जहाँ जहाँ भी कृष्ण ( विशुद्ध बुद्धि के प्रतीक ) और अर्जुन  (विशुद्ध कर्म का प्रतीक ) हैं , वहीं पर ही सम्पन्नता , श्रेष्टता , विजय , शक्ति और नीति (धर्म) है।
(12) जब जब और जहाँ जहाँ धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है , तब तब ईश्वर  धरती पर धर्म की पुनः स्थापना  करने के लिए अवतार लेते हैं।
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(1.1.10) चाणक्य नीति Chankya Niti / Teachings of Chankya

 Chanakya Niti (selected Shloks)चाणक्य नीति (चुने हुए श्लोक )
अध्याय -1 श्लोक -12
बीमारी में ,विपत्तिकाल में , अकाल   के समय ,दुश्मनो से दुःख पाने या आक्रमण होने पर , राजदरबार में और श्मशान भूमि में जो साथ रहता है. ,वही सच्चा भाई अथवा बंधु है।

अध्याय -1 श्लोक -13
जो अपने निश्चित कर्मो  अथवा वस्तु का त्याग करके , अनिश्चित की चिंता करता है ,उसका अनिश्चित लक्ष्य तो नष्ट होता ही है , निश्चित भी नष्ट हो जाता है।
अध्याय-2-श्लोक-5:-
जो मित्र प्रत्यक्ष रूप से मधुर वचन बोलता है और पीठ पीछे आपके सारे कार्यों में रोड़ा अटकाता हो ,ऐसे मित्र को उस  घड़े के समान त्याग देना चाहिए जिसके भीतर विष भरा हो और उपर मुँह के पास दूध भरा

अध्याय -2-श्लोक -9
हर एक पर्वत में मणि नहीं होती है और हर एक हाथी के मस्तक में मोती नहीं होते हैं।इसी प्रकार साधु लोग सभी जगह नहीं  मिलते हैं,और हर एक वन में चन्दन के वृक्ष नही होते हैं।
अध्याय -3 श्लोक -1
संसार मे ऐसा कौन सा कुल अथवा वंश है ,जिसमें कोई न  कोई दोष अथवा अवगुण न हो ,प्रत्येक व्यक्ति को किसी न किसी रोग का सामना करना ही पड़ता है ,ऐसा मनुष्य कौन सा है ,जिसने व्यसनों में पड़कर कष्ट न झेला हो और सदा सुखी रहने वाला व्यक्ति भी कठिनता से ही प्राप्त होता है ,क्योंकि प्रत्येक के जीवन में कभी न कभी कष्ट अथवा संकट उठाने का अवसर आ ही जाता है।
अध्याय - 3-श्लोक -4
दुष्ट व्यक्ति और सांप, इन दोनों में से किसी एक को चुनना हो तो दुष्ट व्यक्ति की अपेक्षा सांप को चुनना ठीक रहता है क्योंकि सांप समय आने पर ही काटता है जबकि दुष्ट व्यक्ति हर समय आपको हानि पहुँचाता है।
अध्याय -3-श्लोक-7
मूर्ख व्यकि से बचना चाहिए क्योंकि वह दो पैरों वाले जानवर से भिन्न नहीं है। वह (मूर्ख व्यक्ति )आपको शब्दों से उसी प्रकार पीड़ित करता है जैसे कोई बिना दिखने वाला कांटा चुभता है।
अध्याय -3-श्लोक-12
अत्यन्त रूपवती होने के कारण ही सीता का अपहरण हुआ ,अधिक अभिमान होने के कारण रावण मारा गया
अत्यधिक दान देने के कारण राजा बलि को कष्ट उठाना पड़ा।इसलिए चाणक्य कहते हैं की अति किसी भी कार्य में नहीं करनी चाहिए।
अध्याय -3-श्लोक-13
समर्थ को भार कैसा?व्यवसायी के लिए कोई स्थान दूर नहीं  है।विद्वान् व्यक्ति के लिए कोई भी देश विदेश नहीं है। जो व्यक्ति मधुर शब्द बोलता है उसके लिए कोई दुश्मन नहीं है।
अध्याय -3श्लोक -14
एक ही सुगन्धित फूल वाले वृक्ष से जिस प्रकार सारा वन सुगन्धित हो जाता है,उसी प्रकार एक सुपुत्र से सारा कुल सुशोभित हो जाता है।
अध्याय -3श्लोक -21
जहाँ मूर्खों का सम्मान नहीं होता है ,जहाँ अन्न भंडार सुरक्षित रहता है ,जहाँ पति -पत्नी में कभी झगड़ा नहीं होता ,वहां लक्ष्मी बिना बुलाये ही निवास करती है।
अध्याय -4-श्लोक -10
इस संसार में दुखी लोगों को तीन बातों से ही शांति प्राप्त हो सकती है -अच्छी सन्तान ,अच्छी पत्नी और भले लोगों की संगति।
अध्याय -4-श्लोक -18
बुद्धिमान व्यक्ति को बार -बार यह सोचना चाहिए कि उसके मित्र कितने हैं,उसका समय कैसा है -अच्छा है या बुरा है, और यदि बुरा है तो उसे अच्छा कैसे बनाया जाये।उसका निवास स्थान कैसा है,उसकी आय कितनी है ,वह कौन है ,उसकी शक्ति कितनी है अर्थात वह क्या करने में समर्थ है? व्यक्ति को ऐसा मनन करना चाहिए।
अध्याय -5-श्लोक-15
विदेश में विद्या ही मनुष्य की सच्ची मित्र होती है,घर में उसकी पत्नी उसकी मित्र होती है,दवाई रोगी व्यक्ति की मित्र होती है और मृत्यु के समय उसके सत्कर्म ही उसके मित्र होते हैं।
अध्याय -5श्लोक -17
बादल के जल के समान दूसरा कोई जल शुद्ध नहीं होता है,आत्मबल के समान दूसरा कोई बल नही है,नेत्र ज्योति के समान दूसरी कोई ज्योति नहीं है और अन्न के समान दूसरा कोई भी प्रिय पदार्थ नहीं है।
अध्याय -5-श्लोक -20
इस संसार में लक्ष्मी (धन )अस्थिर है अर्थात चलाय मान है,प्राण भी नाश वान है ,जीवन और यौवन भी नष्ट होने वाले हैं,इस चराचर संसार में धर्म ही स्थिर है।
अध्याय -6-श्लोक -16
काम छोटा हो या बड़ा हो ,उसे एक बार हाथ में लेने के बाद छोड़ना नहीं चाहिए।उसे पूरी लगन और सामर्थ्य के साथ पूरा करना चाहिए।जैसे सिंह पकड़े हुए शिकार को कदापि नहीं छोड़ता है।सिंह का यह गुण मनुष्य को सीखना चाहिए।
.अध्याय -6श्लोक -18
अत्यंत थक जाने पर भी बोझ को ढोना,ठंडे -गर्म का विचार न करना,सदा संतोष पूर्वक विचरण करना ,ये तीन बातें गधे से सीखनी चाहिए।
अध्याय -7-श्लोक -2
जो व्यक्ति धन धान्य के लेन देन  में, विद्या के सीखने में,भोजन के समय और अन्य व्यवहारों में संकोच नहीं करता है,वही व्यक्ति सुखी रहता है।
अघ्याय -7-श्लोक -4
अपनी पत्नी,भोजन और धन -इन तीनों के प्रति मनुष्य को संतोष रखना चाहिए ,परन्तु विद्या के अध्ययन ,तप और दान के प्रति कभी संतोष नहीं करना चाहिए।
अध्याय -8श्लोक -19
संसार में विद्वान् की ही प्रशंसा होती है ,विद्वान व्यक्ति ही सब जगह पूजे जाते हैं।विद्या से ही सब कुछ मिलता हैं ,विद्या की सब जगह पूजा होती है।
अध्याय -10-श्लोक -1
निर्धन व्यक्ति दीन हीन नहीं होता है यदि वह विद्वान् हो तो लेकिन व्यक्ति विद्या रूपी धन से हीन है तो वह निश्चित ही निर्धन समझा जाता है।अर्थात विद्या ही सच्चा  धन है।
अध्याय-10-श्लोक-2
भली प्रकार आँख से देखकर अगला कदम  रखना चाहिए,कपड़े से छानकर पानी पीना चाहिए ,शास्त्र के अनुसार कोई बात कहनी चाहिए और कोई भी कार्य मन में अच्छी प्रकार सोच कर करना चाहिए।
अध्याय -10-श्लोक -5
भाग्य की शक्ति बहुत प्रबल होती है।वह पल भर में ही निर्धन को राजा और राजा को निर्धन बना देती है।धनवान व्यक्ति निर्धन बन जाता है और  निर्धन के पास अनायास ही धन आ जाता है।
अध्याय -12-श्लोक-1
वही गृहस्थी सुखी  हो सकता है जिसके पुत्र और पुत्रियां प्रतिभावान हो ,जिसकी पत्नी मधुर वचन बोलने वाली हो,जिसके पास इच्छा पूर्ति के लायक धन हो, जिसके मन में अपनी पत्नी के प्रति प्रेम भाव हो ,जिसके सेवक आज्ञाकारी हो ,जिसके घर में अतिथि का सत्कार होता हो ,जहां प्रतिदिन इश्वर की पूजा होती हो ,जिस घर में स्वादिष्ट भोजन और ठंडा जल उपलब्ध रहता हो और जिस गृहस्थी को सदा भले लोगों की संगति मिलती हो।
इस प्रकार के घर का मालिक सुखी और सौभाग्यशाली होता  है।
अध्याय -12-श्लोक -3
वही व्यक्ति इस संसार में सुखी है जो अपने सम्बन्धियों के प्रति उदार है ,अपरिचितों के प्रति दयालु है ,दुष्टों के प्रति उपेक्षा का भाव रखता है,भले लोगों के प्रति स्नेह पूर्ण व्यवहार रखता है,अकुलीन व्यक्ति के प्रति चतुराई का व्यवहार करता है,विद्वानों के प्रति सरलता से पेश आता है, दुश्मनों के साथ साहस का व्यवहार करता है ,बुजर्गो के प्रति विनम्रता का व्यवहार करता है, और जो महिला वर्ग के प्रति चतुराई का व्यवहार करता है। ऐसे लोगों से ही इस संसार की मर्यादा बनी हुई है।
अध्याय -13-श्लोक -6
भविष्य में आने वाली संभावित विपत्ति और वर्तमान में उपस्थित विपत्ति पर जो व्यक्ति तत्काल विचार करके उसका समाधान खोज लेते हैं,वे सदा सुखी रहते हैं।इस के अलावा जो व्यक्ति यह सोचते हैं  कि  जो भाग्य में लिखा है,वही होगा,ऐसा सोचकर कोई उपाय नहीं करते हैं,ऐसे व्यक्ति विनाश को प्राप्त होते हैं।
अध्याय -13-श्लोक -15
अव्यवस्थित कार्य करने वाले को न तो समाज में और न ही जंगल में सुख प्राप्त होता है,क्योंकि समाज में लोग उसे भला बुरा कहकर दुखी करते है और जंगल में अकेला होने के कार वह  दुखी होता है।
अध्याय -16-श्लोक -5
आज तक न तो सोने के मृग की रचना हुई और न ही किसी ने सोने का मृग देखा और सुना ।फिर भी श्री राम ने सोने के मृग को पाने की इच्छा की और मृग को पाने के लिए दौड़ पड़े।यह बात ठीक ही है कि जब मनुष्य के बुरे दिन आते हैं,तो उसकी बुद्धि विपरीत बातें सोचने लगती है।
अध्याय -16-श्लोक -6
मनुष्य अपने अच्छे गुणों के कारण श्रेष्ठता प्राप्त करता है।उसके उचें आसन पर बैठ जाने के कारण श्रेष्ठ नहीं  माना जाता है।राज भवन की सबसे ऊँची चोटी पर बैठ ने पर भी कौआ,गरुड़ कभी नही बन सकता।
अध्याय -16-श्लोक -8
जिस मनुष्य के गुणों की प्रशंसा दूसरे लोग करते हैं,तो वह मनुष्य गुणों से रहित होने पर भी गुणी मान लिया जाता है,परन्तु अपने मुख से अपनी बड़ाई करने पर इंद्र भी छोटा हो जाता है

(1.1.9) Good Company / Achchhi Sangati अच्छी संगति

Achchhi Sangati अच्छी संगति Good company 

> सज्जनों की संगति स्वर्ग में निवास करने के बराबर है।
चाणक्य
> जिसने शीतल तथा शुभ्र सज्जन संगति रुपी गंगा में स्नान कर लिया, उसको दान, तीर्थ, तप तथा यज्ञ आदि से क्या प्रयोजन?
वाल्मीकि
> हीन लोगों की संगति से अपनी बुद्धि भी हीन हो जाती है, सामान्य लोगों के साथ सामान्य बनी रहती है, और विशिष्ट लोगों की संगति विशिष्ट हो जाती है।
महाभारत
> परमेश्वर विद्वानों की संगति से ही प्राप्त हो सकता है।
ऋग्वेद
> बुरे आचरण वाला, पाप दृष्टि वाला, निकृष्ट स्थान पर रहने वाला और दुष्टों से मित्रता करने वाला मनुष्य शीघ्र ही नष्ट हो जाता है।
चाणक्य
> सज्जनों की संगति कभी विफल नहीं होती है।
महाभारत
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(1.1.8) Maniratna mala

Saturday, 17 October 2015

(1.1.8) Maniratna Mala मणिरत्न माला

मणिरत्न माला प्रश्नोत्तरी - आदि शंकराचार्यकृत

आदि शंकराचार्य जी महाराज ने भारतीय संस्कृति को सुदृढ़ बनाने के लिए अनेक प्रकार के कार्य किये हैं। आध्यात्मिक साहित्य की रचना उनका महत्वपूर्ण कार्य है।  उनकी एक पुस्तक है 'मणिरत्नमाला' जो प्रश्नोत्तर रूप में है इसलिए इसे प्रश्नोत्तरी भी कहा जाता है। उदाहरणार्थ कुछ प्रश्न और उत्तर नीचे दिए गए हैं -
प्रश्न - दरिद्र कौन है?
उत्तर - जिसकी तृष्णा बढी हुई है।
प्रश्न - श्रीमान (धनी) कौन है?
उत्तर -जो पूर्ण संतोषी है।
प्रश्न - जीवित ही कौन मरा हुआ है?
उत्तर - उद्यमहीन।
प्रश्न - उत्तम भूषण क्या है?
उत्तर - सच्चरिता।
प्रश्न - परम तीर्थ क्या है?
उत्तर - अपना विशुद्ध मन।
प्रश्न - प्राणियों का ज्वर क्या है?
उत्तर - चिंता?
प्रश्न - मूर्ख कौन है?
उत्तर - विवेकहीन।
प्रश्न - जगत को किसने जीता है?
उत्तर - जिसने मन को जीत लिया है।
प्रश्न - हीनता का मूल क्या है?
उत्तर - याचना।
प्रश्न - दुःख का कारण क्या है?
उत्तर - ममता।
प्रश्न - शत्रु कौन है?
उत्तर - उद्योग का अभाव।
प्रश्न - अँधा कौन है?
उत्तर - जो अकर्तव्य में लिप्त है।
प्रश्न - बहरा कौन है?
उत्तर -जो हित की बात नहीं सुनता।
प्रश्न - गूंगा कौन है?
उत्तर - जो प्रिय वचन बोलना नहीं जनता।
प्रश्न - अधम कौन है?
उत्तर -चरित्रहीन।
प्रश्न - जगत को जीतने में समर्थ कौन है?
उत्तर - सत्यनिष्ठ और सहनशील।
प्रश्न - शोचनीय क्या है?
उत्तर - धन होने पर भी कृपणता।
प्रश्न - यथार्थ दान क्या है?
उत्तर - कामनारहित दान।
प्रश्न - आभूषण क्या है?
उत्तर - शील।
प्रश्न - वाणी का भूषण क्या है?
उत्तर - सत्य।
प्रश्न - अविद्या क्या है?
उत्तर - आत्मा की स्पूर्ति का न होना।
प्रश्न - सुख दायक कौन है?
उत्तर - सज्जनों की मित्रता।
प्रश्न - प्रशंसनीय क्या है?
उत्तर - उदारता। 

Wednesday, 14 October 2015

(3.1.21) Navratra / Navratri (in Hindi) Importance of Navratra (in Hindi)

नवरात्र / नवरात्रा / नवरात्रि  ( उत्सव )
नवरात्रा कब आते हैं? पूजा विधि क्या है / घट स्थापना कैसे करें / नवरात्र के दौरान किस मन्त्र या स्तोत्र का जप करे? हवन / नवरात्र उत्थापन कब करें 

. नवरात्र में प्रयुक्त  'नव' शब्द 'नौ' का और ' रात्र ' शब्द 'रात्रि' का प्रतीक है। नवरात्र का अर्थ नव अहो रात्र के रूप में भी उल्लिखित है। इस प्रकार जो पर्व नौ दिन और नौ रात तक चले वही नवरात्र है।इसे शक्ति संचय और उपासना -आराधना का पर्व भी माना जाता है। ये नौ दिन देवी पार्वती , लक्ष्मी और सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना के लिए निर्धारित हैं। जिन्हें नव दुर्गा के नाम से जाना जाता है। पहले तीन दिन पार्वती  के तीन स्वरूपों की, अगले तीन दिन लक्ष्मी के तीन स्वरूपों के और आखिर के तीन दिन सरस्वती के तीन स्वरूपों की पूजा की जाती है। इन नौ रूपों के नाम हैं :-1 शैल पुत्री 2. ब्रह्म चारिणी 3. चंद्रघंटा 4. कूष्मांडा 5. स्कंदमाता 6. कात्यायनी 7. काल रात्रि 8. महा गौरी 9. सिद्धि दात्री।
वर्ष में चार बार नवरात्र पर्व मनाये जाते हैं 
चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों को प्रकट नवरात्र कहा जाता है और माघ तथा आषाढ़  माह के नवरात्रों को गुप्त नवरात्रा कहा जाता है।
पूजा विधि एवं घट स्थापना या कलश स्थापना :-
नवरात्र के प्रथम दिन शुभ मुहूर्त में घट स्थापना या कलश स्थापना का विधान है। घट स्थापना के लिए मिट्टी  या तांबे के कलश में शुद्ध जल भरें। कलश के मुंह पर नारियल को लाल वस्त्र में लपेटकर अशोक के पत्तों सहित रखें। कलश के नीचे बालू मिट्टी की वेदी बनायें व इसमें जौ के दाने व पानी डाल दें। इस वेदी पर कलश रखदें । कलश पर रोली से स्वास्तिक का चिन्ह बनायें । वेदी की रेत में जौ बोने  के बजाय अलग से किसी पात्र में भी मिट्टी डाल कर जौ बोये जाते हैं, जिन्हें जुवारे कहते हैं। घट स्थापना या कलश स्थापना मूल रूप से देवी दुर्गा का आव्हान है।
मूर्ति या तस्वीर स्थापना -
घट या कलश के पास एक पाटे पर लाल वस्त्र बिछा कर माँ भगवती की तस्वीर भगवान राम , हनुमान जी या अपने ईष्ट देव की तस्वीर रखें।
आसन - देवी उपासक लाल या सफेद रंग के ऊनी आसन का प्रयोग करें। पूर्व की तरफ मुँह करके पूजा , मंत्र , हवन एवं अनुष्ठान समाप्त  करें।
नवरात्र के दौरान पाठ- जप आदि :-
साधक अपनी इच्छानुसार दुर्गासप्तशती का पाठ या दुर्गा के किसी मन्त्र का जप करे।
(या ) सुन्दर काण्ड का पाठ
 (या ) राम रक्षा स्त्रोत का पाठ
(या ) रामचरित मानस पाठ
 पाठ या मन्त्र जाप  का  फल - नवरात्रि  का समय वर्ष के श्रेष्ट समय में से एक है अत: इस अवधि में किये गए जप - तप , व्रत, उपवास का फल तुलनात्मक रूप से ज्यादा मिलता है।जप - तप  या पाठ निष्काम भाव से किया जाये या सकाम  भाव से, सभी का सुफल मिलता है, सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। यदि  किसी विशेष उद्देश्य के लिए जप या पाठ किया जाता है तो उस उद्देश्य की अवश्य पूर्ति होती है।
कुमारी पूजन - अपनी कुल परम्परा के अनुसार अष्टमी या नवमी के दिन दो वर्ष से नौ वर्ष तक की उम्र की नौ कन्याओं को अपने घर बुलाकर उनकी पूजा करें, उन्हें भोजन करायें व यथा शक्ति दक्षिणा दें।
हवन -
नवरात्रि  के दौरान जितने मन्त्रों का जप किया जाता है उसके दसवें भाग का हवन दसमी के दिन या नवमी के दिन किया जाता है।(यदि हवन नहीं किया जा सके तो कुल जपे हुये मन्त्रों की संख्या के दसवें भाग का जप और करें।)
नवरात्र उत्थापन -
नवरात्र के नवें या दसवें दिन बोये हुए जवारे उग कर बड़े हो जाते हैं , उन्हें प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। घट के जल का आचमन कर उसे अपने शरीर पर स्पर्श कराया जाता है तथा कुछ जल को अपने घर में भी छिड़का जाता है। फिर विधि विधान पूर्वक पूजा करके समस्त पूजा सामग्री को जलाशय में विसर्जित किया जाता है।     

(1.3.4) Ganesh Smaran / Pratah Smaran Ganesh Shlok

प्रातः स्मरण गणेश श्लोक

प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं 
सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम्। 
उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्ड दण्ड-
माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्ध्यम्। 
अर्थ - अनाथों के बंधु, सिन्दूर से शोभायमान दोनों गण्डस्थल वाले, प्रबल विघ्न का नाश करने में समर्थ एवं इन्द्रादि देवों में नमस्कृत श्री गणेश का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ।
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